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तेरी आंखों की हद से बढ़कर हूं, दश्त मैं आग का समंदर हूँ : राहत इंदौरी

 
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दिल मेरा तोड़ते हो, लो तोड़ो
​चीज मेरी नहीं, तुम्हारी है।
डॉ. राहत इंदौरी उर्दू के जाने-माने शायर हैं। उनके कहने का अंदाज बिलकुल अलग है।
आग के फूलने​-​फलने का हुनर जानते हैं,
ना बुझा हमको के जलने का हुनर जानते हैं।
हर नए रंग में ढलने का हुनर जानते हैं,
लोग मौसम में बदलने का हुनर जानते हैं।
इंदौरी की शायरी एक खूबसूरत कानन है, जहां मिठास की नदी लहराकर चलती है। विचारों का, संकल्पों का पहाड़ है, जो हर अदा से टकराने का हुनर रखता है। फूलों की नाजुकता है, जो हर दिल को लुभाने का हुनर रखती है और खाइयों की-सी गहराई है, जो हर दिल को अपने में छुपाने का हुनर रखती है। वे हर रंग की शायरी करते हैं जिसमें प्यार, नफरत, गुस्से व मेल-मिलाप के रंग बिखरे पड़े हैं।
मेरी आंखों में कैद थी बारिश,
तुम ना आए तो हो गई बारिश।
आसमानों में ठहर गया सूरज,
नदियों में ठहर गई बारिश।
राहत अपनी शायरी में दो तरह से मिलते हैं​- ​एक दर्शन में और एक प्रदर्शन में। जब आप उन्हें हल्के से पढ़ते हैं तो केवल आनंद आता है, लेकिन जब आप राहत के दर्शन में, विचारों में डूबकर पढ़ते हैं तो एक दर्शन का अहसास हो जाता है। और जब आप दिल से पढ़ते हैं तो वह आपके दिलो-दिमाग पर हावी हो ​​जाएंगे और शायरी की मिठास में इतने खो जाएंगे कि बरबस ही शायरी आपके​ ​​होंठों पर कब्जा कर लेगी और आप उसके स्वप्निल संसार में गोते लगाए बिना नहीं रह पाएंगे।
तेरी आंखों की हद से बढ़कर हूं,
दश्त मैं आग का समंदर हूं।
कोई तो मेरी बात समझेगा,
एक कतरा हूं और समंदर हूं।
अजनबी ख़्वाहिशें , सीने में दबा भी न सकूँ |

ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे ,  कि उड़ा भी न सकूँ ||

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आँख में पानी रखो , होंटों पे चिंगारी रखो |
ज़िंदा रहना है तो , तरकीबें बहुत सारी रखो ||

रोज़ तारों को नुमाइश  में , खलल पड़ता हैं |
चाँद पागल हैं , अंधेरे में निकल पड़ता हैं ||

उसकी याद आई हैं , साँसों ज़रा धीरे चलो |
धड़कनो से भी इबादत में ,  खलल पड़ता हैं ||

ये हादसा तो किसी दिन , गुज़रने वाला था |
मैं बच भी जाता तो , इक रोज़ मरने वाला था ||

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ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं , मगर दिल अक्सर |
नाम सुनता हैं , तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं ||

अंदर का ज़हर चूम लिया , धुल के आ गए |
कितने शरीफ़ लोग थे , सब खुल के आ गए ||

दो गज सही ये  , मेरी मिलकियत तो हैं |
ऐ मौत तूने मुझे  , ज़मीदार कर दिया ||

मुझसे पहले वो किसी और की थी , मगर कुछ शायराना चाहिए था |
चलो माना ये छोटी बात है , पर तुम्हें सब कुछ बताना चाहिए था ||

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लेखक परिचय –
डॉ. राहत इंदौरी का जन्म इंदौर में 1 जनवरी 1950 को हुआ था। उन्होंने इंदौर विश्वविद्यालय में 16 वर्षों तक उर्दू साहित्य पढ़ाया तथा उर्दू की त्रैमासिक पत्रिका ‘शाखें’ का 10 वर्षों तक संपादन किया। अब तक उनके 6 कविता संग्रह प्रकाशित और समादृत हो चुके हैं। उन्होंने 50 से अधिक लोकप्रिय हिन्दी फिल्मों एवं म्यूजिक एलबमों के लिए गीत-लेखन भी किया है।
राहत इंदौरी मुशायरों में भाग लेने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, मॉरिशस, सऊदी अरब, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल आदि अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं तथा देश-विदेश के दर्जनों पुरस्कारों से सम्मानित हैं।

साभार – वाणी प्रकाशन

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