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फ़ासला तो है मगर कोई फ़ासला नहीं मुझ से तुम जुदा सही दिल से तुम जुदा नहीं ~शमीम करहानी

 

 

फ़ासले हमेशा बेचैनियां बढ़ाते हैं और शायरी के लिए एक वातावरण तैयार करते हैं। आशिक़ी में ये फ़ासले कभी दूर होकर भी क़रीब लगते हैं तो कभी क़रीब होकर भी दूर लगते हैं। शायरी इन फ़ासलों को कैसे लफ़्ज देती है, जानते हैं शायरों के चुनिंदा अल्फ़ाज़ों से-

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
~बशीर बद्र

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ज़ेहन ओ दिल के फ़ासले थे हम जिन्हें सहते रहे
एक ही घर में बहुत से अजनबी रहते रहे
~इफ़्फ़त ज़र्रीं

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था

सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था
~अदीम हाश

इश्क़ में भी सियासतें निकलीं
क़ुर्बतों में भी फ़ासला निकला
~रसा चुग़ताई

दुनिया तो चाहती है यूँही फ़ासले रहें
दुनिया के मश्वरों पे न जा उस गली में चल
~हबीब जालिब

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पहले हम ने घर बना कर फ़ासले पैदा किए

फिर उठा दीं और दीवारें घरों के दरमियाँ
~बशीर फ़ारूक़ी

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता
~बशीर बद्र

भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले
न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई
~बशीर बद्र

होंटों के पास आ न सका जाम उम्र-भर
हालाँकि फ़ासला ये कोई फ़ासला न था
~डी. राज कँवल

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एक दुनिया का सफ़र है उस के मेरे दरमियाँ
फ़ासले ही फ़ासले हैं नापती रहती हूँ मैं
~जानाँ मलिक

फ़ासला तो है मगर कोई फ़ासला नहीं
मुझ से तुम जुदा सही दिल से तुम जुदा नहीं
~शमीम करहानी

मक़्तूल की जबीं पे है क़ातिल लिखा हुआ
क्या फ़ैसला हो कल सर-ए-दरबार देखना
~इम्तियाज़ साग़र

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