बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ : राहत इन्दाैरी
ग़ज़ल अगर इशारों की कला है तो मान लीजिए कि राहत इंदौरी वो कलाकार हैं जो अपने अंदाज में झूमकर इस कला को बखूबी अंजाम देते हैं। डाॅ. राहत इंदौरी के शेर हर लफ्ज के साथ मोहब्बत की नई शुरुआत करते हैं, यही नहीं वो अपनी ग़ज़लों के जरिए हस्तक्षेप भी करते हैं। व्यवस्था को आइना भी दिखाते हैं। शारों शायरी की इस कड़ी में आज हम पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं डाॅ. राहत इंदौरी के कुछ चुनिंदा शेर-
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है
उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है
दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो
चारों तरफ़ दरिया की सूरत फैली हुई बेकारी है
जो होश आया तो देखा लहू लहू हम थे
घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है
दुश्मनों की भी राय ली जाए
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा
मगर नाटक पुराना चल रहा है
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ
मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए
आज दिल खोल कर भी पी जाए
यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी
इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए
गीली ज़मीन खोद के फ़रहाद हो गए
समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे
नींद रक्खो या न रक्खो ख़्वाब मेयारी रखो

