Fri. Feb 28th, 2020

डॉ. सी.के. राउत की गिरफ्तारी से उत्पन्न सवाल : डॉ. श्वेता दीप्ति

हिरासत में लेना या दमन की राजनीति अपनाना समस्या के समाधान का विकल्प नहीं है । बल्कि ऐसे तत्वों को मूलधार में लाकर उनसे जुड़कर ही समस्या का समाधान किया जा सकता है ।

हिमालिनी अंक अक्‍टूबर २०१८ सप्तरी को क्रांति का जमीन कहा जाता है । उसी सप्तरी जिले के महदेवा गाँव में जन्मे डा. सी. के. राउत, विलायत के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएच. डी. किए हुए हैं । वे युवा इन्जीनियर पुरस्कार, महेन्द्र विद्याभूषण, कुलरत्न गोल्डमेडल और ट्रफिमेन्केफ एकाडेमिक एचिभमेन्ट अवार्ड जैसे सम्मानों से विभूषित हैं ।
डा. राउत अमेरिका में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत थे । मधेश की सेवा करने के लिए वे २०६८ साल में अमेरिका से वापस लौट आए । उन्होंने ‘मधेश का इतिहास’, ‘मधेश स्वराज’, ‘वीर मधेशी’ और ‘वैराग से बचाव तक’ (डिनायल टू डिफेन्स) किताबें भी लिखी हैं । वे ‘स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन’ का नेतृत्व करते हैं ।

 

सारांश में यही परिचय है डा. सी के राउत का । पर विगत कुछ वर्षों में डा सी के राउत का नाम नेपाल सरकार के लिए सरदर्द बना हुआ है । मधेश आन्दोलन के साथ ही यह एक ऐसा नाम है, जो सदैव स्वतंत्र मधेश के नारे के साथ चर्चा में रहा है । पर आश्चर्य तो यह है कि सीके राउत की बार–बार गिरफतारी के बाद भी उन्हें रिहा किया जाता रहा है । क्योंकि सरकार राज्य विप्लव का आरोप सिद्ध नहीं कर पा रही है ।
एक नजर डा सी के राउत पर विस्तार से नजर डालें तो यह आम तौर पर जाहिर है कि वो मधेशियों के साथ हो रहे विभेद को खत्म करने के लिए आरम्भ से प्रयासरत रहे हैं । डा. राउत मधेशियों के हक के लिए अन्तराष्ट्रीय स्तर में कार्यरत गैर आवासीय मधेशी संघ के अध्यक्ष भी हैं । एक मेधावी विद्यार्थी जिसने अपने छात्र जीवन में अनेक बाधाओं, उपेक्षाओं और अपमान को सहते हुए अपनी योग्यता को स्थापित किया । पुलचोक से डा. राउत जापान गए, वहाँ से अचानक उनका ध्यान अध्यात्म की ओर आकर्षित हुआ, जिस क्रम में आप भारत के कोलकाता, मद्रास, कन्याकुमारी, मदुरई, बँगलोर, रामेश्वरम, साईबाबा के आश्रम की यात्रा की । इस बीच उनका अध्ययन भी जारी रहा जापान से ही उन्होंने स्नातकोत्तर किया और फिर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में विद्यावारिधि में चयन पश्चात आप अमेरिका चले गए ।

 

डा सी के राउत का बचपन और बचपन से लेकर युवावस्था तक में झेला गया विभेद हमेशा उनके साथ रहा जो उन्हें उद्वेलित करता रहा । इसी बीच नेपाल का चर्चित रितिक रौशन काँड ने उन्हें प्रभावित किया और इसके पश्चात् आप खुलकर स्वतंत्र मधेश के नारे के साथ सरकार और जनता के समक्ष आ खड़े हुए ।

 

अपनी किताब ‘वैराग से बचाव तक’ में उन्होंने अपने साथ हुए विभेद का काफी विस्तार से वर्णन किया है । शायद बचपन के वातावरण ने उन्हें आज इस राह पर खडा किया हुआ है । अमेरिका के प्रमुख संस्था बीबीएन में कार्यरत वैज्ञानिक अपनी सारी सुख सुविधा को होम कर के आखिर क्यों इस राह पर चल पड़ा ? इसका एक ही जवाब है मधेश और मधेशियों के प्रति राज्य की विभेदपूर्ण नीति । इतना ही नहीं मधेशियों को देखने का जो एक नजरिया रहा है, समुदाय विशेष में वो आज भी पूर्ववत है ।

मधेश आज भी आन्दोलित है । क्योंकि अधिकार की माँग आज भी मधेशियों की जारी है । परन्तु डा सी के राउत ने विभेद अंत के लिए जो राह चुनी वो सही नहीं कही जा सकती और यही कारण है कि डा. राउत की स्वतंत्र मधेश के उद्घोष की वजह से, उन्हें सरकार की ओर से देशद्रोही करार किए जाने की कोशिश जारी है । और इसी के तहत उन्हें बार–बार, कभी कोर्ट परिसर से तो कभी अन्तर्वाता देने के क्रम में तो, कभी उनके आवास से हिरासत में लिया जाता रहा है । एक बार फिर रौतहट के गौर से उन्हें उस वक्त हिरासत में लिया गया जब वो तारीख के लिए अदालत गए हुए थे । क्या इसे प्रशासन की सफलता मानी जाएगी ? क्योंकि कुछ ही दिनों पहले संविधान दिवस के अवसर पर डा. राउत ने जनकपुर में लाखों की भीड़ को संबोधित किया तो उस समय यही प्रशासन कहाँ चूक गई । ऐसा भी नहीं था कि डा राउत का वहाँ आना अचानक हुआ था । सभी ओर चर्चा थी कि डा राउत वहाँ जनता को सम्बोधन करने वाले हैं । और वो आए भी और अपनी गर्जन सुना कर चले गए । जहाँ प्रशासन मूक तामाशाई बन कर खड़ी थी । इसे सफलता कहा जाय या विफलता ?
देखा जाय तो डा. राउत की बार–बार गिरफ्तारी उन्हें प्रसिद्धि ही दिला रही है । नेपाल लोकतंत्र की राह पर चल पड़ा है, जहाँ अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है । किन्तु यह भी सच है कि अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्र को किसी तरह उकसाने या हिंसा की राह पर ले जाना अनुचित है । परन्तु इतिहास गवाह है कि इसी देश ने अधिकार प्राप्ति के नाम पर दस वर्षों के हिंसात्मक आन्दोलन का दर्द भी सहा है । और आज भी कई परिवार इस अपनों के खोने की पीड़ा के साथ साँसें ले रहे हैं । किन्तु इस राह से गुजरने वाले आज जनता के समक्ष हैं और देश की बागडोर सम्भाले हुए हैं तथा सुख सुविधा से परिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।
इसी बीच एक नई धार सामने आ गई है, जो है विप्लव समूह । जो सत्ता पक्ष के ही साथी थे, किन्तु आज एक नए असंतोष के साथ क्रांति का नारा लगाकर रोज नेपाल बंद का आह्वान कर रहे हैं । प्रश्न यह है कि क्यों देश में सीके राउत या विप्लव जैसे समूह का जन्म हो रहा है ? सीधी सी बात है कि इसके पीछे अगर कुछ है तो वह है असंतोष । असंतोष और अस्तित्व का खंडित होना और विभेद की असह्य पीड़ा को झेलना ही क्रांति की नींव तैयार करता है । यह असंतोष डा राउत के समर्थन में इकट्ठी होती भीड़ को देखकर लगाया जा सकता है । यह एक चिन्तनीय पहलु है देश के लिए । यह तय है कि जबतक इन बातों की ओर सरकार या सत्ता पक्ष गम्भीरता से पहल नहीं करेगी, तब तक ऐसी भीड़ अपना शक्ति प्रदर्शित करती रहेगी । हिरासत में लेना या दमन की राजनीति अपनाना समस्या के समाधान का विकल्प नहीं है । बल्कि ऐसे तत्वों को मूलधार में लाकर उनसे जुड़कर ही समस्या का समाधान किया जा सकता है । मधेश की माँग को आज तक अनदेखा किया जा रहा है और यही वजह मधेश की जनता को डा. राउत के करीब ला रही है । अगर इस आकर्षण को रोकना है तो सरकार को तत्काल ही मधेश की जनता को सम्बोधित करना होगा । अगर इसके विपरीत वो किसी निरंकुशता या दमन की राह अपनाती है तो निश्चय है मधेश की मिट्टी में उबाल आना तय है । सरकार की कोशिश यह होनी चाहिए कि मधेश की जनता को तुष्ट करे, जिससे उनका मोह स्वतंत्र मधेश जैसे गठबन्धन से हटे । अगर ऐसा नहीं होता है तो, भविष्य का इतिहास निश्चय है कोई सुखद संंदेश नहीं देने वाला है । समय अब भी है हिरासत में लेकर व्यक्ति विशेष को आम से खास बनाने की जगह अपनी जनता की अपेक्षाओं को पूरा करें और किसी भी दुष्परिणाम से देश की सुरक्षा करें ।

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