Wed. Jul 15th, 2020

नयन को घेर लेते घन, स्वयं में रह न पाता मन लहर से मूक अधरों पर व्यथा बनती मधुर सिहरन : नामवर सिंह

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पथ में साँझ

पथ में साँझ
पहाड़ियाँ ऊपर
पीछे अँके झरने का पुकारना ।

सीकरों की मेहराब की छाँव में
छूटे हुए कुछ का ठुनकारना ।

एक ही धार में डूबते
दो मनों का टकराकर
दीठ निवारना ।

याद है : चूड़ी की टूक से चाँद पै
तैरती आँख में आँख का ढारना ?

 

कभी जब याद आ जाते

नयन को घेर लेते घन,
स्वयं में रह न पाता मन
लहर से मूक अधरों पर
व्यथा बनती मधुर सिहरन ।

न दुःख मिलता, न सुख मिलता
न जाने प्रान क्या पाते ।

तुम्हारा प्यार बन सावन,
बरसता याद के रसकन
कि पाकर मोतियों का धन
उमड़ पड़ते नयन निर्धन ।

विरह की घाटियों में भी
मिलन के मेघ मंडराते ।

झुका-सा प्रान का अम्बर,
स्वयं ही सिन्धु बन-बनकर
ह्रदय की रिक्तता भरता
उठा शत कल्पना जलधर ।

ह्रदय-सर रिक्त रह जाता
नयन घट किन्तु भर आते ।

कभी जब याद आ जाते ।

फागुनी साँझ

फागुनी शाम अंगूरी उजास
बतास में जंगली गंध का डूबना

ऐंठती पीर में
दूर, बराह-से
जंगलों के सुनसान का कुंथना ।

बेघर बेपरवाह
दो राहियों का
नत शीश
न देखना, न पूछना ।

शाल की पँक्तियों वाली
निचाट-सी राह में
घूमना घूमना घूमना ।

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