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पुण्य तिथि पर

डा श्वेता दीप्ति

नेपाल को केन्द्र में रखकर रेणु ने तीन रिपोर्ताज लिखे हैं। (1) सरहद के उस पार (2) विराट नगर की खूनी दास्तान (3) हिल रहा हिमालय (नेपाली क्रांति कथा)। ये रिपोर्ताज नेपाल में हुए आंदोलन का प्रामाणिक दस्तावेज है, जो कि आज इतिहास बन चुका है। ‘सरहद के उस पार’ का प्रकाशन 2 मार्च 1947 को पटना से प्रकाशित पत्र ‘जनता’ में हुआ था। विराटनगर के मिल-मजदूरों पर राणाशाही के सहयोग से पूंजीपतियों द्वारा ढाये जा रहे जुल्म का चित्रण करते हुये रेणु ने सरहद पार की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्थिति का विवरण प्रस्तुत किया हैं। इसके प्रकाशन के बाद विराटनगर के मिल-मजदूरों का जुझारू आंदोलन शुरू हुआ।

 

फणीश्वरनाथ रेणु (जन्म : 4 मार्च, 1921 – मृत्यु : 11 अप्रैल, 1977) एक सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार थे। हिंदी कथा साहित्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म बिहार के पूर्णिया जिला के औराही हिंगना गांव में हुआ था। रेणु के पिता शिलानाथ मंडल संपन्न व्यक्ति थे। भारत के स्वाधीनता संघर्ष में उन्होंने भाग लिया था। रेणु के पिता कांग्रेसी थे। रेणु का बचपन आजादी की लड़ाई को देखते-समझते बीता। रेणु ने स्वयं लिखा है-पिताजी किसान थे और इलाके के स्वराज-आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता। खादी पहनते थे, घर में चरखा चलता था। स्वाधीनता संघर्ष की चेतना रेणु में उनके पारिवारिक वातावरण से आई थी। रेणु भी बचपन और किशोरावस्था में ही देश की आजादी की लड़ाई से जुड़ गए थे। 1930-31 ईस्वी में जब रेणु अररिया हाई स्कूल के चौथे दर्जे में पढ़ते थे, तभी महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद अररिया में हड़ताल हुई, स्कूल के सारे छात्र भी हड़ताल पर रहे। रेणु ने अपने स्कूल के असिस्टेंट हेडमास्टर को स्कूल में जाने से रोका। रेणु को इसकी सजा मिली, लेकिन इसके साथ ही वे इलाके के बहादुर सुराजी के रूप में प्रसिद्ध हो गए।

रेणु की प्रारंभिक शिक्षा फॉरबिसगंज तथा अररिया में हुई। रेणु ने प्रारंभिक शिक्षा के बाद मैट्रिक नेपाल के विराटनगर के विराटनगर आदर्श विद्यालय से कोईराला परिवार में रहकर की। रेणु ने इंटरमीडिएट काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 1942 में की और उसके बाद वह स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। 1950 में रेणु ने नेपाली क्रांतिकारी आंदोलन में भी भाग लिया। रेणु ने स्वयं को न केवल लोकप्रिय कथाकार के रूप में स्थापित किया, बल्कि हर जोर-जुल्म की टक्कर में सड़कों पर भी उतरते रहे, भारत से नेपाल तक। उन्होंने वर्ष 1975 में आपातकाल का विरोध करते हुए अपना ‘पद्मश्री’ सम्मान लौटा दिया था।

निस्संदेह, ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’, ‘मैला आंचल’, ‘परती परिकथा’ जैसी कृतियों के शिल्पी रेणु ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सहज रूप में काफी कुछ कह दिया है।

रेणु जी का मैला आंचल वस्तु और शिल्प दोनों स्तरों पर सबसे अलग है। इसमें एक नए शिल्प में ग्रामीण-जीवन को चित्रित किया गया है। इसकी विशेषता है कि इसका नायक कोई व्यक्ति (पुरुष या महिला) नहीं वरन् पूरा का पूरा अंचल ही इसका नायक है। मिथिलांचल की पृष्ठभूमि पर रचे इस उपन्यास में उस अंचल की भाषा विशेष का अधिक से अधिक प्रयोग किया गया है। यह प्रयोग इतना सार्थक है कि वह वहां के लोगों की इच्छा-आकांक्षा, रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार, सोच-विचार को पूरी प्रामाणिकता के साथ पाठक के सामने उपस्थित करता है। इसकी भूमिका 9 अगस्त 1954 को लिखते हुए रेणु कहते हैं-यह है मैला आंचल, एक आंचलिक उपन्यास। इस उपन्यास के केंद्र में है बिहार का पूर्णिया जिला, जो काफी पिछड़ा है। रेणु कहते हैं, इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी, मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया।

रेणु ऊपर से जितने सरल, मृदुल थे, अंदर से उतने ही जटिल भी। उन्होंने अपनी कहानियों, उपन्यासों में ऐसे पात्रों को गढ़ा, जिनमें दुर्दम्य जिजीविषा देखने को मिलती है। उनके पात्र गरीबी, अभाव, भुखमरी व प्राकृतिक आपदाओं से जूझते हुए मर तो सकते हैं, लेकिन परिस्थितियों से हार नहीं मानते।

ग्रामीण जीवन शैली उनकी पहचान थी, और इसी की बदौलत वह गांव के अंतिम आदमी के दिल की गहराइयों में झांक पाते थे। उसकी दर्द पीड़ा को समझ पाते थे। उनमें जनता की पीड़ा में स्व का विलय कर एकात्म हो जाने की अदभुत कला थी। दरअसल वह कलाकार की तरह रियल लाईफ से जो अनुभव प्राप्त करते, उसे वह कागज के पन्नों पर कुषल कलमकार की भांति सजीवता प्रदान करते थे। रेणु के शब्द और कर्म में भी कोई फर्क नहीं था। वह सामाजिक सच्चाइयों में रचे-बसे थे। पार्कर 51 कलम से रेणु ने सामाजिक-राजनैतिक आंदोलन, युद्ध, बाढ, अकाल, सुखाड़, ग्रामीण संस्कृति, फिल्म, अध्यात्म आदि विषयों पर केन्दित रिपोर्ताज लिखा है। इनका रिपोर्ताज महज रिपोर्टिंग नहीं वरन समय, काल, और परिस्थति के अनुसार समाज के बदलते सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, साहित्यिक व सांस्कृतिक मूल्यों का दस्तावेज है जिसमें देशज रेणु का देहाती दुनिया से लेकर माया नगरी मुम्बई में प्राप्त की गई अनुभूतियों का वर्णन है। इनके रिपोर्ताजों में देश –दुनियां के समाज में घटित हो रही घटनाओं की झलक मिलती है।

सन 1945 में ‘विदापद नाच’से शुरू हुयी परंपरा 1975 के पटना जल प्रलय के बाद थम गया। लगभग तीस वर्षो के लेखन काल में रेणु ने साहित्य की विभिन्न विधाओं के सांचों में रिपोर्ताज को ढा़ला, जिसने राष्ट्रीय व मानवीय सत्य से जुड़कर शाश्वत साहित्य का रूप धारण किया। रेणु-रचित रिपोर्ताजों का विषय वैविध और व्यापक है। भारत और नेपाल की समय के साथ बदलती सामाजिक स्थितियां और बदलते राजनैतिक मुकाम, जनता की जनसमस्या व जनआंदोलन, साहित्य, संस्कृति और फिल्म आदि विषयों पर रेणु ने रिपोर्ताज लिखा है। बदलती विषय-वस्तु के साथ लेखन-शैली में भी बदलाव देखने को मिलता है जिससे लेखक की मनोदशा, आस्था और लगाव से परिचित होने का मौका मिलता हैं। भारत यायावर रेणु के रिपोर्ताजों के संबंध में लिखते हैं कि ‘ रेणु का महत्व इसलिए भी है कि वह अपनी ही बनाई सीमा को बार-बार दूसरी रचना में तोड़ते हैं ।‘ रेणु आंचलिकता के जन्मदाता हैं और देशज अस्मिता के पहले कलमकार। इनके रिपोर्ताजों में धूल के साथ फूल , कीचड़ में कमल के साथ लोकसंस्कृति , लोकरंग, सामाजिक व मनोवैज्ञानिक चेतना का प्रवाह देखने को मिलता है। रेणु वर्तमान परिस्थति से अवगत कराते हुये पुरानी स्मृति को भी याद दिलाते है और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं से परिचित कराते है।

नेपाल को केन्द्र में रखकर रेणु ने तीन रिपोर्ताज लिखे हैं। (1) सरहद के उस पार (2) विराट नगर की खूनी दास्तान (3) हिल रहा हिमालय (नेपाली क्रांति कथा)। ये रिपोर्ताज नेपाल में हुए आंदोलन का प्रामाणिक दस्तावेज है, जो कि आज इतिहास बन चुका है। ‘सरहद के उस पार’ का प्रकाशन 2 मार्च 1947 को पटना से प्रकाशित पत्र ‘जनता’ में हुआ था। विराटनगर के मिल-मजदूरों पर राणाशाही के सहयोग से पूंजीपतियों द्वारा ढाये जा रहे जुल्म का चित्रण करते हुये रेणु ने सरहद पार की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्थिति का विवरण प्रस्तुत किया हैं। इसके प्रकाशन के बाद विराटनगर के मिल-मजदूरों का जुझारू आंदोलन शुरू हुआ। विराटनगर में पूँजीपतियों और राणाशाही के बीच सांठ-गांठ पर प्रहार करते हुए रेणु लिखते हैं ‘‘ यह उन्हीं सांपों की (चमड़िया, सिहानियां की) वादियाँ हैं, जिसमें वे आराम से लेटे नेपाल सरकार द्वारा दूध-लावा पाकर जहरीले सांपो की आबादी बढ़ा रहे हैं।‘ मजदूरों के साथ पशुवत् व्यवहार करने में जुटे मिल-मालिक ने मजदूरों को हक मागने तक का अधिकार नहीं दिया था। यूनियन बनाने से लेकर हड़ताल करने पर भी पाबंदी थी। लेकिन जहालत के गर्त में खींचने वाली सुविधाओं यथा मदिरालय, वेश्यालय, और जुए के अडडे का अंबार था। मजदूरों के बीच भूमिगत होकर मजदूरों को संगठित करने में जुटे रेणु महसूस करते हैं कि – ‘‘ बहुत जल्द ही इन पूंजीपतियों के घर में नेपाल राज्य बंधक पड़ जाएगा।‘ नेपाली समुदाय के अंदर सोयी वीरता जगाने में जुटे रेणु का अटूट विश्वास है कि जनता जागेगी और जनक्रांति का आगाज करेगी। रिपोर्ताज के प्रकाशन के साथ ही रेणु के क्रांतिकारियों ने साकार रूप धारण किया। इस रिपोर्ताज के प्रकाशन के महज दो दिन बाद विराटनगर के मजदूरों का ऐतिहासिक आंदोलन प्रारंभ हुआ। दरअसल इस रिपोर्ताज की रचना प्रक्रिया के पीछे छुपा था रेणु का संघर्ष। इस आंदोलन को कुचलने के लिये राणाशाही ने खूनी रास्ता अख्तियार किया था। राणाशाही की गोलियों से कई लोगों की मौत हुई, कई घायल हुये, इसी आन्दोलन में रेणु को गोली भी लगी थी। आंदोलनरत रेणु ने ‘विराटनगर की खूनी दास्तान’ नामक एक रिपोर्ताज उसी समय लिखा, जो स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ। लेकिन यह अभी तक अनुपलब्ध है। मजदूरों के आन्दोलन का नेतृत्व समाजवादी कर रहे थे। रेणु के प्रयास से कोइराला परिवार भी इस आंदोलन में शरीक हो गये। कोइराला परिवार का सहयोग मिलते ही यह आन्दोलन संपूर्ण नेपाल में फैल गया। राणाशाही के खिलाफ पहली बार नेपाली जनता सड़कों पर उतरी थी, हांलाकि इसे अंततः दबा दिया गया। इस आन्दोलन में रेणु भी गिरफ्तार हुए थे। जेल में इनके साथ काफी सख्ती बरता गया, जेल में भोगे हुये कष्ट को केन्द्र में रखकर ‘डी0एस0पी0 साहब की बड़ी-बड़ी मूंछे ’ नामक रिपोर्ताज लिखा जिसे पुस्तिकाकार रूप में प्रकाशित करवाया था, यह भी अनुपलब्ध है। सारांशतः रेणु के संघर्ष और उनके रिपोर्ताज ने नेपाली क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार करने में अहम भूमिका निभायी।

1950 में पुनः राणाशाही के खिलाफ दूसरा सशस्त्र संग्राम शुरू हुआ, जिसे नेपाली क्रांति भी कहा जाता है। अंततः राणाशाही ध्वस्त हुई। 1951 में नेपाल में पहली बार प्रजातंत्र की स्थापना हुई। नेपाल में हिस्सा लेने वाले पूर्णिया के दशरथ शाह कहते हैं ‘‘ नेपाली क्रांति में रेणु पीठ पर वायरलेस कंधे पर बंदूक लेकर राणाशाही के खिलाफ लड़े थे। वह इस क्रांति की दिशा तय करने वालों में थे।’दरअसल आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में रेणु की अहम भूमिका थी। इस आंदोलन केन्द्र में रखकर रेणु ने ‘जनता’में  ‘हिल रहा हिमालय’ नामक धारावाहिक रिपोर्ताज लिखा था। दुर्भाग्य से यह रिपोर्ताज उपलब्ध नहीं है। नेपाली क्रांति के बीस वर्षों के बाद रेणु ने संस्मरण के आधार पर पुनः लिखा। ‘दिनमान 1971 के अंकों में किस्तवार प्रकाशित रेणु की रचनाएं युद्ध रिपोर्टिंग का अदभुत नमूना है। दरअसल में यह नेपाली जनता के लिए जागरण गीत है, जिसे गाते हुये आम जनता ने लोकशाही की स्थापना हेतु लगभग डेढ़-दो माह तक राणाशाही के खिलाफ सशत्र संघर्ष किया था। यह संघर्ष शोषण से मुक्ति का और राणाशाही के राक्षसी कुकृत्य पर मानवीयता के विजय का प्रतीक है। रेणु ने पात्रों के माध्यम से घटना का संपूर्ण विवरण प्रस्तुत किया है। युद्धक्षेत्र भारत नेपाल सीमा से लेकर काठमांडू तक फैला है। विराटनगर स्थित कोइराला निवास, मालखाना, जेल से लेकर वीरगंज , धनकुटटा और कोषी के कुशहाघाट से पटना तक में हो रही घटनाओं का लेखाजोखा है। युद्धभूमि में रायफल से लेकर मषीनगण की तरतराहट और बम गोलों के धमाकों के बीच राणाशाही सैनिकों से लोहा लेते सैनिकों की वीरगाथा का विवरण कथा को रोचक बनाती है। शंकरजंग, हिरण्यजंग, सरीखे नौजवानों का युद्ध के मैदान में कूदना  और बीच-बीच में कोइराला की जीवनी का चित्रण प्रेरणा प्रदान करते हैं। इस युद्ध में संघर्ष , हर्ष, विषाद , अवसाद व उल्लास के क्षण को रेणु जीते हुये प्रतीत होते हैं। यह युद्ध पाश विकता पर मानवीयता की जीत का भी प्रतीक है। वृद्ध, अपाहिज व मरीजों की हत्या जलती हुई लाशों के बीच रोते बिलखते चीखते चिल्लाते बच्चों को चुप्प कराते बी0 पी0 कोईराला का यह दृश्य पाशविकता पर मानवीयता का प्रतीक है।

फणीश्वरनाथ रेणु को अपने प्रथम उपन्यास मैला आंचल के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

रेणु सरकारी दमन और शोषण के विरुद्ध ग्रामीण जनता के साथ प्रदर्शन करते हुए जेल गए। रेणु ने आपातकाल का विरोध करते हुए अपना पद्मश्री का सम्मान भी लौटा दिया। इसी समय रेणु ने पटना में लोकतंत्र रक्षी साहित्य मंच की स्थापना की। इस समय तक रेणु को पैप्टिक अल्सर की गंभीर बीमारी हो गई थी। 11 अप्रैल 1977 ई. को रेणु उसी पैप्टिक अल्सर की बीमारी के कारण चल बसे।

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