अलौकिक प्रतिभा के परिपूर्ण, भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर – एक परिचय।
मुरली मनोहर तिवारी (सीपू) बीरगंज । भारत के प्रधानंमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में ५७ मंत्रियो ने शपथ ली, इनमे से ज्यादातर चेहरे जाने-पहचाने है, लेकिन पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की जगह लेने वाले पूर्व विदेश सचिव एस.जयशंकर ने सबको चौका दिया। वे लोकसभा और राजयसभा किसी के सदस्य नहीं है। शायद ये पहली बार हुआ की किसी नौकरशाह की इतनी बड़ी जिम्मेवारी मिली हो। उन्हें मोदी ने न सिर्फ सरकार में शामिल किया बल्कि कैबिनेट मंत्री भी बनाया। मोदी सरकार में कुछ पुराने नौकरशाह है,लेकिन किसी को सीधे कैबिनेट में जगह नहीं मिली थी।
एस.जयशंकर हाई प्रोफइल परिवार से आते है। उनका परिवार मूल रूप से तमिलनाडु से आता है लेकिन उनका जन्म और उनकी परवरिश दिल्ली में हुई है। उनके पिता के.सुब्रमण्यम भी नौकरशाह थे, वे भारत के न्यूक्लियर प्रोग्राम, कारगिल रिव्यु कमिटी और मनमोहन सरकार में रणनीतिक बिकास के लिए बनी टास्क फाॅर्स में अहम भूमिका निभाई थी। एस.जयशंकर, इतिहासकार संजय सुब्रह्मण्यम और भारत के पूर्व ग्रामीण विकास सचिव एस.विजय कुमार के भाई हैं। उन्होंने जापानी मूल की क्योको जयशंकर से शादी की और अभी उनके दो बेटे और एक बेटी है।
एस.जयशंकर की स्कूली शिक्षा एयरफोर्स स्कूल से हुई फिर दिल्ली के सेंत स्टीफेन कॉलेज दाखिला लिया और उसके बाद जेएनयु में पोलिटिकल साइंस से एम्.ए की डिग्री ली। हलाकि वे आईआईटी में दाखिला लेने गए थे लेकिन पास ही जेएनयु में भीड़ देखी तो जेएनयु में ही दाखिला ले लिया। उन्होंने इंटरनेशनल रिलेशन में एम.फिल की डिग्री ली और बाद में इसी बिषय पर पि.एच.डी. की डिग्री हासिल की है। वे इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटिजक स्टडी लंदन के सदस्य भी हैं।
एस.जयशंकर का सर्विस रिकॉर्ड भी शानदार रहा है, वे १९७७ में आई.एफ. एस. के अधिकारी बने थे, उनकी पहली पोस्टिंग १९७९ से १९८१ तक सोवियत संघ, जो आज का रूस है में हुई थी। फिर १९८१ से १९८५ तक विदेश मंत्रालय में अंदर सेक्रेटरी रहे फिर १९८५ से १९८८ तक अमेरिका में फर्स्ट सेक्रेटरी रहे, फिर श्रीलंका में शांति मिशन के राजनितिक सल्लाहकार के तौर पर कार्य किया। १९९० में हंगरी के बुढ़ापेस्ट में कमर्शियल काउंसेलर का कार्य मिला। उसके बाद भारत लौटकर तीन साल तक पूर्वी यूरोप के मामले को देखते रहे। १९९६ से २००० तक जापान में राजदूत रहे। इसके बाद २००४ तक चेक रिपब्लिक में भारत के राजदूत का पद संभाला। चेक रिपब्लिक से लौटने के बाद ३ साल तक विदेश मंत्रालय में अमरीकी बिभाग की जिम्मेवारी सौपी गई थी। २००७ में बतौर भारतीय हाईकमीशनर सिंगापूर भेजा गया। २००९ से २०१३ तक चीन में भारत के राजदूत रहे। वे चीन में सबसे लम्बे समय तक भारत के राजदूत रहने का रिकॉर्ड बना चुके है। जनवरी २०१५ में केंद्र सरकार ने उन्हें विदेश सचिव बनाया था,ये घोषणा तब हुई जब उनकी सेवानिवृति में महज ७२ घंटे बाकि थे,उनके कार्यकाल को विस्तार देने के लिए ९५ साल पुराने नियम में एक बड़ा बदलाव किया गया। सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने टाटा समूह के ग्लोबल कॉरपोरेट मामलों के अध्यक्ष के रूप में पदभार संभाला। मार्च में जयशंकर को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से पद्म श्री पुरस्कार मिला।
बतौर डिप्लोमेट एस.जयशंकर का रिकॉर्ड बहुत शानदार रहा है। वे बिदेश मामलो में जबरदस्त पैठ रखते है।वे प्रमुख भारतीय सामरिक मामलों के विश्लेषक, टिप्पणीकार और प्रशासनिक अधिकारी हैं। जानकार उनको ऐसा डिप्लोमेट मानते है, जो मॉस्को, बीजिंग और वाशिंगटन डी.सी. के साथ-साथ दक्षिण एशियाइ देशो को अच्छी तरह से समझते है। वे भारत के आर्थिक हितों के साथ-साथ सुरक्षा जरूरतों को भी समझते है। मनोहन सरकार में भी उनका कद ऊंचा था, अमेरिका के साथ एटमी डील का रास्ता साफ करने और ओबामा को गणतंत्र दिवस पर मेहमान बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। २०१४ में भारतीय प्रधानमंत्री मोदी केंद्र के राजनीती में नए थे, विदेश और रक्षा मंत्रालय में एस.जयशंकर ने अहम भूमिका निभाई। जानकर बताते है मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ब्यूरोक्रेसी के दो पावर सेण्टर थे,पहला अजित डोभाल जो एनएसए है,और दूसरा एस.जयशंकर। कहा जाता है कि जयशंकर ने चीन के साथ बातचीत के माध्यम से डोकलाम गतिरोध को हल करने में मदद की थी। एस.जयशंकर अब विदेश मंत्री है, पाकिस्तान और चीन भारत के विदेश निति में खासा महत्व रखते है। इसके अलावा नेपाल भारत के लिए बिशेष महत्व रखता है। अमरीका और ईरान के बिच बढ़ती दूरिया चिंता का बिषय है। ये वे चुनौतियां है जिनसे एस.जयशंकर को पहले निपटना होगा।



