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सत्ता की (अ) सहमति:पंकज दास

 

संविधान सभा भंग होने के बाद देश की राजनीति में जिस तरह से सत्ता को लेकर तरंग उत्पन्न हो रही है उससे यह एक बार फिर से लगने लगा है कि यहां की सभी पार्टियों के लिए संविधान संघीयता राज्य पुनर्स्थापना जैसे मुद्दे कोई मायने नहीं रखते हैं। नेपाल की राजनीतिक पार्टर्ीीे लिए यदि सबसे अधिक कुछ मायने रखता है तो वह है सत्ता और प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीदेश में गणतंत्र की स्थापना के बाद से ही राजनीतिक पार्टियों और उसके नेताओं के लिए हमेशा से ही सत्ता ही पहली और आखिरी मंजिल रही है। यही कारण है कि दो वर्षमें बनने वाला संविधान चार वषर्ाें में भी नहीं बन पाया।
संविधान बनाने की बजाए हमारे नेता सिर्फसत्ता के खेल में ही लगे रहे। चाहे संविधान सभा चुनाव से पहले हों या फिर संविधान सभा चुनाव के बाद। जिस समय देश को संविधान चाहिए था हमारे नेता प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीे लिए एक दूसरे से लडÞने में ही व्यस्त रहे। जब जब संविधान सभा की आयु खत्म होने के कगार पर पहुंचती तब तब प्रमुख दल और उसके शर्ीष्ा नेता संविधान निर्माण में देखे गए विवादित मुद्दे को सुलझाने के बजाए सत्ता परिवर्तन करने और प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीाने के लिए झगडÞते दिखाई दिए। आखिरकार सत्ता मोह में फंसे हमारे नेताओं की इसी करतूत की वजह से संविधान तो नहीं बन पाया लेकिन सत्ता पाने की लालसा में नेताओं ने संविधान सभा की ही बलि चढÞा दी।
सत्ता के कारण संविधान सभा का तेजोबध करने के बाद देश में फिर से ताजा जनादेश लेने के लिए संविधान सभा का दुबारा चुनाव कराए जाने की घोषणा कर दी गई। इसी बीच चर्चा यह भी उठी कि विघटित संविधान सभा को फिर से जीवित किया जाए। लेकिन दुबारा चुनाव होने या फिर संविधान सभा की पुनर्स्थापना होने के बीच भी सत्ता की ही लडर्Þाई है। जो सत्ता में बैठे हैं वह सत्ता छोडÞना नहीं चाहते और जो सत्ता से बाहर हैं वे भी सत्ता पाने की छटपटाहट में ही दिन गुजार रहे हैं।
इस देश के करीब सभी दलों का एकमात्र सिद्धांत सत्ता प्राप्ति ही रह गया है। तभी तो बात चाहे संविधान के पुनर्स्थापना की हो या फिर दुबारा चुनाव की हर बार कमबख्त यह सत्ता ही आडे आ जाती है। संविधान सभा भंग होने के बाद कामचालाऊ रूप में रहे भट्टर्राई सरकार को हटाने के लिए सत्ता से बाहर रहे दल काफी मशक्कत कर रहे हैं जो कि संभव दिखाई नहीं देता है। वैसे तो पहले कांग्रेस एमाले सरीखे विपक्षी पार्टियां भी चुनाव का विरोध करती नजर आ रही थीं और संविधान सभा पुनर्स्थापना के लिए काफी लाँबिंग भी की जा रही थी ऐसा इसलिए नहीं था कि कांग्रेस एमाले वाकई में संविधान सभा पुनर्स्थापना करना चाह रही थी बल्कि उनका एकमात्र मकसद माओवादी से सत्ता हथियाना ही था। संविधान सभा पुनर्स्थापना के लिए विपक्षी दलों के पास कोई खास एजेण्डा भी नहीं था। लेकिन जैसे ही सत्तारूढ पार्टियां माओवादी और मधेशी मोर्चा ने संविधान सभा पुनर्स्थापना के लिए एजेण्डा द्वारा अपनी बात आगे बर्ढाई कांग्रेस और एमाले उससे पीछे हट गए। इसके पीछे एक मात्र कारण यह था कि कांग्रेस और एमाले अभी भी किसी भी हालत में देश में संघीयता को लागू नहीं होने देना चाहते हैं और ना ही पहचान सहित के प्रदेशों के पक्ष में ही हैं। यही कारण है कि संविधान सभा पुनर्स्थापना की रट को छोडकर अचानक कांग्रेस और एमाले के नेता चुनाव की मांग करने लगे। जिसके लिए माओवादी और मधेशी मोर्चा पहले से ही तैयार बैठी थी। चुनाव को लेकर दलों के बीच सहमति भी हो गई और ऐसा लगने लगा कि अब देश में संविधान सभा का दुबारा चुनाव होना तय है। लेकिन चुनाव को लेकर अपनी सहमति के साथ ही कांग्रेस एमाले सहित अन्य विपक्षी पार्टियों ने सत्ता परिवर्तन की शर्त भी रख दी।
बात जब संविधान सभा पुनर्स्थापना की हो तब भी सत्ता की मांग, बात जब चुनाव की हो तब भी सत्ता की मांग, ऐसा लग रहा है जैसे सत्ता नहीं मिलने पर कांग्रेसी नेताओं की जान निकल रही है। अब जब चुनाव होना तय है और चुनाव कराने के लिए सरकार भी है तो फिर किस बात के लिए कांग्रेसियों को डर लग रहा है। सीधा सा जबाब है कि चुनाव में जाने से और जनता का सामना करने से कांग्रेस और एमाले के नेता डर रहे हैं। उन्हें अछी तरह पता है कि इस बार चुनाव हुए तो उनकी हालत और अधिक खस्ता होने वाली है। इसलिए चुनाव से पहले ही वो सत्ता का स्वाद चख लेना चाहते हैं। संविधान सभा चुनाव के बाद से जिस तरीके से नेपाली कांग्रेस और एमाले ने पहचान सहित की संघीयता और राज्य पर्ुनर्संरचना को लेकर अपना अडियल रवैया सामने रखा था उससे इस देश की जनता अच्छी तरह से समझ गई है। और यह भी जान गई है कि जब जब कांग्रेस सत्ता से बाहर होती है तो उसे इस देश के ही लोकतंत्र पर खतरा नजर आता है। बांकी समय जब वो खुद सत्ता में रहे तो सब कुछ ठीक रहता है। अभी भी कांग्रेसी उसी पुराने राग को अलाप रहे हैं। कांग्रेसी नेताओं का दावा है कि यदि सत्ता का नेतृत्व उन्हें सौंप दिया जाए तो देश की सारी समस्या अपने आप ही सुलझ जाएगी। कांग्रेस के लोग जिस तरह से संविधान सभा पुनर्स्थापना से लेकर चुनाव करवाने तक के लिए प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीे लिए गिडÞगिडÞा रहे हैं उससे साफ है कि उनका एक मात्र मकसद कर्ुर्सर्ीीाना ही रह गया है। वैसे यह सभी कांग्रेसी नेताओं की सोच नहीं है। कांग्रेस और एमाले में अभी भी कुछ अच्छे विचार वाले लोग हैं जिन्हें लगता है जल्द से जल्द चुनाव कर जनादेश के मुताबिक सत्ता चलाया जाए। लेकिन ऐसी सोच वाले वहीं नेता हैं जो कि जनता के सामने जाने से डरते नहीं जो जनता का सामना करने के लिए तैयार हैं और उन्हें मालूम है कि उनकी जीत होनी है। लेकिन पिछले चुनाव में जनता के हाथों पराजित होने वाले और मंत्रियों की बंदरबांट में अपना उल्लू सीधा करने वाले लोग हर हाल में सिर्फसत्ता चाहते हैं उन्हें डर है कि चुनाव हुए तो उनका असली चेहरा सामने आ जाएगा।
नेपाली कांग्रेस के सभापति सुशील कोइराला जिन्हें पिछली बार संविधान सभा चुनाव में जनता ने नकार दिया था, वो ऐसे ही चाटुकारों और जनता के हाथों पराजित नेताओं को अपने र्इदगिर्द रखते हैं और उनकी ही सल्लाह मानते हैं। देश की राजनीतिक समस्या का हल नहीं होने देने में ऐसे ही हारे हुए नेताओं का दिमाग है। कोइराला के कृपापात्र में पार्टर्ीीे महासचिव बनाए गए कृष्ण प्रसाद सिटौला जो कि समस्या का समाधान नहीं होने देना चाह रहे हैं, सिटौला भी चुनाव में दो दो स्थानों से पराजित हो चुके हैं। ऐसे ही कांग्रेस के कुछ समानुपातिक कोटे से सभासद बने नेता भी हैं जो कि संविधान सभा को फिर से जीवित करने और हर हाल में चुनाव को टालने की कोशिश में लगे हैं।
यही कुछ हाल एमाले का भी है। एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल भी जल्द से जल्द चुनाव में जाने और ताजा जनादेश के पक्ष में हैं लेकिन अपनी ही पार्टर्ीीे दो नेताओं के पी ओली और माधव कुमार नेपाल जिन्हें संविधान सभा चुनाव में बुरी तरह से हार का सामना करना पडा था उनके चंगुल में फंसने की वजह से कुछ भी नहीं कर पा रहे है। ओली और नेपाल दोनों ही जनता से नकारे हुए नेता हैं जो इस समय देश की समस्या के लिए जिम्मेवार हैं। ये दोनों भी कांग्रेसी को आगे कर चुनाव से पीछे हटने की साजिश में हैं।
एक बात साफ है कि एक बार विघटित हो चुके संविधान सभा के सभासदों के वेतन भत्ता के लिए फिर से जीवित करने का ना तो कोई कानूनी और ना ही संवैधानिक प्रावधान है। कानून के जानकार भी मानते हैं कि र्सवाेच्च अदालत के द्वारा दिए गए परमादेश के बाद विघटित किए जा चुके संविधान सभा को फिर से जीवित करना न्याय प्रणाली की भी धज्जी उडÞाने जैसा होगा। इसलिए अब देश के पास एक मात्र विकल्प चुनाव का है। चुनाव के लिए देश में सरकार भी है। हर लोकतांत्रिक देश की परम्परा होती है कि चुनाव कामचलाउ सरकार ही संपन्न करवाती है। इसके लिए बार-बार सरकार बदलने की कोई भी जरूरत नहीं है। एक कामचलाउ सरकार को हटाकर दूसरा कामचलाउ सरकार बनाना मर्ूखता ही होगी। इसका एकमात्र विकल्प राजनीतिक सहमति पर गैर राजनीति व्यक्तित्व के नेतृत्व में सरकार गठन। लेकिन इसके लिए राष्ट्रपति को कठोर कदम उठाने के अलावा राजनैतिक सहमति भी जरूरी है। जो कि फिलहाल संभव नहीं दिखता है। वैसे राष्ट्रपति ने भी चुनाव ही कराने को लेकर दलों के बीच सहमति पर जोडÞ दिया है। अब देखना यह है कि कांग्रेस और एमाले जैसी पार्टियों के हारे हुए नेता कब तक चुनाव से भागते हैं। और कब जनता का सामना करने की हिम्मत दिखाते हैं।

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