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कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को, खटक सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए : इकबाल

 

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल

लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे

अज़ाब-ए-दानिश-ए-हाज़िर से बा-ख़बर हूँ मैं

कि मैं इस आग में डाला गया हूँ मिस्ल-ए-ख़लील

अत्तार’ हो ‘रूमी’ हो ‘राज़ी’ हो ‘ग़ज़ाली’ हो

कुछ हाथ नहीं आता बे-आह-ए-सहर-गाही

अंदाज़-ए-बयाँ गरचे बहुत शोख़ नहीं है

शायद कि उतर जाए तिरे दिल में मिरी बात

अनोखी वज़्अ’ है सारे ज़माने से निराले हैं

ये आशिक़ कौन सी बस्ती के या-रब रहने वाले हैं

अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी

तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन

अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी

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ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है

आईन-ए-जवाँ-मर्दां हक़-गोई ओ बे-बाकी

अल्लाह के शेरों को आती नहीं रूबाही

आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं

महव-ए-हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जाएगी

इल्म में भी सुरूर है लेकिन

ये वो जन्नत है जिस में हूर नहीं

इश्क़ तिरी इंतिहा इश्क़ मिरी इंतिहा

तू भी अभी ना-तमाम मैं भी अभी ना-तमाम

इश्क़ भी हो हिजाब में हुस्न भी हो हिजाब में

या तो ख़ुद आश्कार हो या मुझे आश्कार कर

इसी ख़ता से इताब-ए-मुलूक है मुझ पर

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कि जानता हूँ मआल-ए-सिकंदरी क्या है

उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में

नज़र आती है उन को अपनी मंज़िल आसमानों में

उमीद-ए-हूर ने सब कुछ सिखा रक्खा है वाइज़ को

ये हज़रत देखने में सीधे-सादे भोले-भाले हैं

उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं

कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए

उसे सुब्ह-ए-अज़ल इंकार की जुरअत हुई क्यूँकर

मुझे मालूम क्या वो राज़-दाँ तेरा है या मेरा

ऋषी के फ़ाक़ों से टूटा न बरहमन का तिलिस्म

असा न हो तो कलीमी है कार-ए-बे-बुनियाद

एक सरमस्ती ओ हैरत है सरापा तारीक

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एक सरमस्ती ओ हैरत है तमाम आगाही

ऐ ताइर-ए-लाहूती उस रिज़्क़ से मौत अच्छी

जिस रिज़्क़ से आती हो परवाज़ में कोताही

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में

कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को

खटक सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए

कभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई है

बात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई है

कमाल-ए-जोश-ए-जुनूँ में रहा मैं गर्म-ए-तवाफ़

ख़ुदा का शुक्र सलामत रहा हरम का ग़िलाफ़

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