Mon. May 25th, 2020
himalini-sahitya

इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई, हम न सोए रात थक कर सो गई : राही मासूम रज़ा

बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा’लूम

जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई

फ़िराक़ गोरखपुरी

चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले

मुझ से अच्छे तो शब-ए-ग़म के मुक़द्दर निकले

अहमद मुश्ताक़

दिन कटा जिस तरह कटा लेकिन

रात कटती नज़र नहीं आती

सय्यद मोहम्मद असर

इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के

अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के

फ़रहत एहसास

इक उम्र कट गई है तिरे इंतिज़ार में

ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिन से एक रात

फ़िराक़ गोरखपुरी

हमारे ख़्वाब चोरी हो गए हैं

हमें रातों को नींद आती नहीं है

बख़्श लाइलपूरी

हर एक रात को महताब देखने के लिए

मैं जागता हूँ तिरा ख़्वाब देखने के लिए

अज़हर इनायती

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