दीया क्यों प्रेम की अग्नि परीक्षा सिता ने राम को…… (कविता) : विशाल के सी
प्रेम की अग्नि परीक्षा
दीया क्यो
प्रेम की अग्नि परीक्षा
सिता ने राम को
क्या वनवास के सेवा से
मन नहीं भरा था
दशरथ नंदन का
अभी -अभी तो आई थी
मलय, तरुशिखा की बन भोज कर के
फिर केसे
क्यों आई रजनी सा जीवन
जानकी के अरुण में
वीरा क्षितिज के पल काटी
पुनः मधुमय जीवन होना था
राम-सीता को अयोध्या का फिर से होना था
केसे शब्द निकाला धबोन के स्वामी ने
निज घर रहे जो क्लेश
कैसे जोड़ दिया जानकी संग
बने निशब्द राम
फिर प्रमाण मर्यादा पुरुषोत्तम का दिया
भौर के आगन में कौतूहल मौन रहकर देखन लागे
और
पाण से प्यारे नाथ को करी अलविदा ।
दे कर जानकी ! प्रेम की अग्नि परीक्षा
देखो लौट जनक नंदिनी फिर से
मलय, तरुशिखा की बन भोज कर ने



