ये पागलपन, हजम नहीं होगा जमाने को…. : ई. शिवेन्द्र शर्मा
“पागलपन”
एक दिन सोचा,
मेरे पागल मन ने।
जाऊँ मस्जिद,
और आरती उतारूँ खुदा की।
जाऊँ मंदिर,
और नमाज अदा करूँ ईश की।
माँगूं अमन, चैन,
प्रेम और भाई चारा।
सबका हो, हित,
और सबको मिले सहारा।
मन तो पागल ही है,
कुछ भी भा सकता है, इसे।
क्या इसका हक, सिर्फ,
दंगा, फसाद और नफरत ही है।
नहीं, ये तो वो भी कर सकता है,
जो बड़े बड़े दिमागदार,
और बुद्धिमान भी न कर सकें।
क्या भरोसा इस पागल मन का,
खुद को ही भगवान् बता कर
बैठ जाए मंदिर में।
और करवाने लगे पूजा
खुद की ही।
पर मुझे मालूम है कि,
ये पागलपन,
हजम नहीं होगा जमाने को।
करेंगे बहकी बहकी बातें
सब लोग,
करेंगे चोट मुझ पर,
और मेरे इस पागलपन पर।
मुझे मारेंगे, पीटेंगे,
मुंह काला करेंगे,
आग लगा देंगे घर को।
अगवा कर लेंगे घर वालों को
और भी बहुत कुछ कर सकते हैं ये,
अपने स्वार्थों के लिए।
धर्म के तथाकथित ठेकेदार,
जो धर्म का “ध”भी नहीं जानते।
जानते हैं तो केवल,
धर्म के नाम पर
अपनी रोटी सेकना।
दंगा, फसाद करवाना,
और लोगों में नफरत के बीज बोना।
सही मायने में
यही है पागलपन।

(कवि /लेखक /गीतकार )
इन्दौर (म.प्र.)

