रुमानी मिजाज के शायर गुलजार .हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में रुक कर अपना ही इंतिज़ार किया ।
एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी,
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हो तनहाई भी।
आदतन तुम ने कर दिए वादे
आदतन हम ने ए’तिबार किया।
आप के बा’द हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है ।
अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार
पीले पत्ते तलाश करती है ।
भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आँखों में
उजाला हो तो हम आँखें झपकते रहते हैं ।
दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसाँ उतारता है कोई ।
हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते ।
हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में
रुक कर अपना ही इंतिज़ार किया ।


