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र्व्यर्थ में बीता तीन महीना

 

पीछली बार संविधान सभा की बढर्Þाई गई तीन महीने का कार्यकाल र्व्यर्थ में ही चला गया । इस दौरान ना तो संविधान लेखन के काम में ही कोई खास उपलब्धि हासिल हर्इ और ना ही शान्ति प्रक्रिया का कोई काम आगे बढÞ पाया है । पिछली बार जेठ १४ गते के दिन तीन दलों के बीच हुए ५ सूत्रीय सहमति के हिसाब से कोई भी काम ठीक ढंग से नहीं हो पाया । सिवाय समय सीमा बढÞाने के । प्रधानमंत्री के इस्तीफे पर ही आधा समय बीत गया । आखिरकार प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे भी दिया तो राजनीतिक दल राष्ट्रीय सहमति के आधार पर सरकार गठन करने में विफल रहें । समझौते में उल्लेखित शान्ति प्रक्रिया के काम और लडाकु समायोजन का काम भी जस का तस है । माओवादी नेताओं की सुरक्षा में रहे लडाकु  और हथियार को अभी तक पूरी तरह वापस नहीं किया जा सका है । सेना समायोजन पर भी कोई सहमति नहीं जुट पाई है ।
संविधान निर्माण के लिए दूसरी बार तीन महिना की समय सीमा बर्ढाई गई लेकिन दर्ुभाग्य कि इन तीन महीनों में संविधान सभा की एक भी बैठक नहीं हो पाई । पिछली बार हुए समझौते में यह कहा गया था कि तीन महीने में संविधान का प्रारम्भिक मसौदा र्सार्वजनिक किया जाएगा लेकिन वह भी काम नहीं हो पाया । कोई भी दल इस प्रति जिम्मेवारी के साथ पेश नहीं हो रहा है । संविधान सभा के अध्यक्ष सुवास नेम्बांग इस बात को स्वीकारते हैं कि प्रमुख राजनीतिक दल सिर्फसत्ता में ही अपना ध्यान केन्द्रित किए हुए हैं । इसलिए संविधान का काम कुछ भी आगे नहीं बढ पाया है । नेम्बांग बताते हैं कि राजनीतिक दल सत्ता के खेल में इस कार व्यस्त हैं कि संविधान निर्माण की चिन्ता उन्हें है इस बात का आभास तक नहीं हो पा रहा है ।
लडाकु पर्ुनर्वर्गीकरण, समायोजन संख्या और मापदण्ड निर्धारण में शान्ति प्रक्रिया की बात अटकी हर्ुइ है । और यह तय है कि शान्ति प्रक्रिया आगे ना बढÞ पाने के कारण संविधान निर्माण का काम भी अटका रहेगा । संविधान लेखन में देखी गई विवाद पर भी सहमति नहीं जुट पाई है । विवाद समाधान उपसमिति की बैठक सिर्फकोरम पूरा करने के लिए ही हो रही है । इससे कोई भी खास नतीजा निकलने की उम्मीद भी कम होती जा रही है । तीन महीने पहले संविधान निर्माण में जितनी विवाद देखी गई अभी भी उतना ही विवाद कायम है ।
विवाद समाधान उपसमिति के सदय रहे लक्ष्मण लाल कर्ण्र्ााे भी स्वीकार किया कि तीन महीने के बढे हुए कार्यकाल में कोई भी उपलब्धि हासिल नहीं हर्ुइ । विवाद सुलझाने को लेकर विचार विमर्श भी हुआ लेकिन कोई भी सहमतित नहीं जुट पाने की जानकारी कर्ण्र्ााे दी है । श्रावण ११ गते समझौता अनुगमन समिति की बैठक के बाद तो उपसमिति की बैठक भी नहीं हो पाई है । संविधान सभा का दूसरा कार्यकाल बढाने पर भी उपसमिति की ९ बार बैठकें होने की बात लक्ष्मण लाल कर्ण्र्ााताते हैं लेकिन इन बैठकों में भी सिर्फऔपचारिकता ही निभाई गई । इन तीन महीनों में संवैधानिक समिति की भी बैठक सिर्फ५ बार ही हर्ुइ । और ये बैठकें भी औपचारिकता में ही सिमट कर रह गयी ।
इन महीनों में कोई भी खास उपल्ब्िध हासिल नहीं होने और संविधान का प्रारम्भिक मसौदा भी नहीं आने के पीछे सभी दलों का अपना अपना तर्क है । सभी दल एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं । कांग्रेस का कहना है कि प्रधानमंत्री द्वारा पद छोडÞने में देरी करने की वजह से कुछ नहीं हो पाया । जबकि एमाले माओवादी को जिम्मेवार ठहरा रही है । माओवादी के आपसी विवाद ने संविधान निर्माण को बाधित किया है । साथ ही माओवादी द्वारा सेना समायोजन पर दिलचस्पी नहीं लेने की वजह से भी शान्ति प्रक्रिया का काम आगे नहीं बढ पाने का निष्कर्षएमाले का है ।
उधर माओवादी इस देरी के लिए कांग्रेस और एमाले को जिम्मेवार ठहरा रही है । माओवादी का कहना है कि कांग्रेस और एमाले जान बूझ कर सेना समायोजन पर बखेडÞा खड कर रही है जिस वजह से देरी हो रही है । इसके अलावा मधेशी मोर्चा संविधान निर्माण में हो रहे देरी के लिए तीनों बडÞे दलों को दोषी बता रही है । मोर्चा का कहना है कि सत्ता के खेल में तीन दलों के व्यस्त रहने की वजह से संविधान निर्माण का काम जस का तस बना रहता है ।
विवादित मुद्दा
आखिर क्या है संविधान का विवादित मुद्दा – किस विषय पर अभी भी विवाद बना हुआ है । सबसे बडÞा मुद्दा है संघीयता का । संघीयता और राज्य पर्ुनर्संरचना के मुद्दे पर सभी दलों में मतभेद बरकरार है । कांग्रेस सात प्रदेश की अवधारणा लाना चाहती है तो माओवादी १४ प्रदेश हो इस पक्ष में हैं । मधेशी दल एक मधेश एक प्रदेश बनाने की बात पर अडÞे हुए हैं तो एमाले इस बात के सख्त खिलाफ है । संघीयता का विवाद इतना बढ गया है कि अब संघीयता ही खत्म करने की मांग भी उठ्ने लगी है । इसी तरह शासन प्रणाली को लेकर भी दलों में मतभेद है । कुछ दल राष्ट्रपतीय शासन प्रणाली के पक्ष में हैं तो कुछ संसदीय र्सवाेच्चता के पक्ष में हैं । निर्वाचन प्रणाली और न्याय प्रणाली को लेकर भी विवाद जस का तस बना हुआ है ।

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