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शहीद परिवार की सिसकियाँ किसे सुनाई देती है ? : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)

 
मुरली मनोहर तिवारी (सीपू), वीरगंज, १९ जनवरी, माघ ५ गते १२ वां”बलिदानी दिवस”। मधेशी बीर शहिद को कोटि कोटि नमन। आज कही ना कही कुछ श्र्द्धांजलि कार्यक्रम करके शहीद को सम्मान और याद करने का कार्य हो रहा है। लहान में भव्य कार्यक्रम हुआ जिसमें उपप्रधानमंत्री तथा स्वास्थ्य मंत्री उपेन्द्र यादव सहित प्रदेश नंबर २के मुख्यमंत्री के साथ पूरे प्रदेश सरकार की उपस्थिति रही। शहीदों को याद करना, उन्हें श्र्द्धांजलि देना चाहिए, लेकिन सवाल उठता है कि जिसके लिए सैकड़ो मधेशियों ने सहादत दिया, क्या उनके सपने पूरे हो गए ?
शहीद परिवारों की व्यथा हम जैसो के समझ से परे है। ईश्वर उस माँ को इस सदमे को बर्दाश्त करने की शक्ति प्रदान करे जिसने अपने लाल को मधेश की गोंद में समर्पित कर दिया। किसी का बेटा मरा, किसी की बेटी मरी,  कोई बेटा गवाया, कोई पति- पिता और अभिभावक। उनके माँ और पत्नी की सिसकियाँ किसे सुनाई देती है ?
पांच आन्दोलन मे सहादत प्राप्त शहीद तो घोषित हुए, लेकिन आंदोलन के क्रम में घोषित पचास लाख नही मीला, क्या वह छलावा मात्र था। शहीद का सपना अधुरा है। शहीदों के खून के क़तरे पर फफूंदी लग रही है। बात बहुत बड़ी है। लेकिन इसके इर्द गिर्द मुख्य सवाल है कि शहादत के बदले क्या पाया और क्या खोया  ?
मधेशियों को पहचान  तो मिला लेकिन आपसी सद्भाव गवाँ कर, और नाम मात्र के अधिकार मिले भी तो कुछ व्यक्ति बिशेष तक ही सीमित हो गया। जनसंख्या के हिसाब से बराबरी के अधिकार का सपना टूट गया।
हम चले थे सभी मधेशियों के एकजुट करके उनके दुःख दर्द बाटने के लिए, जिसमे हम ख़ुद टुकड़ा-टुकड़ा होकर ८जिलों में सिमट गए। जो मधेश के लिए लड़ने में अग्रपंक्ति में थे, वे नेपथ्य में भेज दिए गए। उनकी जगह पैसे वाले लोगो का शूमार हो गया।
नागरिकता समस्या अभी तक यथावत है। सेना में समूहगत प्रवेश दिन का सपना हो गया है। अब तो टुकड़े में मिले प्रदेश का नाम ‘मधेश’ रखने का भी बिरोध सुनाई दे रहा है। हम मधेश के लिए लड़ते-लड़ते जाती के लिए लड़ने लगे है। संविधान संशोधन का औचित्य समझाना पड़ रहा है, ऐसे दिन आ गए। हम विरोधियों से नही, अपनों की बेईमानी से हार रहे है। अभी लंबी लड़ाई बाक़ी है। जय मधेश।।

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