रेशम चौधरी की उम्रकैद : सजा या सफाया मधेश की राजनीति ? : श्वेता दीप्ति
श्वेता दीप्ति, काठमांडू | रेशम चौधरी की उम्रकैद सजा या सफाया मधेश की राजनीति में एक नए तरंग ने जन्म लिया है । पिछले एक साल से मधेशी दलों की यात्रा सिर्फ इंतजार की रही है और समय समय पर यह कहने की कि हम सरकार को समय दे रहे हैं ताकि सरकार उनसे किए गए वादे को पूरी कर सकें । पर जो हुआ वो सामने है न तो सरकार को समर्थन देने वाले मधेशी दलों की माँगों को सुना गया और न ही मधेश की जनता से जो वादे मधेशी दल ने किए थे वो पूरी हो सकी । मधेश की जनता राजपा और ससफो को एक साथ देखना चाहती थी पर अहं और वहम के चक्कर में यह भी अधर में ही लटका हुआ है ।
कुछ महीनों पहले राजपा प्रतिनिधि रेशम चौधरी को सरकार पर दवाब देकर काफी मशक्कत के बाद शपथ ग्रहण करवाने में सफल हो पाए थे । इतने से उन्हें यह तसल्ली तो हुई थी कि उसने एक काम तो किया । पर कैलाली जिला अदालत द्वारा टीकापुर घटना में आरोपित सांसद रेशम चौधरी को उम्रकैद की सजा सुनाने के बाद राजपा नेपाल आक्रोशित है । होना भी चाहिए क्योंकि पार्टीगत फैसले को स्वीकार कर रेशम चौधरी ने खुद ही अदालत के समक्ष पेश हुए थे जहाँ उन्हें गिरफ्तार किया गया । और जनता द्वारा भारी बहुमत से जीते प्रतिनिधि को अदालत ने उमकैद की सजा सुना दी ।
टीकापुर की घटना निःसन्देह दुखद घटना थी लेकिन उस दौर में मधेश की धरती पर जो भी हुआ था वो भी कम शर्मनाक नहीं था । पर वो सब आज कहीं पीछे छूट गया है । पर एक जो परिदृश्य सामने आ रहा है वह सोचने को जरुर विवश कर रहा है । क्या वजह है कि रेशम चौधरी को उम्र कैद की सजा सुनाई गई है । क्या सचमुच उनके खिलाफ पुख्ता सबूत है या इसके पीछे कोई खास वजह ? अदालत परिसर से ही डा. सीके राउत को गिरफ्तार किया गया और आज भी वो सलाखों के पीछे हैं । रेशम चौधरी बहुमत से जीते जनप्रतिनिधि हैं उन्हें उम्रकैद की सजा दी जा रही है क्या इसके पीछे इनकी प्रसिद्धि है जो सत्ता पक्ष में एक डर पैदा कर रहा है कि इनके पीछे की लहर तुफान का रुख न धारण कर ले ?
इसी देश में कुछ महीने पहले निमृला बलात्कार और हत्याकाँड जैसी नृशंस घटना घटी । सभी जानते हैं कि किस तरह इस घटना पर लीपापोती की गई और आज भी सरकार यह कह रही है कि इस घटना को सुलझाने में वर्षों लग सकते हैं जबकि सब कुछ आँखों के सामने है । तो क्या इसलिए इस पर कोई कारवाही नही हो रही कि आरोपी रसूख वाले हैं या उन्हें सुरक्षा दी जा रही है ? कुछ समय से विप्लव समूह सक्रिय है हाल ही में काठमान्डौ में हुए बम विस्फोट की घटना और एनसेल के टावरों को श्रृंखलाबद्ध तरीके से जलाने की घटना हुई । बम विस्फोट में एक व्यक्ति की जान भी गई पर गृहमंत्रालय द्वारा सूचना जारी करने पर नतीजा शून्य है क्या इसलिए कि सरकार को यह लग रहा है कि अभी इस समूह में कोई दम नहीं है या इसके पीछे जनसमुदाय नहीं है जिससे घबराने की नौबत है ?
रेशम चौधरी की सजा के बाद राजपा नेपाल ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया है है पर इसका क्या कोई असर होने वाला है ? वैसे अध्यक्ष राजेन्द्र महतो ने एक सवाल किया है कि अगर रेशम चौधरी को सजा मिली है तो प्रचण्ड, प्रधानमंत्री केपी ओली जिनपर न जाने कितने बेकसूरों क मौत का आरोप है उन्हें क्यों नहीं ? आज तक सत्यनिरुपण आयोग क्या कर रहा है ? कई सवाल एक साथ रेशम चौधरी की सजा के फैसले के बाद उठ खड़े हुए हैं जिसका अगर कोइृ जवाब है ताे यही कि सक्षम को नहीं दोष गुसाईं । पर पहले तो यह देखना है कि राजपा के समर्थन वापसी का कुछ असर होता भी है या नहीं, शायद नही क्योंकि राजपा नेपाल की स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि उसके इस कदम का सरकार पर कोई दवाब पड़े । पिछले कई दिनों से राजपा अध्यक्ष समूह प्रधानमंत्री से मिलने का समय माँग रहे थे किन्तु उन्हें कोई तबज्जोह नहीं दी गई क्या यह व्यवहार उन्हें अपनी स्थिति का अहसास नहीं करवा रही थी ? खैर देखना यह है कि सरकार से समर्थन वापसी और आन्दोलन करने की चेतावनी क्या रंग लाती है । वैसे एक तलवार प्रदेश नम्बर दो के सरकार पर भी लटक रही है । संघीयता को सरकार स्वीकार नहीं कर पा रही खास कर प्रदेश नम्बर दो की सरकार तो बिल्कुल नहीं क्योंकि यहाँ वर्तमान सरकार की पहुँच थोडी कम है ऐसे में स्वाभाविक है कि मुख्यमंत्री लालबाबु राउत की कुर्सी खतरे से खाली नहीं है । कब कौन सी गाज उनपर गिरेगी यह कहा नहीं जा सकता क्योंकि रास्ता साफ करने वाली नीति तोे दिख ही रही है । परन्तु मधेश में एक बार फिर हलचल होने वाली है इस अंदेशे से तो इनकार नहीं किया जा सकता है । रेशम चाैधरी काे उम्रकैद की सजा मिली ये सजा है या मधेश से सफाया इस पर मनन करने का समय जरुर है ।
मधेशी नेताओं के लिए मार्टिन की यह पंक्ति पर्याप्त है
First they came for the socialists, and I did not speak out—because I was not a socialist. Then they came for the trade unionists, and I did not speak out— because I was not a trade unionist. Then they came for the Jews, and I did not speak out—because I was not a Jew. Then they came for me—and there was no one left to speak for me. Quote by Martin, an activist who fought against Hitler.


