Sun. May 31st, 2020

मैं खामख्वाह हथेली पे जान रखता हूं अजीब शख्स हूं यारो, जुबान रखता हूं  नूर मुहम्मद नूर

 

एक जमाने से उर्दू का समझते हैं मुझे/एक मुद्दत से मैं हिंदी में गजल कहता हूं’ जैसी पंक्ति लिखने वाले नूर मुहम्मद नूर ने गजल जैसे उर्दू फॉर्म को हिंदी में कामयाबी से आजमाया है। उनकी कविता की ऊंचाई यह बताने के लिए काफी है कि वे एक फर्क भाषा में गजल को कितना गहस्थ बना चुके हैं। 

इश्क़ से इश्क़ के अंजाम की बातें होंगी

सुब्ह तक आप की फिर शाम से बातें होंगी

दूर मंज़िल है हवाएँ भी मुख़ालिफ़ सी हैं

दो घड़ी बैठो तो आराम से बातें होंगी

जिस तरह होती है रिंदों की ख़राबात से बात

इस तरह गर्दिश-ए-अय्याम से बातें होंगी

साक़िया अब तो इनायत की नज़र हो जाए

कब तलक मुझ से तही-जाम की बातें होंगी

नाज़ करते हैं अगर अपने ख़द-ओ-ख़ाल पे ये

आप के हुस्न की असनाम से बातें होंगी

इंक़लाब आए तो फिर हिम्मत-ए-मर्दां की क़सम

वक़्त की वक़्त के अहकाम से बातें होंगी

आओ कुछ हौसला-ए-दिल से भी लें काम ‘नूर’

कब तक अब हसरत-ए-नाकाम से बातें होंगी

काट कर भूमि से आसमान ले गया
पेट हमको कहां से कहां ले गया

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यहां की रीत अजब दोस्तो, रिवाज अजब
यहां ईमान फकत बेईमान रखते हैं

हक तुझे बेशक है, शक से देख, पर यारी भी देख
ऐब हम में देख पर बंधु! वफादारी भी देख

उजाला यहां से वहां तक परेशां
वही तम इधर भी वही तम उधर भी

बेहयाई, बेवफाई, बेईमानी हर तरफ
धीरे-धीरे मर रहा आंखों का पानी हर तरफ

बात से ही धुआं निकलता है
आदमी, आदमी से जलता है
एक नफरत ही बस नहीं ढलती
जबकि सूरज भी रोज ढलता है

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दर्द में दर्द की दवा की तरह
कौन मिलता है अब हवा की तरह

वक्त कितना कठिन बताएं क्या
अश्क तक आंख में नहीं होते
प्याज होता तो छील कर रोते

रखता मैं अपनी प्यास कहां तक संभाल कर
पीता हूं रोज-रोज समंदर उबाल कर

बदल कर चेहरा, अदाएं मुसलसल
जवां हो रही हैं, बलाएं मुसलसल
अभी तिश्नगी, तिश्नगी ही रहेगी
अभी गीत पानी के गाएं मुसलसल
(मुसलसल : लगातार, तिश्नगी : प्यास)

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फिर कहीं दहशत न होगी फिर न होंगी आफतें
आदमी की भीड़ में इंसान सुंदर चाहिए

चल नहीं सकती अगर दुनिया खुदाओं के बिना
दोस्तो फिर तो नया भगवान सुंदर चाहिए

मुझे अनजान रहने दे
मुझे बेनाम रहने दे
मुझे ए शायरी यूं ही
जरा गुमनाम रहने दे
बुरे इस वक्त में
शेर गर अच्छे लगें मेरे
तो मेरे शेर ले जा
और मेरा नाम रहने दे

मैं खामख्वाह हथेली पे जान रखता हूं
अजीब शख्स हूं यारो, जुबान रखता हूं

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