मधेशी मोर्चा की बल्ले बल्ले
आखिरकार मधेशी मोर्चा ने वह कर दिखाया है जिसकी उम्मीद शायद किसी को भी नहीं थी। पहली बार सरकार बनाने की चाभी अपने हाथों में रखकर मधेशी मोर्चा ने कांग्रेस और एमाले जैसी पुरानी और बडी पार्टियों किनारा लगा दिया है। इतना ही नहीं माओवादी को सरकार बनाने में निर्ण्यक भूमिका निभाने वाले मधेशी मोर्चा के नेताओं ने अपने ऊपर लगाए जाने वाले तमाम इल्जाम को गलत साबित करते हुए और कई भ्रम को भी तोडा है। अब तक मधेशी मोर्चा पर या मधेशी पार्टियों पर सिर्फसत्ता के लिए लालायित रहने,सत्ता के लिए विभाजित होने,सत्ता के लिए कुछ भी समझौता करने जैसे तमाम आरोपों को गलत साबित कर दिखाया है। इस बार मोर्चा से आबद्ध दल सत्ता में जरूर गए हैं लेकिन अपने दम पर अपनी शर्तां पर। मोर्चा में बिना विभाजन हुए ही एक साथ निर्ण्र्ााकर मोर्चा ने अपनी एकजुटता दिखाई है। माओवादी सरकार को र्समर्थन कर मोर्चा अपने ऊपर लगाए जाने वाले उस आरोप को भी गलत साबित कर दिया है कि सिर्फदक्षिण के इशारे पर कांग्रेस की पिछलग्गू बनी रहती है मधेशी मोर्चा। लेकिन इसबार सत्ता में जाने के लिए मोर्चा ने अपनी शर्ताें पर समझौता कर माओवादी को भी उसे मानने के लिए मजबूर कर दिया है।
सरकार में शामिल होने और र्समर्थन को लेकर मीडिया में आई तमाम खबरों को झुठा साबित कर दिया है। नेपाल की मधेश विरोधी राष्ट्रीय मीडिया में हमेशा मोर्चा में विभाजन, मोर्चा में विवाद जैसी खबरें प्रकाशित कर मधेशी मोर्चा की छवि को नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाता था लेकिन जब मोर्चा ने एकबद्धता का परिचय देते हुए माओवादी सरकार को अपनी शर्ताें पर र्समर्थन देने की घोषणा की तो मधेश विरोधी राष्ट्रीय मीडिया भी दंग रह गई। अब मधेश विरोधी यह कहने लगे कि मंत्रालय को लेकर पार्टियों विभाजन हो जाएगा। मधेशी मोर्चा को छोटा मोटा मंत्रालय देकर खुश कर दिया जाएगा। तो इस बात को भी मोर्चा के नेताओं ने गलत साबित कर दिया है। यह पहली बार है कि मधेशी नेताओं के हिस्से में गृह, रक्षा, संचार, पर्यटन जैसी महत्वपर्ूण्ा मंत्रालय की जिम्मेवारी दी गई है। और किसी को यह गलतफहमी ना हो कि यह खैरात में मिला हो । बल्कि अपनी एकजुटता की बदौलत हासिल की गई है। मधेशी मोर्चा को ११ सहित मधेशी दल को कुल १५ से अधिक मंत्रालय मिला है।
मधेशी मोर्चा के विरोधी और आलोचक अभी भी मोर्चा को शंका की निगाह से देखते हैं। यह सब उनके दृष्टिदोष का नतीजा है। माओवादी को र्समर्थन करने और सरकार में शामिल होने की बात पर यह कहते सुना गया है कि सत्ता के बिना मधेशी पार्टियां नहीं रह सकती है। ऐसे लोगों की मानसिकता मधेश विरोधी है। वो मधेश और मधेशी को कभी भी आगे बढता हुआ नहीं देखना चाहते हैं। यह आरोप कांग्रेस पर क्यों नहीं लगाया जाता है जिनके नेता १७ बार चुनाव हारने के बाद भी सत्ता के लिए बेशर्माें की तरह १८वीं बार भी रेस में खडे दिखते हैं। यह आरोप एमाले पर क्यों नहीं लगाते हैं जो सत्ता में जाने के लिए कभी माओवादी तो कभी कांग्रेस को सीढी की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह दोष माओवादी पर क्यों नहीं लगाते हैं जो सत्ता में जाने के लिए राष्ट्रीयता के नाम पर देश को ही ठप्प कर देते हैं। यह आरोप सिर्फमधेशी पार्टियों पर क्यों –
दूसरा आरोप लगता है कि सत्ता में जाने के लिए मधेशी पार्टियां अपने सिद्धांतों से समझौता करते हैं। अरे ऐसे आरोप लगाने वाले मर्ूख लोगों से कोई यह तो पूछे कि कांग्रेस एमाले और माओवादी सत्ता में जाने के लिए अपने सिद्धांतों को ही छोड देते हैं। कम से कम मधेशी पार्टियां अपना मधेश का मुद्दा को तो बचाए ही रखा है। और हर बार मधेशी मुद्दा को उठाती ही है।
मोर्चा के नेताओं पर भारत परस्त होने का आरोप लगाया जाता है। यह स्वाभाविक भी है कि मधेशी पार्टर्ीीारत से निकट है। इसके पीछे कई कारण है कि भारत के लोगों से उनका सीधा रिश्ता होता है खून का रिश्ता। उनकी भाषा बोली भेष सामाजिक सांस्कृतिक रीति रिवाज सब कुछ भारत से मिलता जुलता है। तो ऐसे में भारत से निकट नहीं रहेंगे तो क्या चीन से निकट रहेंगे – भारत से विशेष लगाव स्वाभाविक भी है। लेकिन सिर्फमधेशी दल पर यह आरोप लगाने वालों की आंख में रतौंधी तो नहीं हो गई है। मधेशी नेता जब दिल्ली जाते हैं तो तरह तरह की अफवाहें उर्डाई जाती है लेकिन जब कोई कोइराला खानदान कोई थापा और राणा खानदान और दिखावटी वामपंथी तथा अपने आपको क्रान्तिकारी कहने वाले वामपंथी नेता दिल्ली की शरण में षाष्टांग करते हैं तो यहां की मीडिया को क्या सांप सूघ जाता है। क्यों प्रचण्ड के भारतीय नेताओं से मिलने पर इन्हें भारत परस्ती नजर नहीं आती है – क्यों खनाल के दिल्ली बुलाहट की छटपटी को मीडिया सर्ुर्खियां नहीं बनाती है। यहां के तथाकथित बुद्धिजीवी और तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार मधेश विरोधी मानसिकता से ग्रसित हैं जिस वजह से सिर्फमधेशी दलों का ही दोष उन्हें दिखता है।
आज मधेशी मोर्चा ने वह कर दिखाया है जो किसी भी दल ने नहीं किया था। माओवादी को अपनी शर्ताें पर र्समर्थन देकर उनसे सभी अहम मंत्रालय झटक लेना मधेशी मोर्चा और मधेश आन्दोलन की एक बडी उपलब्धि है। इसे कोई कितना भी नकारात्मक रूप से देखे लेकिन इस बार सरकार में जिस मजबूती से मधेशी मोर्चा उभर कर सामने आ रही है उससे सलाम करना ही होगा। मधेश विरोधी मानसिकता इसे कभी भी नहीं पचा सकती है। और इसलिए वो बे सिर पैर की बाते करते रहेंगे। तर्क कर्ुतर्क करते रहेंगे। लेकिन यह मधेशी जनता के लिए एक बडी जीत है। और उन्हें गर्व करने का एक और अवसर मिला है।

