Wed. Nov 20th, 2019

पुनर्जन्म प्राप्त उतार–चढ़ावपूर्ण मेरा जीवन ! डा. रामदयाल राकेश

हिमालिनी, अंक जनवरी 2019 | शिक्षण और प्रशासनिक दोनों पेशे से जुड़े हुए चिर–परिचित व्यक्तित्व हैं– डॉ. रामदयाल राकेश । आप का जन्म तत्कालीन सिसौटिया गांव पंचायत (आज की गोडैता नगरपालिका–१०) सर्लाही में २५ जुलाई १९४२ में हुआ है । आप के पिता जी का नाम श्रीयोधन प्रसाद साह है और माता जी का नाम पार्वती साह । आपका जीवन बहुत ही उतार– चढ़ावपूर्ण रहा है । नेपाली, हिन्दी, मैथिली और अंग्रेजी साहित्य में आप का विशेष योगदान है । हमारे इतिहास के इन्हीं पन्नों से आबद्ध शख्शियत डा. राकेश का ‘जीवन–सन्दर्भ’ आप के समक्ष आपकी ही जुबानी प्रस्तुत हैं–

Ramdayal Rakesh
डा. रामदयाल राकेश

बाल्यकाल
मेरा परिवार व्यापार और कृषि दोनों में संलग्न था । जब मैं ५ वर्ष का था, उसी वक्त मेरे पिता जी का स्वर्गवास हुआ था । मेरे बड़े भाई रामविलास साह, रामलक्षण साह और रामलोचन साह के पहल में ही मेरा पालन–पोषण और पढाई–लिखाई हुई । हम लोग ५ भाई हैं, मेरा नम्बर चौथा है ।
एक अपरिचित बीमारी के कारण बाल्यकाल में मेरे साथ एक हादसा हुआ था । उस वक्त अपने जनों ने ठान लिया था कि मैं मर गया हूँ । लोगों ने मेरा शव बाहर निकाल दिया था । अर्थी सजाने के खातिर बांस काटने के लिए लोग घर से निकल चुके थे । स्थानीय भाषा में मुझे ‘हवा’ (एक प्रकार का रोग) लग गयी थी । लेकिन कुछ समय के बाद मुझे होश आया, गांव के लोग आश्चर्यचकित हो गए । लोगों को लगा कि मैं पुनर्जीवित हो गया हूँ । मुझे पुनर्जीवित करने के लिए किसी ने भी आधुनिक चिकित्सा और उपचार नहीं किया था । उपचार के लिए गांव में कोई वैद्यखाना भी नहीं था । उस समय कोई बीमार पड़ता था तो उसे किसी तान्त्रिक के पास ही ले जाया करता था, यह गांव का प्रचलन था । लेकिन मुझे किसी के पास भी नहीं ले जाया गया । कारण एक ही था कि लोग समझ रहे थे– मैं मर गया हूँ । लेकिन चमत्कार हो गया, मैं जीवित हो गया । मुझे लगता है कि वह मेरा पुनर्जन्म था । इस घटना के संबंध में मुझे कुछ याद और अनुभूति नहीं है । जब मैं बड़ा हो गया, तब अपने जनों ने मुझे यह बात बतायी ।
प्रोफेशन जीवन में प्रवेश करने के बाद मैं काठमांडू में ही ज्यादा रहता आया हूं । लेकिन आज भी गांव में बहुत कुछ बाकी है, इसीलिए अपने गांव सिसौटियां (सर्लाही) में जा कर कभी–कभार रहता हूं । जगह–जमीन और मकान सब है गांव में ।

पारिवारिक जीवन और शिक्षा
गांव में एक पाठशाला थी, उसमें गांव के सभी विद्यार्थी सामूहिक रूप से पढ़ते थे । पाठशाला में एक शिक्षक थे, जो भारत से आए थे । सारे विद्यार्थियों को शिक्षक सामूहिक रूप में पढ़ाते थे, क्लास का कोई वर्गीकरण नहीं था । बाद में सिसौटियां के पास में ही रहे दूसरे गाँव गोड़ैता स्थित बेनी मीडिल स्कूल में कक्षा ६ में भर्ती होकर मैंने औपचारिक शिक्षा शुरु की । मैं कक्षा ७ में अध्ययन कर रहा था, उसी वक्त मुझसे बड़े भाई रामलोचन साह की शादी की बात चलने लगी । लड़की देखने के लिए हमारे परिवार के लोग लड़की के गांव में गए । उस परिवार में दो लड़कियां थी, जो आपस में चचेरी बहनें थीं । हमारे ओर से जो वहां गए थे, वे लोग बचनवद्ध होकर आए कि दोनों लड़की की शादी हमारे दो लड़के (मेरे बड़े भाई और मैं) से की जाएगी । उस वक्त मैंने खूब विरोध किया । विरोध इसलिए कि मैं शादी करना नहीं चाहता था, पढ़ना चाहता था । लेकिन मेरा प्रयत्न असफल रहा, मेरी शादी हो गई । उस वक्त मैं कितने साल का था, मुझे ही पता नहीं । क्योंकि मेरी जन्मकुण्डली नहीं थी । अन्दाजन मेरे भाई साहेब ने जो लिखा दिया, वही जन्म–तिथि प्रयोग में आने लगा । मास्टर साहब ने भी कहा कि आप की जन्म तिथि २५ जुलाई १९४२ रजिष्टर हो गई, इसी को मैं अपनी जन्म–तिथि मानता आ रहा हूं ।
मैंने ६ और ७ क्लास नेपाल में पढ़ा है । कक्षा ८ के लिए मैं और मेरे बड़े भाई रामलोचन भारत (बिहार) बभनगामा स्थित बलभद्र उच्च महाविद्यालय में भर्ती हो गए और साइन्स पढ़ने लगे । लेकिन घर से दूर और अजनबी जगह होेने के कारण मैं उस वक्त खूब रोता था । घर की याद आती थी । घर आने–जाने के लिए ७–८ घंटे लगते थे, कोई भी सवारी साधन न होने के कारण पैदल यात्रा करनी पड़ती थी । हम लोग बभगामा स्थित एक होस्टल में रहते थे । घर को ‘मिस’ करते हुए हर दिन मैं रोता था, बाद में तो मेरे बड़े भाई भी रोने लगे । वहां रहने में मन नहीं लगता था । इसीलिए २ महीनों के बाद हम लोग पढ़ाई छोड़कर घर वापस हो गए ।
लेकिन हमलोगों को तो जैसे भी पढ़ना ही था, इसीलिए फिर भारत के ही सोनवर्षा स्थित नन्दीपत जीतू हाईस्कुल में हम लोगों का नाम लिखवाया गया । उक्त स्कुल सर्लाही जिला सदरमुकाम मलंगवा के पास ही है । दसगजा के इधर मलंगवा है तो उधर सोनवर्षा, घर से नजदीक (३ कोस की दूरी) होने के कारण भी हम लोग वहां जाने लगे । और सोनवर्षा के नजदीक में ही मेरी ससुराल भी थी । उस स्कूल में हमारे साला (पत्नी के भाई)लोग भी पढ़ते थे । इसीलिए उस स्कूल में भर्ती होकर पढ़ने के लिए हम लोगों को कोई ज्यादा दिक्कत नहीं हुई । ७ कक्षा तो हम लोगों ने पास किया था, लेकिन हम लोगों ने सोनवर्षा में ८ क्लास नहीं पढ़ा । बलभद्र में साइन्स विषय को लेकर भर्ती तो की गई थी, लेकिन दो महीनों में भी छोड़ दिया था और नन्दीपत जीतू हाईस्कुल में सीधे कक्षा ९ मेंं भर्ती हो गए । लेकिन यहां आर्टस् (कला संकाय) में पढ़ने लगे, जहां हम लोग ३ वर्ष (कक्षा ११) तक पढ़े । बिहार बोर्ड अन्तर्गत म्याट्रिकुलेशन परीक्षा दी, मैं फस्र्ट डिभिजन में पास हो गया । उत्तीर्ण होनेवालो में से सबसे अधिक नम्बर मेरा ही था ।
उसके बाद पढ़ने के लिए मैं काठमांडू आने की तैयारी में लगा । कुछ साथियों को लेकर वीरगंज तक आया भी । वीरगंज से काठमांडू तक पैदल आना पड़ता था । वीरगंज तक आने के बाद मुझे काठमांडू पैदल आने के लिए हिम्मत ही नहीं हई । मेरे साथी लोग काठमांडू आ गए, लेकिन मैं अपने ही घर वापस हो गया । उसके बाद मैंने सीतामढी स्थित राधाकृष्ण गोयन्का कॉलेज में जाकर आईए में एडमिसन करवाया । हिन्दी, अंग्रेजी और नागरिक शास्त्र मूल विषय (आर्टस) लेकर २ साल में आईए पास किया । उसके बाद सिमरा से प्लेन में पहली बार काठमांडू आया । उद्देश्य पढ़ना ही था, मैं अंग्रेजी ऑनर्स करना चाहता था । लेकिन उस वक्त काठमांडू में यह विषय नहीं था । इसीलिए मुझे वापस होना था । प्लेन से तो आया, लेकिन वापस होने के लिए प्लेन नहीं था । बारिश का मौसम होने के कारण प्लेन बंद था । मुझे पैदल ही वापस होना पड़ा । कुछ अपरिचित व्यक्तियों को साथी बनाकर मैं अमलेखगंज तक पैदल ही चला गया । उस वक्त अमलेखगंज से वीरगंज तक ट्रेन चलती थी । वहां से टे«न से वीरगंज पहुँचकर मैं अपने घर पहुँच गया ।
घर पहुँचने के बाद मैं दरभंगा चला गया, अंग्रेजी ऑनर्स के लिए । एडमिशन तो हो गया, लेकिन एक महीने के बाद फिर वहां दिल नहीं लगा । दरभंगा छोड़कर पुनः सीतामढ़ी आया और राधाकृष्ण गोयनका कॉलेज में भर्ती हो गया । जहां से मैने हिन्दी, दर्शनशास्त्र और अंग्रेजी ऑनर्स में बीए पास किया । उसके बाद एम.ए पढ़ने के लिए काठमांडू आया । त्रिभुवन विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विषय लेकर एडमिसन भी की । दशहरा के दुर्गा पूजा तक तो रहा, लेकिन जब दुर्गा पूजा में गांव गया तो मैंने बहाना बना दिया कि काठमांडू में मेरा पेट ठीक नहीं रहता है । इसी बहाने मैं काठमांडू नहीं आया ।

मेरा पेशा
गोड़ैता हाइस्कूल, जहां मैं पहले पढ़ता था, उसमें मैं टीचर हो गया । एक साल बाद काठमांडू आकर पुनः हिन्दी विषय को लेकर एम.ए पढ़ने लगा । उसके एक–डेढ़ साल के बाद दूसरे गांव (सुन्दरपुर) में दूसरा हाईस्कूल खुल गया था । देवधारी सुन्दर हाईस्कुल नामक उक्त स्कुल में मैं हेडमास्टर बन गया । मैंने फिर काठमांडू छोड़ दिया । एमए प्रथम पार्ट तो मैंने पास किया था, लेकिन सेकेण्ड पार्ट बाकी ही था । बाद में मैंने प्राइवेट परीक्षा देकर एम.ए पास किया । एम.ए पास करने के बाद मैंने हेडमास्टर पद से भी इस्तीफा दिया । इस्तीफा के पीछे एम.ए पास होना मुख्य कारण नहीं था । गांव की जो गंदी राजनीति थी, वह मुझे रास नहीं आई । इसीलिए मैंने गांव छोड़ दिया और काठमांडू आया । लेकिन यहां मुझे कोई भी नौकरी नहीं मिली । मैं ट्युसन पढ़ाने लगा । इतिहासकार तथा पूर्वमन्त्री डिल्लीरमण रेग्मी की नाती को भी मैं होम ट्यूसन पढ़ाता था । कुछ समय के बाद मैं सरकारी कॉलेज (पद्म कन्या) में पढ़ाने लगा । वहां मैंने ९ महीने तक अवैतनिक रूप में (बिना पारिश्रमिक) पढ़ाया । उस वक्त अंगूरबाबा जोशी प्रिन्सिपल थी, उन्होंने मुझे आश्वासन दिया था कि जब पद्मकन्या में कोई परमानेन्ट पोस्ट होगी तो मुझे नियुक्ति दी जाएगी । लेकिन यह मेरे लिए सिर्फ आश्वासन था, वह परमानेन्ट नियुक्ति नहीं दे सकती थी, क्योंकि परमानेन्ट होने के लिए लोकसेवा की परीक्षा पास करनी पड़ती थी । ९ महीनों के बाद लोकसेवा भी खुली । मैंने भी परीक्षा दी और पास हो गया । इस तरह मैं पद्मकन्या कॉलेज में परमानेन्ट हो गया । ४ साल पढ़ाने के बाद कोलम्बो प्लान से एक प्लान आया । मेरा नाम सेलेक्सन हो गया, पीएचडी करने के लिए मैं दिल्ली विश्वविद्यालय चला गया । मेरा विषय था– हिन्दी और नेपाली समसामयिक कविता ः तुलनात्मक अध्ययन । यह विषय इसलिए चुना कि हिन्दी और नेपाली दोनों भाषाओं को जोड़कर मैं साहित्यिक दृष्टिकोण से नेपाल और भारत को जोड़ना चाहता था । इसी विषय में मुझे सन् १९७५ में पीएचडी की उपाधी मिली ।
चार साल के बाद जब मैं पीएचडी कर नेपाल आया तो नेपाल में नई शिक्षा योजना लागू हो गई थी । मेरा ट्रान्सफर कीर्तिपुर स्थित केन्द्रीय कॉलेज में कर दिया गया । जहां मैं जाना नहीं चाहता था, लेकिन नौकरी का सवाल भी था । क्या करता ? मुझें वही जाना पड़ा । वि.सं. २०३१–०३२ साल की बात है यह । कीर्तिपुर में मैंने २५ वर्ष पढ़ाया ।
जिस समय लोकसेवा पास कर मैं पद्मकन्या कॉलेज में नियुक्त हो गया था, उसी समय त्रिभुवन विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापक के लिए भैकेन्सी खुल गई थी । मैंने भी इन्टरव्यू दिया । इन्टरव्यू लेने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष डा. नगेन्द्र आए थे । इन्टरव्यू में लखनऊ से आए पीएचडी होल्डर एक कैन्डिडेट भी था । लेकिन सेलेक्सन मुझे किया गया । एक व्यक्ति दो जगह नौकरी नहीं कर सकता था । इसीलिए मैंने पद्कन्या के प्रिन्सिपल अंगुरबाबा जोशी के साथ विचार–विमर्श किया कि मेरे लिए त्रिभुवन विश्वविद्यालय ठीक है कि पद्मकन्या कॉलेज ? उन्होंने पद्मकन्या कॉलेज ही ठीक रहने की बात बताई । इसीलिए मैंने त्रिवि ज्वाइन नहीं किया । त्रिवि में प्रोफेसर बनने के लिए दो–तीन बार मैंने परीक्षा भी दी थी, लेकिन नहीं हो सका । इसीलिए मंैने पद्मकन्या कॉलेज में ही रहने का फैसला किया ।
वि.सं. २०४६ साल के जनआन्दोलन के बाद देश में राजनीतिक परिवर्तन आ गया, उसका प्रभाव तत्कालीन प्रशासनिक संयन्त्र में भी दिखने लगा । मुझे भी निर्वाचन आयोग में सह–सचिव के पद पर पदस्थापन किया गया । यह वि.सं. २०४९ साल की बात है । ५ साल तक मैं निर्वाचन आयोग में सह–सचिव पद पर कार्यरत रहा । इस तरह मेरा प्राध्यापन से प्रशासनिक क्षेत्र में विषयान्तर हो गया ।

प्रशासनिक भ्रष्टाचार और राजनीति
आम जनता आज कहती है कि देश में राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है और हर क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप है । लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि भ्रष्टाचार और राजनीतिक विकृति पहले से ही है । जिस वक्त मैं निर्वाचन आयोग में सह–सचिव था, उस वक्त प्रमुख निर्वाचन आयुक्त थे– विष्णुप्रताप शाह । उनके साथ मेरा अच्छा सम्बन्ध नहीं बन पाया । प्रशासन में जो अनियमितता हुआ करती थी, मैंने उसमें विरोध किया । चुनाव के लिए ६० कंप्युटर खरीद किए गए थे, जिसका न कोई टेन्डर था, नहीं कोटेसन । सिर्फ फोटोकॉपी पेपर का बिल ५–७ लाख रुपयों का था । इन सभी आर्थिक कारोबारों में मेरी सहभागिता नहीं थी । निर्वाचन संपन्न हो गया, उसके बाद बेरुजु फाइल मेरे पास आया । उप–सचिव होते हुए सह–सचिव (मैं) तक फाइल आया, मुझे उसमें साइन करना था । मैंने कहा– ‘जब कंप्युटर खरीद किया गया, उस वक्त मुझसे कुछ विचार–विमर्श नहीं किया गया था, इसीलिए मैं साइन नहीं करुंगा ।’ एक निर्वाचन आयुक्त ने भी मुझसे कहा– ‘अगर आप साइन करेंगे तो आप फंस जाएंगे, ये लोग तो राजनीतिक नियुक्ति से आए हैं, आप सरकारी कर्मचारी हैं । इसीलिए वे लोग नहीं फसेंगे, आप ही फंस जाएंगे । आप साइन मत कीजिए ।’ उनकी राय मैंने मान ली, कंप्युटर और फोटोकॉपी दोनों का फाइल मैंने लौटा दिया । जिसके चलते प्रमुख निर्वाचन आयुक्त को गुस्सा आया और उन्होंने मुझे निर्वाचन आयोग से निकाल दिया । उसके बाद मुझे ९ महीने तक जगेड़ा (जिम्मेवारी विहीन बनाकर) में रहना पड़ा । मेरे जीवन का यह सबसे दुःखद क्षण है ।
जब केबी गुरुङ शिक्षा मन्त्री बने, उन्होंने मुझे पाठ्यक्रम विकास केन्द्र सानोठीमी में निर्देशक के रूप में पदस्थापन किया । निर्देशक की जिम्मेदारी १ साल से निर्वाह कर रहा था, उसी वक्त शिक्षा मन्त्री परिवर्तन हो गए । नये शिक्षा मन्त्री के रूप में अर्जुन नरसिंह केसी आ गए । उन्होंने मुझे अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र में तबादला कर दिया । अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र में मुझे प्रमुख की जिम्मेदारी सहित भेजा गया था । केबी गुरुङ हो या अर्जुन नरसिंह केसी, दोनों का बैकग्राउण्ड प्रोफेसरी से जुड़ा हुआ था । मुझे लगा कि इसीलिए उन लोगों ने मुझे पाठ्यक्रम विकास केन्द्र और अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र की जिम्मेदारी दी है । इस जिम्मेदारी के लिए मैंने उन लोगों को कुछ भी नहीं कहा था । स्वतः उन लोगों के विवेक अनुसार मुझे यह जिम्मेदारी मिली थी ।
अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र में एक साल काम करने के बाद मुझे लगा कि अब मुझे भी सचिव पद मिलना चाहिए । मुझे पता था कि राजनीतिक लॉविंग के बिना कुछ भी होनेवाला नहीं है । आज की राष्ट्रीय जनता पार्टी (राजपा) के वरिष्ठ नेता (उस वक्त नेपाली कांग्रेस के नेता) महन्थ ठाकुर जी मेरे क्लासमेट भी हैं । वे सर्लाही से निर्वाचित हो कर आए थे और वे मन्त्री थे । उनके पास जाकर मैंने अपनी चाहत व्यक्त की । पता चला कि मुझे सचिव देने के लिए कोई भी सकारात्मक नहीं हैं । इसीलिए मैंने सोचा– अगर मुझे सचिव नहीं मिलता है तो मैं क्यों सह–सचिव में लटका रहूं ! ऐसी ही अवस्था में मेरा मनोनयन प्राज्ञ के रूप में तत्कालीन नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान में हो गया । प्राज्ञ बन कर रहना है या सह–सचिव पद पर ? मुझे चुनाव करना था । कुछ दोस्तों के साथ मैंने विचार–विमर्श भी किया । करीबी दोस्तो ने कहा– ‘आप को सचिव मिलना मुश्किल है । प्राज्ञ होना ही ठीक है ।’ इसीलिए मैंने उन लोगों का सुझाव मान लिया और प्राज्ञ बनकर प्रज्ञा प्रतिष्ठान में ५ साल (वि.सं. २०५५–६०) तक रहा ।

प्राज्ञ के रूप में मेरी भूमिका
टिचिङ प्रोफेशन में रहते वक्त हो या प्रशासनिक क्षेत्र में रहते वक्त, मेरा लेखन कार्य जारी था । मैं हिन्दी, अंग्रेजी, नेपाली और मैथिली भाषा में विभिन्न साहित्यिक रचना लिखता रहा, समसामयिक विषयों में विश्लेषणात्मक लेख भी लिखता था । प्राज्ञ होने के पीछे एक कारण यह भी है । प्रतिष्ठान में मैं संस्कृति विभाग का विभागीय प्रमुख था । सिर्फ मेरे दृष्टिकोण से ही नहीं, दूसरों के दृष्टिकोण से भी वहां रह कर मैंने जो काम किया, मुझे लगता है कि वह आज भी अविस्मरणीय है । बारा जिला स्थित सिम्रौनगढ नेपाल के लिए एक ऐतिहासिक भूमि है, जो कर्नाट वंशीय राजाओं की राजधानी है । आज तक वह उपेक्षित भूमि भी हैं । जहां मैंने एक हफ्ते की विचार–गोष्ठी करवायी । उस विचार–विमर्श में देश के बड़े–बडे पुरातत्वविद्, इतिहासविद् और संस्कृतिविद् थे । सिम्रौनगढ़ को राष्ट्रीय–अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में परिचित कराने के उद्देश्य से मैंने वह काम किया था । इसीतरह नेपाल में जो भी प्रमुख संस्कृतियां हैं, जैसे कि नेवारी, नेपाली, मैथिली, भोजपुरी, थारु, मगर, शेर्पा आदि के बारे में विदेशी विद्वान लोगों को निमन्त्रित कर विचार–विमर्श करवाया है । उस वक्त भाषा–संस्कृति से जुड़े हुए १२ विदेशी विज्ञ कार्यक्रम में सहभागी थे । साउथ एसिया इस्टिच्युट, जर्मनी के हाइडल वर्ग युनिवर्सिटी से आबद्ध है, इसकी प्रमुख थी– मेरिया । उनके साथ मिलकर मैंने यह प्रोग्राम किया था ।

प्राज्ञ चयन में विकृति
हां, हम लोग देखते हैं कि जो सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी के निकट हैं, आज उसी व्यक्ति की प्राज्ञ नियुक्त होने की सम्भावना ज्यादा रहती है । सामान्यतः उस वक्त ऐसी अवस्था नहीं थी । जैसे कि मोहन कोइराला को उपकुलपति बनाया गया । मोहन कोइराला जैसा व्यक्तित्व उस वक्त अन्य कोई भी नहीं था । इसीलिए उनको बनाया गया । उनकी योग्यता और क्षमता की कदर की गई । उनकी नियुक्ति को लेकर कोई भी विवाद नहीं आया । लेकिन आज जो प्राज्ञ नियुक्त होते हैं, कुछ न कुछ विवाद हो जाता है । आज तो प्राज्ञिक क्षेत्र में नहीं, पार्टी में योगदान करनेवालों में से प्राज्ञ होने की सम्भावना ज्यादा रहती है । सत्ताधारी पार्टियां आपस में भागबण्डा कर प्राज्ञ नियुक्त करती हैं, ऐसी अवस्था दुर्भाग्यपूर्ण हैं । अगर उस वक्त भी ऐसी ही अवस्था रहती तो शायद मैं प्राज्ञ नहीं बन पाता । अर्थात् मुझे प्राज्ञ बनाने के लिए लॉबिङ करनेवाले उस वक्त कोई भी नहीं था । मुझे लगता है कि मेरी योग्यता और योगदान को देखकर ही प्राज्ञ बनाया गया ।
संस्कृति के लिए मैंने जो काम किया, उसी को दृष्टिगत करते हुए सांस्कृतिक अध्ययन के लिए मुझे इण्डियाना युनिवर्सिटी ब्लुमिङटन (अमेरिका) में फूलब्राइट स्कॉलरशिप भी मिली थी, ६ महीनों का कोर्स था । यह सन् १९९३–९४ की बात है । वहां से मैंने पोस्ट ड‘क्टरल किया ।

मानव अधिकार आयोग में
प्रज्ञा प्रतिष्ठान से रिटायर्ड होने के बाद मुझे ९ महीने तक खाली ही रहना पड़ा । उस समय राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में अपनी कुछ भूमिका के लिए मैं प्रयास कर रहा था । हम से पहले डा. गौरीशंकरलाल दास आयुक्त होकर आयोग में गए थे । इसीलिए मैंने भी सोचा कि क्यों न मैं भी कुछ प्रयास करुँ ! सामान्य प्रयास से ही मैं आयोग में आयुक्त के रूप में नियुक्त हो गया । दो साल तक मैंने वहां काम किया । आयोग का यह दूसरा कार्यकाल था । यह वि.सं. २०६२– ६३ साल की बात है । जनआन्दोलन चरम उत्कर्ष पर था । तत्कालीन राजा ज्ञानेन्द्र शाह के प्रत्यक्ष शासन के विरुद्ध लोग सड़क पर उतर आए थे, जनआन्दोलन सफल हो गया । उसी वक्त आयोग के सभी पदाधिकारियों ने सामूहिक इस्तीफा देने का निर्णय किया और हम लोगों ने त्यागपत्र दिया । उसके बाद मैं बेकार हो गया । हां, लिखना–पढ़ना तो जारी ही था । कुछ समय के बाद नेपाल सरकार ने ‘पिछड़े समुदाय की उत्थान समिति’ (ओबीसी) नामक एक समिति गठन की । उसमें मुझे उपाध्यक्ष बना दिया गया । ओबीसी में दो साल काम किया, राजनीतिक दावपेच इसतरह होने लगा कि मुझे वहां रहना ठीक नहीं लगा, इसीलिए मैंने वहां से भी इस्तीफा दिया ।

आज की शिक्षा नीति
मैंने पाठ्यक्रम विकास केन्द्र में रहकर काम किया है । उसका काम पाठ्यक्रम निर्माण करना था, शिक्षा नीति बनाने की जिम्मेदारी केन्द्र की नहीं है । तब भी मुझे लगता है कि आज भी हमारी शिक्षा नीति ‘कोशिश करो और प्रयोग करों’ की प्रक्रिया में ही चल रही है । एक शिक्षा नीति असफल होने के बाद उसमें कुछ सुधार कर पुनः दूसरी शिक्षा नीति तो बनायी जाती है, लेकिन अभी तक कोई शिक्षा नीति सफल नहीं दिखाई दे रही है । देश में बढ़ रही शैक्षिक बेरोजगारों की संख्या से ही यह बात पुष्ट होती है ।
मेरी साहित्यिक यात्रा
चार भाषाओं में मैं निरन्तर लिख रहा हूं । नेपाली, हिन्दी, अंग्रेजी और मैथिली भाषा में मैं कलम चलाता हूं । २८ पुस्तकें प्रकाशित है । संस्कृति, साहित्य और कला तथा मानव शास्त्र, समाज शास्त्र मेरा विषय रहा हैं । विशेषतः मैंने मैथिली संस्कृति को विशेष प्राथमिकता में रखकर लिखा है । एक दर्जन किताबें मैथिली संस्कृति के बारे में ही है । नेपाली भाषा में समीक्षा और समालोचना ज्यादा प्रकाशित है । हिन्दी भाषा में तो मैंने पाठ्यपुस्तक भी लिखी है, जो कक्षा ९ और १० के लिए था । डायमण्ड शमशेर और भरत जंगम द्वारा लिखित ३ नेपाली उपन्यासों को मैंने हिन्दी में अनुवाद किया है । आईए कोर्स में पढ़ाई होनेवाली ‘हिन्दी पद्य पराग’ का सम्पादन भी मैंने किया है । ‘शान्ता की सुने’ नामक हिन्दी उपन्यास भी प्रकाशित है मेरा ।
मैं अधिक पुरस्कार और सम्मान से सम्मानित होनेवालों में से नहीं हूं । जीवन में पहली बार ५ हजार राशि का पर्यटन पुरस्कार प्राप्त किया था । मैं पर्यटन पत्रिका ‘सफारी नेपाल’ निकालता था, उसका मैं प्रकाशक और सम्पादक था । उसमें पर्यटन और संस्कृति संबंधी विषयों में लिखा जाता था । लगभग १२ साल तक प्रकाशित होने के बाद उक्त पत्रिका बन्द हो गई । साझा लोक–साहित्य पुरस्कार भी मुझे मिला है, जो साझा प्रकाशन ने दिया था । विद्यापति स्मृति पुरस्कार से भी मुझे सम्मानित किया गया है । अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का एक जापानी पुरस्कार (फुकुओका एसिया प्यासिफिक एकेडेमिक अवार्ड) से भी मुझे सम्मानित किया गया है । वि.सं. २०२४ साल से मैंने नेपाली भाषा–साहित्य से अपनी लेखनी शुरु की है, बाद में अन्य भाषाओं में लिखने लगा । लेकिन आज तक नेपाली भाषा–साहित्य के लिए मुझे कोई भी पुरस्कार नहीं मिला है ।

मैं हिन्दी का सेवक
हिन्दी के लिए मैंने आन्दोलन नहीं किया, लेकिन मैं हिन्दी भाषा का सेवक हूं । अर्थात् मैं हिन्दी का आन्दोलनकारी नहीं हूं, लेखक हूं । हिन्दी विभाग में रहकर काम किया है । और मैंने अपनी लेखनी से जितना सम्भव हो सका है, उतनी हिन्दी की सेवा की है । हां, मैं मानता हू कि नेपाल में हिन्दी बोलने और लिखनेवालों की संख्या अधिक है, इसीलिए यहां इस भाषा को भी संवैधानिक मान्यता मिलनी चाहिए । हिन्दी भाषा के लिए जो भी आन्दोलन होता है, उसका मैं सम्मान करता हूं । क्योंकि ‘नेपाली’ नेपाल की राष्ट्र भाषा है और ‘हिन्दी’ नेपाल की सम्पर्क भाषा है । हिन्दी हिमालय से लेकर तराई की तलहटी तक जानी जाती है, पढ़ी जाती है । मेची से महाकाली तक के लोग हिन्दी का प्रयोग करते हैं । पहाड़ों में भी हिन्दी का प्रयोग होता है । यह विदेशी भाषा नहीं है । हिन्दी और नेपाली को जोड़ने के लिए ही मैंने पीएचडी का विषय भी ‘हिन्दी और नेपाली समसामयिक कविता ः तुलनात्मक अध्ययन’ रखा था । क्योंकि यहां के बहुत लोग हिन्दी पढ़ते हैं, लेकिन जो हिन्दी मूल भाषी है, उन लोगों को मैं नेपाली साहित्य के बारे में ज्ञान दिलाना चाहता था । हिन्दी तो आज विश्व भाषा बनने जा रही है । हिन्दी के सहयोग से ही नेपाली भाषा–साहित्य भी विश्वस्तर में पहुँच सकता है । इसीलिए नेपाली भाषा का उत्थान चाहते है तो दोनों का समिस्रण आवश्यक है । मैं ऐसी मान्यता रखता हूं । हिन्दी सेवा के लिए ही मुझे पंचम विश्व हिन्दी सम्मेलन में सम्मानित भी किया गया था । इसी तरह साहित्य अकादमी दिल्ली ने भी मुझे ‘प्रेमचन्द्र फेलो’ भी बनाया था ।

जीवन की सार्थकता
मानव जीवन सार्थक है, सार्थक बनाना भी चाहिए । सौ साल तक जीना बहुत बड़ी बात नहीं है । आप ने अपने जीवन में कितना काम किया, वह सार्थक है या नहीं ? यह महत्वपूर्ण है । दूसरे के लिए, समाज के लिए और देश के लिए आप ने कितना महत्वपूर्ण काम किया, यह जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बात होती है । जीवन में ऐसा कुछ काम करें, जिसको देखकर लोग आप को स्मरण करें । खाना–पीना–सोना, यौन सम्पर्क करना, सन्तान उत्पत्ति करना आदि कार्य तो हर प्राणी के जीवन में होता है । मनुष्य जीवन सिर्फ उसके लिए ही नहीं है । इस तरह के चिन्तन के साथ आप थोड़ा–सा भी देश और समाज के बारे में सोचते हैं तो आप का जीवन सार्थक बन सकता है । समाज और देश के लिए सकारात्मक योगदान किए बिना आप सौ साल ही जीते हैं तो भी उस जीवन की सार्थकता नहीं है ।
वैसे तो कभी–कभार लगता है कि मेरा व्यक्तिगत जीवन भी तनावपूर्ण ही है । पारिवारिक और सामाजिक जीवन को देखकर ऐसा महसूस होता है । भौतिक दुनिया में यह सामान्य भी है, जहां अनेक चुनौतियां आती–जाती रहती हैं । जिस को मैं अपने विवेक से संयमित बना कर रखता हूं । वैसे तो मेरा स्वास्थ्य शुरु से ही कमजोर है, स्वास्थ्योपचार के लिए ही दिल्ली से अमेरिका तक की यात्रा हो चुकी है । १० वर्ष से मैं ‘पेसमेकर’ की सहायता से जी रहा हूं । तब भी जीवन को खुश रखने के लिए मैं काम करता हूं । सकारात्मक काम ही हर व्यक्ति को ऊर्जा प्रदान करता है, खुशी देता है ।
मेरा बड़ा बेटा प्रभात कुमार आज मेरे साथ ही काठमांडू में हैं, छोटा बेटा प्रशान्त कुमार विगत १५ साल से संयुक्त राज्य अमेरिका (न्यूयोर्क) में है । बेटी पूनम साह नेपाल वायुसेवा निगम में थी, अभी छोड़ दी है । मेरी जो भी साहित्यिक रचनाए हैं, उनमें पारिवारिक सदस्यों का भी साथ रहा है । विशेषतः मेरी धर्मपत्नी तारादेवी साह का हाथ महत्वपूर्ण है । बहू रीता का भी सहयोग रहा है । उन लोगों के सहयोग से ही मैं अपने लेखन कार्य को पूर्णता प्रदान कर पाता हूं । अर्थात् मुझे घर का कोई भी काम करना नहीं पड़ता है । इस मौके को फायदा उठा कर मैं अपने लेखन कार्य को आगे बढ़ाता हूं । संक्षेप में कहे तो उन लोगों के सहयोग से ही मैंने अपने जीवन को सार्थक बनाने की कोशिश की है ।
अब यहां सवाल उठ सकता हैं कि अपना जीवन सार्थक बनाने के लिए आप ने क्या किया ? हां, साहित्य और संस्कृति के लिए मैंने जो काम किया, वह सब देश और समाज के लिए ही तो है । इसी तरह मैंने अपनी मां के नाम में अपने ही गांव में एक प्राथमिक विद्यालय भी खोला था । अपनी व्यक्तिगत जमीन में और अपने ही निवेश में उक्त विद्यालय संचालित करना चाहता था । गांवघर में जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनको निःशुल्क शिक्षा मिल सके, इसी उद्देश्य के लिए मैंने स्कूल खोला था । लेकिन गांव की गन्दी राजनीति के कारण ‘पार्वती स्मृति विद्यालय’ नामक उक्त स्कूल अभी बंद है । इसके पीछे सरकारी नीति भी दोषी है । इससे पहले वि.सं. २०५५ साल में गांव में ही ‘पार्वती स्मृति पुस्तकालय’ नामक एक पुस्तकालय भी खोला था । लेकिन गांव में पढ़नेवाले लोग ज्यादा नहीं है, सिर्फ पुस्तकालय रखने से क्या होगा ? यही सोचकर पुस्तकालय में जितनी भी पुस्तकें थीं, सभी गांव के ही एक हाइस्कूल (नारायणहरि उपाध्याय हाइस्कूल) को दे दिया । मैंने ठान लिया कि कम से कम विद्यालय में रहे शिक्षक ओर विद्यार्थी तो उक्त पुस्तक को पढेंगे । इसीतरह मैंने पार्वती स्मृति पुरस्कार की भी स्थापना की है । जो १ लाख रुपयों के अक्षय–कोष राशि से प्राप्त होनेवाले ब्याज से चलता है । यह पुरस्कार निरन्तर १४ साल से दिया जा रहा है । एक साल हिन्दी भाषा के लिए काम करनेवाले को देते हैं तो दूसरे साल मैथिली भाषा–साहित्य के लिए काम करनेवालें को दे रहे हैं । यह रोटेशन जारी रहता है । पार्वती स्मृति पुरस्कार से सम्मानित होनेवालों में से एक पूर्व शिक्षा मन्त्री रामहरि जोशी भी हैं, हिन्दी साहित्य रचना के लिए उनको यह पुस्कार दिया गया था । बस अपने जीवन के विषय में सम्पूर्णता के साथ यही कह सकता हूँ कि कई मायनों में जीवन में रिक्तता रही पर मैंने उसमें ही सम्पूर्णता और सरसता की तलाश की और अपने आज से तुष्ट हूँ ।

प्रस्तुतिः लिलानाथ गौतम

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