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नेपाल को अगर किसी चीज की आवश्यकता है तो वह है स्थिरता और विकास की : डा. श्वेता दीप्ति

 

द्वन्द्व के आसारः त्रास में देश !

हिमालिनी, अंक अप्रील 2019 | रेशम चौधरी को उम्र कैद, डॉ.सी के राउत का खुली राजनीति में आना, विप्लव संचालित ‘कम्युनिष्ट पार्टी ऑफ नेपाल’ पर सरकार द्वारा प्रतिबन्ध लगाना और संजय टकला को उम्र कैद मिलना ये हैं गत महीने की सर्वाधिक चर्चित घटनाएँ । नेपाल की राजनीति में बिलकुल अप्रत्यासित रहा यह सब । इसमें सबसे अधिक नेपाली जनता के लिए आश्चर्य का विषय कोई था, तो वह था सीके राउत की जमानत और खुली राजनीति में आने के लिए सरकार से की गई सहमति । एक ऐसा व्यक्ति जिसपर देशद्रोह का आरोप समय–समय पर लगता रहा हो और उसे हिरासत में लिया जाता रहा हो, वह अचानक नेपाल की राजनीति का हिस्सा बन जाता है विषय आश्चर्य का तो है ही । किन्तु इस समस्या के समाधान की सही सूरत सम्भवतः यही थी । सीके राउत की जमानत ठीक उस वक्त हुई जब मधेश में रेशम चौधरी को मिली उम्रकैद का मसला गरमा रहा था । ठीक उसी वक्त निर्मला बलात्कार में आरोपित अधिकारियों द्वारा खुद को अदालत के सामने समर्पण करना भी हुआ । ऐसे में आम जनता का दिमाग रेशम चौधरी के मुद्दे से हटकर सीके राउत में उलझ गया । क्योंकि रेशम चौधरी की सजा के दायरे में सत्तासीन शासक भी सवाल के घेरे में आ रहे हैं । सवाल यह उठ रहा है कि अगर रेशम चौधरी को सजा मिल रही है तो जनआन्दोलन के नाम पर खून बहाने वाले शासक कैसे बने हुए हैं ? रेशम चौधरी या संजय साह वो नाम बन सकता है जो एक बार फिर आन्दोलन की नींव बन सकता है, ऐसे में एक ज्वलंत सवाल नेपाल की राजनीति और देश की अवस्था को देखकर उठ रहा है क्या नेपाल पुनः द्वन्द्ध की दिशा में जा रहा है ?

द्वन्द्व के आसार
नेपाल की जनता जिस बंद और बम से बच कर राहत का साँस ले रही थी वो एक बार फिर त्रास के साए में जीने को विवश है । यह डर निराधार भी नहीं है । राजधानी काठमांडू में बीती २२ फरवरी को टेलीकाम कंपनी ‘एन्सेल’ के दफ्तर के बाहर धमाका हुआ । इसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई जबकि दो अन्य घायल हो गए । इसी दिन देशभर में कंपनी के दर्जनभर से ज्यादा मोबाइल टावरों को भी निशाना बनाया गया । इसके दो दिन बाद ‘कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल’ के नेता नेत्र बिक्रम चंद ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली । चंद का कहना था कि उन्होंने एन्सेल पर इसलिए हमले करवाए क्योंकि यह कंपनी नेपाल सरकार का करोड़ों रूपये का टैक्स नहीं चुका रही है और जो भी कंपनी ऐसा करेगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा । उन्होंने हमले में एक नागरिक के मारे जाने पर मापÞmी भी मांगी ।
इन ताबड़तोड़ हमलों से पूरे देश में हलचल मच गई एक बड़े तबके में चिंता इस बात को लेकर भी उठी कि इस हमले की जिम्मेदारी एक ताकतवर माओवादी नेता ने ली है । इन हमलों के अलावा भी पिछले छह से आठ महीनों में नेपाल में बहुत कुछ ऐसा हुआ है जिसके बाद यह सवाल सामने आ रहा है कि क्या नेपाल में एक बार फिर अशांति आने वाली है और क्या फिर इस हिमालयी देश में माओवाद अपने पैर पसारने लगा है ।

बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय
कहावत है बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय । नेत्र बिक्रम चंद एक समय माओवादी नेता पुष्प कमल दहाल ‘प्रचंड’ के सहयोगी और प्रिय हुआ करते थे । इन लोगों ने मिलकर १९९६ में कम्युनिस्ट पार्टी आपÞm नेपाल (माओवादी) बनाई थी । जिसके जनयुद्ध की कहानी इतिहास में शामिल है जहाँ हजारों निरपराधों की मौत का दर्द भी आज तक जिन्दा है । इस पार्टी ने करीब ज्ञण् साल तक सरकार के खिलाफ सशस्त्र लड़ाई लड़ी थी । साल द्दण्ण्टमें पुष्प कमल दहाल ‘प्रचंड’ ने शांति प्रक्रिया में शामिल होने और राजनीति में आने का फैसला किया । द्दण्ज्ञद्द में प्रचंड की पार्टी में टूट हुई. पार्टी के तीन प्रमुख नेता मोहन वैद्य, राम बहादुर थापा और नेत्र बिक्रम चंद ने एक अलग पार्टी बना ली ।
अपनी ही पार्टी से असंतुष्ट ये समय–समय पर सरकार के विरोध में सामने आते रहे । तब इन तीनों नेताओं का कहना था कि ये देश में फिर क्रांति की अलख जगायेंगे । इनके मुताबिक प्रचंड ने माओवादियों के साथ धोखा किया है, उन्होंने हजारों कैडर के उस सपने को तोड़ दिया जो सशस्त्र विद्रोह के जरिये सत्ता पर कब्जा करना चाहते थे ।

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इसके दो साल बाद द्दण्ज्ञद्ध में नेत्र बिक्रम चंद अपने दोनों साथियों मोहन वैद्य और राम बहादुर थापा से भी अलग हो गए और अपनी एक नई पार्टी ‘कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल’ का गठन किया. चंद का दावा है कि इस समय नेपाल में केवल उनकी पार्टी है, जो माओवादी विचारधारा के तहत काम कर रही है इसलिए वही असली माओवादी पार्टी है. साल द्दण्ज्ञट में एक चौंकाने वाले घटनाक्रम के तहत राम बहादुर थापा फिर प्रचंड की पार्टी में वापस पहुंच गए और आज वे इस समय केपी ओली की सरकार में गृहमंत्री हैं ।

पिछले कुछ महीनों में चंद माओवादी गुट की ताकत में जिस तरह से इजाफा हुआ है उससे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और सत्ताधारी पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता प्रचंड काफी चिंतित हंै । सबसे अधिक उन्हें अपनी जान की चिन्ता है । जान लेना आसान होता है, पर जब खुद पर बात आती है तो डर से परिचय होता है । इसी डर के कारण प्रचंड ने सार्वजनिक रूप से कहा भी है कि वे चंद गुट की हिट लिस्ट में सबसे ऊपर हैं ।

वैसे देखा जाय तो कुछ समय पहले तक चंद गुट को सरकार गंभीरता से नहीं ले रही थी, क्योंकि इसकी ताकत बहुत कम और सीमित इलाकों तक ही थी । लेकिन आज यह मानना होगा कि पिछले साल नई सरकार के गठन के बाद से यह माओवादी गुट सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है । बीते कुछ महीनों में इस गुट की सक्रियता देश के कई हिस्सों में तेजी से बढ़ी है । इसने कई हमलों को भी अंजाम दिया है । बीते महीने एक भारतीय कंपनी द्वारा बनाए जा रहे हाइड्रो पावर प्लांट पर भी इसने बम से हमला किया और धमकी दी कि इस परियोजना को पूरा नहीं होने दिया जाएगा । बीते साल अप्रैल में एक बम विराटनगर में भारतीय दूतावास से संबंधित एक शिविर के कार्यालय में पाया गया, इसके बाद सितम्बर में एक बम विराटनगर के मेट्रोपोलिटन कार्यालय में मिला था । माना जाता है कि चंद माओवादी गुट आर्थिक रूप से भी मजबूत हो रही है अब चाहे इसके पीछे उसकी जबरन वसूली ही क्यों ना हो । कई कंपनियों ने परेशान होकर सरकार से गुहार भी लगायी है । हाल में नेत्र बिक्रम चंद ने अपने एक वीडियो संदेश में यह जानकारी भी दी है कि उसके गुट ने अपनी सेना (पीपल्स लिबरेशन आर्मी) भी बना ली है ।

जानकारों का मानना है कि टेलीकाम कंपनी एन्सेल पर हमला करना तो केवल एक बहाना था । इनके मुताबिक चंद गुट काफी पहले से ही कोई बड़ी वारदात करने की कोशिश में था जिससे वह सरकार को अपनी ताकत का अहसास करवा सके ।
बिक्रम चंद के साथ अधिकांश वे लोग हैं जो कभी प्रचंड के माओवादी संगठन की ओर से लड़ा करते थे । पुष्प कमल दहाल ने जब शांति समझौते के बाद राजनीति में प्रवेश किया था, तब कहा था कि उनके माओवादी गुट के कैडर नेपाली पुलिस और सेना में भर्ती कर लिए जाएंगे । लेकिन आंकड़ों के मुताबिक ज्ञढ,ण्ण्ण् कैडर में से करीब सात हजार को ही सेना या पुलिस में भर्ती किया गया । स्वाभाविक है जिन्हें नौकरी नहीं मिली उनमें से ज्यादातर नाराज होकर चंद गुट में शामिल हो गए हैं ।

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विद्रोही नेकपा ने सत्तारुढ नेकपा के उपर सैद्धान्तिक राजनीतिक विचलन, विकृति और विसंगती की आलोचना के साथ ही पथभ्रष्ट होने का आरोप लगाया है । उनका मानना है कि, जनता के जनवादी अधिनायकत्व की भावना के साथ केन्द्रीय राज्यसत्ता के लिए संघर्ष करने वाले सहयात्री कामरेड दलाल पुँजीवादी संसदीय दलदल में आकंठ डूबे हुए हैं । दस वर्ष की जनयुद्ध की भावना को छला गया है । शहीदों, घायलों और लापता नागरिकों के साथ न्याय नहीं किया गया है । कम्युनिस्ट पार्टी आज दूसरों की ही तरह भ्रष्टाचार, कमीशन, ठेका, नाफाखोरी और तस्करी जैसे क्षेत्र में लिप्त हैं और धन अर्जित कर रहे हैं । ये सारे आरोप ही विप्लव गुट की लड़ाई का आधार बन रहे हैं ।

शासक का भ्रम
जबकि सत्तारूढ़ नेकपा इस निष्कर्ष पर हैं कि राजनीतिक समस्याओं का समाधान हो चुका है । देश में गणतंत्र, संघीयता, धर्मनिरपेक्षता के साथ ही समावेशी और समानुपातिक नीति के साथ शांति कायम हो चुकी है । सत्तापक्ष समृद्ध नेपाल और सुखी नेपाल के नारा के साथ आगे बढ़ने की नीति पर अमल करना चाह रही है, या कोशिश कर रही है क्योंकि, फिलहाल जनता इस सुखी और समृद्ध नेपाल की अनुभूति नहीं कर पा रही है और इतनी जल्दी यह सम्भव नहीं है । इधर सत्ता का मानना है कि सब कुछ सही जा रहा है ऐसे में किसी विद्रोह या आन्दोलन की देश को आवश्यकता नहीं है । जबकि सत्ता में आने से पहले जो सपने बाँटे गए थे जनता के समक्ष, वर्तमान में सरकार उसमें कहीं भी सफल नहीं दिख रही । कम्युनिष्ट सरकार की कार्यशैली भी विगत के सरकारों जैसी ही दिख रही है । दरअसल कम्युनिष्ट सरकार की सैद्धान्तिक राजनीतिक पद्धति, मूल्यमान्यता, रणनीतिक तथा कार्यनीतिक उद्देश्य अलग होनी चाहिए थी । नीति तथा कार्यक्रम, जीवनशैली, कार्यशैली और आचरण भी अन्य की अपेक्षा अलग होनी चाहिए थी । किन्तु ऐसा कुछ दिख नहीं रहा ।
वैसे सरकार ने पिछले दिनों चंद गुट के काफी कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया है और ‘कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल’ को प्रतिबन्धित कर दिया है । फिलहाल सरकार और विप्लव के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है । इतिहास सिद्ध तथ्य है कि प्रतिबन्ध और दमन से समस्या का समाधान सम्भव नहीं है । बल्कि अगर ऐसा जबरन किया गया है तो भीषण द्वन्द्व की आग ही फैली है । विप्लव नेकपा की समस्या का समाधान राजनीतिक स्तर पर ही करना होगा । समस्या का समाधान प्रतिबन्ध नहीं बल्कि वार्ता है । तभी किसी ठोस नतीजे की कल्पना की जा सकती है । वरना यह असंतोष आग का काम करती रहेगी । परन्तु वार्ता भी ईमानदारी से की जानी चाहिए और यह कोशिश की जानी चाहिए कि जो मुद्दे सामने आ रहे हैं, उसपर विचार किया जाय और स्वयं पर भी अमल किया जाय । क्योंकि वर्तमान सरकार और विद्रोही दोनों ही कम्युनिस्ट हैं । इनके उद्देश्य और नीति अलग नहीं है । इसलिए विप्लव नेकपा के साथ मजबूत राजनीतिक समाधान का अर्थ है कम्युनिस्ट विचार सिद्धान्त पर अमल करना । कम्युनिस्ट कार्यशैली और जीवनशैली को व्यावहारिक जीवन में लागू करना । वैज्ञानिक समाजवाद की ओर यात्रा तय करना । राजनीति को व्यापार नहीं ऐतिहासिक प्रक्रियागत आन्दोलन, त्याग और सेवा के रूप में आत्मसात करना है । अर्थात विप्लव नेकपा द्वारा उठाए गए जायज मुद्दों को ईमानदारी से सम्बोधन करना होगा । तभी राजनीतिक समाधान का द्वार खुलेगा और विद्रोह की आग ठंडी होगी ।

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डा. सी के राउत और राजनीति

इस परिदृश्य में सीके राउत का खुली राजनीति में आना सकारात्मक दिख रहा है । अब ये अलग बात है कि स्वतंत्र मधेश की माँग करने वाले सीके राउत अपने कार्यकर्ताओं को कितना संतुष्ट कर पाएँगे या फिर इनसे भी कोई अलग धार निकलेगी । किन्तु फिलहाल तो जो सामने है वह सही ही दिख रहा है । सरकार के साथ ग्यारह बुन्दों की सहमति पर अगर देश विखण्डन का आह्वान समाप्त हो गया तो निःसन्देह यह देश के लिए सुखद और सकारात्मक है । किन्तु इस परिघटना के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यह सरकार की स्वयं की नीति है या कहीं से किसी दवाब के तहत यह सहमति की गई है ? राजनीति के गलियारों में यह सवाल काफी चर्चा में है । सत्तापक्ष में भी कुछ सरकार की इस पहल से खुश हैं तो कुछ नाराज । विभिन्न जोड, कोण और स्वार्थ के अनुरूप व्याख्या और विश्लेषण किया जा रहा है ।
नेपाल की राजनीति पर हमेशा से शक्ति केन्द्र का स्वार्थ हावी होता रहा है । जिसमें पश्चिम और दक्षिण की भूमिका हमेशा महत्तवपूर्ण रही है । इन पर आरोप प्रत्यारोप भी समय–समय पर लगता रहा है । जब बात पश्चिम और दक्षिण की हो तो, उत्तर भी चुपचाप नहीं रह सकता । वर्तमान अवस्था में दक्षिण एसियाली रणनीतिक राजनीति में चीन की भूमिका को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता है । नेपाली राजनीति वैदेशिक रणनीतिक स्वार्थ के गुरुत्वकेन्द्र के आसपास ही घूमता रहा है । इस आधार पर सीके राउत का खुली राजनीति में आना शक को तो पैदा करता ही है । क्योंकि नेपाल की राजनीति में पिछले दिनों जो भी अप्रत्याशित घटनाएँ हुई हैं, उसे सिर्फ सरकार की रणनीति से जोड़कर देखना आसान नहीं लग रहा है । हालांकि सीके राउत के खुली राजनीति में आने पर केन्द्रीय राजनीति ही नहीं मधेश की राजनीति में भी एक नए पक्ष को ला खड़ा किया है ।

बावजूद इसके किसी अन्य देश की भूमिका को अगर नकारा जाय तो, सरकार की यह पहल सराहनीय ही मानी जाएगी । क्योंकि नेपाल को अगर किसी चीज की आवश्यकता है तो वह है स्थिरता और विकास की । अगर देश में आन्दोलन और विद्रोह की स्थिति बनी रही तो देश का विकास सम्भव नहीं है क्योंकि, ऐसे में चाहे जितने भी निवेश सम्मेलन करा लिए जाएँ, परन्तु निवेशक कभी भी नेपाल में निवेश करना नहीं चाहेंगे । पिछले दिनों प्रधानमंत्री केपी ओली की सरकार ने कई कोशिशें की है । चीन और भारत से कई करार भी किये हैं । उन्होंने इन्वेस्टमेंट समिट का भी आयोजन किया. बीते फरवरी की शुरुआत में उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था, ‘नेपाल में यह समय विदेशी निवेशकों के लिए अब तक का सबसे अच्छा समय है.’ इस दौरान उन्होंने यह भी बताया कि विदेशी निवेशकों को बुलाने के लिए सरकार द्दढ–घण् मार्च को एक और बड़ी इन्वेस्टमेंट समिट का आयोजन कर रही है, जो आयोजित भी हुई किन्तु मनोनुकूल परिणाम सामने नहीं आया ।
पिछले समय में हुए विभिन्न जगहों पर माओवादी हमले ने एक डर तो निवेशकों में पैदा कर ही दिया है । शायद विप्लव पार्टी को सरकार की ओर से इसलिए भी प्रतिबंधित कर दिया गया है क्योंकि अभी किसी भी हालत में देश को निवेशकों की आवश्यकता है । देश के विकास का आधार निवेश है । जिसके लिए सरकार को निश्चित तौर पर मजबूत नीति और सुरक्षित वातावरण बनाना ही होगा ।

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