Wed. Jul 15th, 2020

हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह,  उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह : मजरुह सुलतानपुरी

 

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हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह

इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है के एक जाम
हाथ आ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह

वो तो हैं कहीं और मगर दिल के आस पास
फिरती है कोई शय निगाह-ए-यार की तरह

सीधी है राह-ए-शौक़ प यूँ ही कभी कभी
ख़म हो गैइ है गेसू-ए-दिलदार की तरह

अब जा के कुच खुला हुनर-ए-नाखून-ए-जुनून
ज़ख़्म-ए-जिगर हुए लब-ओ-रुख़्सार की तरह

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‘मजरूह’ लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह

2दुश्मन की दोस्ती है अब अहले वतन के साथ
है अब खिजाँ चमन मे नए पैराहन के साथ

सर पर हवाए ज़ुल्म चले सौ जतन के साथ
अपनी कुलाह कज है उसी बाँकपन के साथ

किसने कहा कि टूट गया खंज़रे फिरंग
सीने पे ज़ख़्मे नौ भी है दाग़े कुहन के साथ

झोंके जो लग रहे हैं नसीमे बहार के
जुम्बिश में है कफ़स भी असीरे चमन के साथ

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मजरूह काफ़ले कि मेरे दास्ताँ ये है
रहबर ने मिल के लूट लिया राहजन के साथ

 

 

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