मधेश और मधेशवाद सिर्फ वाद नहीं अस्तित्व की पहचान है : सी.के. लाल
डा सी के लाल की नजर में मधेश और मधेशवाद की अवधारणा । आज भी मैथिली हमारी भाषा है पर उसके साथ अवधी, भोजपुरी जैसी अन्य भाषाओं का अस्तित्व भी खतरे में किन्तु इसकी वजह हिन्दी नही है ।
२० नोभेम्बर २०१८ को विराटनगर में मधेशी बैद्धिक समाज द्वारा आयोजित कार्यक्रम में आपने कहा है कि जिसतरह अस्तित्व कायम करने के लिए माँ की आवश्यकता और उसके अस्तित्व को कायम रखना होता है ठीक उसी तरह वर्तमान परिवेश में हालात चाहे जो भी हों पर आवश्यकता इस बात की है कि मधेश और मधेशवाद की अवधारणा को जीवित रखा जाय । यह सच है कि शुरुआती दौर में तराई शब्द ही प्रचलित था जो शायद इसलिए कि तराई केन्द्र से जुडा रहे । पर माओवादी जनयुद्ध के समय से जब यह कहा गया कि “गर्व से कहु हम मधेशी छी भगौडा नय धरतीपुत्र छी” तभी से यह शब्द हमारी पहचान बन गई है । एक वक्त था कि मैं यह मानता था कि हिन्दी से मैथिली भाषा का अस्तित्व खतरे में पड सकता है और मैं मैथिली की वकालत किया करता था । आज भी मैथिली हमारी भाषा है पर उसके साथ अवधी, भोजपुरी जैसी अन्य भाषाओं का अस्तित्व भी खतरे में किन्तु इसकी वजह हिन्दी नही है । यह सच है । दुर्भाग्य की बात है कि आज काठमान्डू मधेशी को पहचान रहा है पर मधेश को नहीं । ऐसे में वह संविधान जो मधेश को नही जानता वो मधेशी के अधिकारों की सुरक्षा क्या करेगा । आज मधेशी नेता ही अपने पार्टी के नाम से मधेश शब्द निकाल चुके हैं । ऐसे में हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम किसी भी हालत में मधेश और मधेशवाद की अवधारणा को जिन्दा रखें क्योंकि यह सिर्फ वाद नहीं हमारे अस्तित्व की पहचान है ।

