क्या होता, जो निशा न होती ! चाँद तो होता आस्मां पे पर चाँदनी रात न होती : निशा अग्रवाल
क्या होता, जो निशा न होती
चाँद तो होता आस्मां पे
पर चाँदनी रात न होती।
कविताओं में प्रेमी के
प्रेम की ‘वो’बात न होती।
सितारे युँ ही लटके होते
वो टिमटिमाने की सौगात न होती।
सोचो, होता क्या जो निशा न होती
जिदंगी की बैचेनियों को
चैन की घड़ियाँ नसीब न होती।
भागते – दौड़ते रहते हम
कभी ये दौड़ खत्म न होती।
गर सुकून न मिलता रातों का
सुरज की गर्मी बर्दाश्त न होती।।
सोचो, होता क्या, जो निशा न होती।
न नयी भोर का इन्तजार होता
न नया कुछ कर दिखाने की तमन्ना होती
न पिछला भूल पाते हम
न कल कुछ अच्छे की उम्मीद होती
थके हुए, उलझे हुए सिरों की
न नयी शुरुआत होती
सोचो, होता क्या, जो निशा न होती। ।
‘पंकज’ की बाहों में ‘मधुकर’
न प्रीत से सिमट पाता
न कान्हा गोपियों के संग
रास ही रचा पाता
कृष्ण की कथा तो रास बिना अधुरी ही रह जाती।
सोचो, होता क्या, जो निशा न होती।
वो प्रेम की बात
वो छिपती छिपाती मुलाकात
वो पिया मिलन की रात
कभी न आती।।
सोचो, होता क्या, जो निशा न होती। ।
जो निशा न होती। ।।।।
निशा अग्रवाल


