Sun. Jul 21st, 2019

राजनीति के आदर्श : अजय कुमार झा

हिमालिनी अंक मई २०१९ | नेपाल के राजनीति में श्री अंशु वर्मा,श्री कृष्णप्रसाद भट्टराई और लौह पुरुष श्री गणेशमान शिंह का नाम एक सच्चा, ईमानदार, त्यागी, दूरदर्शी, जनप्रेमी, विकासप्रेमी और उच्च आदर्शवादी महामानव के रूप मे जाना जाता है लेकिन इनके संतान कौरव, कंश, दुस्शासन, हुमायु, इदिअमिन, हिटलर, मुसोलिनी के अनुयायी कैसे हो गए ? क्या वर्तमान में एक भी नेपाल के राजनीतिक नेताकार्यकर्ता में मानवता, समाजसेवा, विकास का, राष्ट्रीयता, समझदारी और वैज्ञानिकता का भाव देखा जा सकता है ? अगर हाँ तो, २०४८ साल से अबतक इतना बवंडर क्यों ? विकास के नामपर विनाश का तांडव क्यों ? गणतंत्र के नाम पर बीस हजार नेपालियों की हत्या क्यों ? संघीयता के नामपर मधेसियों के साथ संविधान में दोहरा व्यवहार क्यों ?

राजनीति (जो सभी नीतियों का राजा है) उसकी परिभाषा आज क्या होनी चाहिए ? राजनीतिकों का कैसा चरित्र होना चाहिए ? राजनीतिकों के लिए कैसा दंड विधान होना चाहिए ? मंत्रियों की योग्यता क्या होनी चाहिए ? मुखिया से लेकर प्रधान मंत्री तक के लिए योग्यता का विधान होना चाहिए या नहीं ? जब सबसे निचले पद पीयुन के लिए योग्यता प्रमाण पत्र माँगा जाता है तो सर्वोच्च पद के लिए क्या योग्यता प्रमाण पत्र या अनुमति पत्र(लाइसेंस) नहीं होना चाहिए ? इन सभी विषयों पर गहन वैज्ञानिक चिंतन की आवश्यकता है । समय सापेक्ष और वैज्ञानिक वोध से युक्त समाधान ही मानव कल्याण का द्योतक होगा ।

गहरा अध्ययन और ध्यान साधना के द्वारा बुद्धि और हृदय दोनों से समझने और व्यवहारोपयोगी बनाने से ही आज के अतिवादी युग को शीतलता प्रदान किया जा सकेगा वरना मानवता विज्ञानांध और कट्टर धर्मान्ध के चक्की में बुरी तरह पिस जाएगी।
वैसे, जो विद्वान् और महात्मा सिर्फ समस्या दिखा रहे हैं, सिर्फ विरोध का डंका पीट रहे हैं । उन्हें बिका हुआ समझना होगा । आजकल सिर्फ समस्या उजागर करने का एक फैशन सा हो गया है । लोग इनकी बातों में आसानी से आ जाते हैं और इनकी राजनीति आगे बढ़ने लगती है । अतः ऐसे धूर्तों और मक्कारों से बचने के लिए समाधान देना भी अनिवार्य किया जाय क्योंकि समस्या है, तो समाधान भी है । इसे देखने की क्षमता सिर्फ प्रज्ञावान में है ।
किसी भी समस्या और घटना में सान्दर्भिकता को समझाना आवश्यक है । फिर यदि, इसका वोध न हो तो, राम, कृष्ण, मोहम्मद, ईशु, मुसा, बुद्ध, महावीर, जनक सबके सब आतंकवादी ही नजर आएँगे । हमारे कुछ मित्र को हिन्दू ही सबसे बड़ा आतंकवादी दिखाई देता है । बांकी के सब महान सन्त ! विरोध का स्तर भी इतना क्षुद्र हो सकता है ! वो भी सन्तो के भूमि भारत में ! याद रहे मो. गजनी, गोरी, चंगेज,अक्टरलोनी ने वैसे ही नहीं भारत को रौदा था ! कही न कही इसी तरह के लोग उनके साथ थे । जिन्हें आज हिन्दुओं में आतंकी और अजहर में संतत्व दिखाई देता है । मोदी भारत के एक साधारण परिवार के है, इसलिए तो उच्च घराने के लोग चोर बोल रहे हैं लेकिन देश को गौरव है कि एक गरीब इंसान ऐतिहासिक प्रधान मंत्री के रूप में भारत के सम्मान को विश्व में स्थापित किया है ।
मौटे तौर पर सुभाष चंद्र बोस और गांधीजी देश को आजाद करने के एक जैसा रास्ता चुना । प्रथम विश्व युद्ध के समय गांधीजी का ये मानना था कि भारतीयों को अंग्रेजों की मदद करनी चाहिए । इसके बाद जब वो युद्ध जीत जाएंगे तो पुरस्कार या वादे के अनुसार अंग्रेज हमें आजाद कर देंगे । जिसके बाद गांधीजी के आह्वान के चलते जो ब्रिटिश भारतीय सेना युद्ध की शुरूआत में १ लाख थी युद्ध खत्म होते समय ११ लाख हो गई थी । इस युद्ध में ४८ हजार भारतीय शहीद हुए ६५ हजार घायल हुए ।
वहीं दूसरे विश्व युद्ध के समय सुभाष बाबू ने भी सेना का ही इस्तेमाल किया लेकिन अंग्रेजों के लिए नहीं अंग्रेजों के खिलाफ । करीब ३० हजार सैनिक शहीद हुए । वैसे आजादी भी कोई चीज है जो कभी भीख में किसी को मिली हो तो देखिए प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों के जीतने के बाद भी देश आजाद नहीं हुआ और द्वितीय विश्व युद्ध में आजाद हिन्द फौज के हारने के बावजूद देश आजाद हो गया । लेकिन आतंरिक शत्रुओं के कारण जनता आज भी गुलामी की जिंदगी और मौत के लिए वाध्य है । ज्ञातव्य हो, जब धन के आगे व्यक्तित्व के साथ धोखाधड़ी की जाती है, तो उसका परिणाम सामूहिक हिंसा ही होता है । भारत के सच्चे देशभक्त और क्रांतिकारियों के साथ देशद्रोही की तरह व्यवहार कर क्षुद्रता का परिचय दिया । यह संस्कार आज भी पार्टियों के भीतर देखा जा सकता है ।
संस्कार और संस्कृति में संपन्न भारत जैसे गरिमावान देश के महिमावान प्रधानमन्त्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेपाल के जनकपुर यात्रा को लेकर खस समुदाय के लेखक तथा पत्रकार लगायत के अन्य तथाकथित विद्वानों में इस प्रकार हड़कम्प मचा जैसे किसी शेर को देख बंदरों में घबराहट और हड़कंप मच जाता है । दो नंबर प्रदेश को अशांत और असुरक्षित साबित कर मोदी जी के आगमन को रोकने का दुष्प्रयास किया । तो किसी ने नेपाल में नाकाबंदी का आरोप लगाकर मधेसियों के माग और आन्दोलन को ओझिल करने का षडयंत्र भी रचा । टुइटर पर तीर्थ कोइराला जी ने तो यहाँ तक लिख डाला की अबतक भारत ने चार बार नेपाल को नाकावंदी के चपेटा में डालकर नेपाल के सार्वभौमिकता और अखंडता को दमन किया है । याद रहे, नेपाल में जो भी नाकावंदी लगाए गए २०७२ से पहले वो सभी नाकावंदी नेपाली नेताओं और नागरिको के अनुनय विनय करने पर राणा के क्रूर शासन और अत्याचार से त्रस्त नेपाली नागरिकों को मुक्ति दिलाने हेतु किया गया था । इसी प्रकार दूसरी बार अत्याचारी राजा महेन्द्र से मुक्ति दिलाने हेतु वी.पी कोइराला लगायत के नेपाली नेता और जनता के आग्रह पर किया गया था । तीसरी बार राजा बिरेन्द्र के नेतृत्व में संचालित एक तंत्रीय पंचायती शासन प्रणाली के विरोध में लौह पुरुष श्री गणेशमान सिह जी के नेतृत्व में भारत सरकार से प्रार्थना कर लोकतंत्र पुनर्बहाली की दुहाई देकर नाकाबंदी करने के लिए बिनती चढ़ाया था । अब रही बात २०७२ के नाकावंदी का तो यह सीधा और सापÞm है की २०० वर्ष से अपमानित और दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप मे जीवन यापन को बाध्य नेपाल के आधा जनसंख्या के हैसियत से विद्यमान मधेसियों ने संविधान में अपना अधिकार सुरक्षित रखने के लिए बाध्य होकर नाका पर धरना दिया जो वाद में नाकावंदी का रूप धारण कर लिया परन्तु तीर्थ कोइराला जी ने जो नाकाबंदी का हबाला देकर भारत विरोधी अफवाह और नकारात्मक भावना को नेपाली युवा मानस पटल पर डाल रहे हैं । उन्हें इतना भी वोध और होश नहीं है की भारत ने २०१९, २०२७ और २०४७ में नाकाबंदी क्यों किया था ? आज जो स्वतन्त्रता का स्वाद ले पा रहे हैं वो भारत के कृपा का परिणाम है । ज्ञातव्य हो चीन और पाकिस्तान लोकतांत्रिक देश नहीं है फिर भी भारत के प्रति घृणा से भरी दृष्टि और चीन पाक के प्रति सहानुभूति आखिर यह है क्या ? आज से बीस वर्ष पहले हुए सापÞm खेलकूद के फुटबल मैच में दशरथ रंगशाला में उपस्थित ९० प्रतिशत नेपाली पाक के पक्ष में ताली बजा रहे थे । नेपालियों के भीतर भारत के प्रति विरोध और घृणा का भाव ऋतिक रोशन काण्ड और माधुरी दीक्षित काण्ड से ही प्रत्यक्ष रूप मे दिखाई देने लगा था । एतिहासिक माओवादी जनयुद्ध जिसमे पचीस हजार नेपाली युवाओं की हत्या हुई । अरबों के भौतिक संरचनाएँ ध्वस्त कर दिए गए । नेपाल के विकास १२ वर्षों तक पूर्णतः अवरुद्ध रहा । साथ ही नेपालियों के जन जीवन ५० वर्ष पीछे की ओर धकेल दिया गया । उस विद्रोह और गृहयुद्ध को भारत ने मध्यस्थता कर नेपालियो के जीवन और नेपाल के अस्तित्व को सुरक्षित किया । उसी भारत को गालियाँ देकर ये वीरबहादुर लोग क्या सावित करना चाहते है ? संविधान निर्माण के क्रम में हुए मधेस आन्दोलन तथा सैकड़ों शहादत के फलस्वरूप मधेसियों के साथ किया गया समझौता भी कागजÞ में सीमित कर धोखेबाजी कर रहे खस के विरुद्ध में चार महीने का मधेस बंद जो नाकाबंदी का रूप धारण कर लिया था । उसे अब भी खस शासक नजरअंदाज कर भारत को बदनाम करना चाहता हैं । जिससे एक तीर से दो निशाना लगता है । पहला, मधेसियों के ऐतिहासिक आन्दोलन को चर्चा से बाहर रखना और दूसरा, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच भारत को बदनाम करना । एक करोड़ पचास लाख के आवादी वाले मधेसियों को राणाकाल से लेकर पंचायती व्यवस्था, प्रजातांत्रिक व्यवस्था और संघीय लोकतांत्रिक गणतांत्रिक व्यवस्था में भी संवैधानिक रूप से ही षडयंत्र पूर्वक कमजोर बनाने का प्रयास किया गया था । जिसका विरोध माननीय मोदी जी ने बहुत पहले जता चुके थे । राज्य के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्र, सरकारी निकायों, सेना तथा प्रहरी, मंत्री, सचिव तथा राजदूत जैसे पदों से मधेसियों को वंचित किया गया है और विरोध करने पर देशद्रोह का मुद्दा लगाया जाता है । या की सीधे माथे पे गोली मार दिया जाता है । ऐसी हालत में तो, दो ही रास्ता शेष रह जाता है । (गुलामी की स्वीकृति या की डटकर मुकाबला) अबतक गुलामी मानसिकता से अभिप्रेरित मधेस के कांग्रेस और कम्युनिष्ट समर्थक लोग भी स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाने लगे हैं । उनके बच्चों उन्हें घर में ही मधेस के समर्थन हेतु मजबूर करने लगे हैं । अब ऐसे लोगो की आत्मा भी काँपने लगी है । जिसका सीधा प्रभाव नेपाल के भावी राजनीति पर पड़ने वाला है । मोदी के जनकपुर यात्रा ने इस भावना को अणु ऊर्जा से अनुप्राणित करने का काम किया है । मधेस के आम नागरिक में एक उत्साह और भरोसा पनपने लगा है । भविष्य सुरक्षित और विकसित होने की आसार नजर आने लगा है । वही पर नेपाल के खस लोग मोदी के जनकपुर यात्रा से जल भुन गए हैं । मोदी को जनकपुर में किया गया अबतक के भव्यतम ऐतिहासिक स्वागत और नागरिक अभिनन्दन के कारण पहाड़ी लोग मधेसियों को देशद्रोही तक का संज्ञा देने लगे हैं । नेपाल में सिर्फ दो विचारधारा के नागरिक हैं अभी । पहला वर्ग खस विचारधारा के हैं जो ब्राहमण क्षेत्री बाहेक अन्य सभी वर्ग हिमाल के शेर्पा, तामाङ्ग,लिम्बू पहाड़ के राई,मगर,ज्यापू,नेवार और आधी जनसंख्या बाले मधेसियों के ऊपर षडयंत्र और बल पूर्वक राज करना चाहते हैं । तो दूसरी विचारधारा के नागरिक में जनजाति, किराती,थारु,मधेसी हैं जो बराबरी का अधिकार खोज रहे हैं । सामान्यतया कुछ लोग राजावादी को तीसरी विचारधारा वाला नागरिक के श्रेणी में रखते हैं । परन्तु संविधान में जो खस आर्य जाति की परिभाषा की गई है, उसमे राजावादी और गणतंत्र वादी मूल में एक ही है । अतः मैंने मौलिक रूप से नेपाल में दो ही विचारधारा के लोगो को पाया है । अब यदि नेपाल को हम एक परिवार के रूप मे व्याख्या करते हैं, तो भी जीवन यापन हेतु अधिकार के लिए परिवार में कलह और संघर्ष स्वाभाविक रूप से होता आया है । समझदारी कायम न होने पर लड़ाई और अंत में बटबारा होने की घटना भी सामान्य है । आवश्यक है एक सर्वजन हिताय भाव का । समग्र विकास हेतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण का । आपसी समझदारी और सर्वमान्य संविधान का । तराई पहाड़ और हिमाल के समुचित विकास और संरक्षण का । शालीनता के प्रतीक हिन्दू सनातन संस्कृति और सम्यकता के हिमालय बौद्ध संस्कृति के बÞीच प्रज्ञापूर्ण सम्वन्ध का । मधेसियों के सृजनशीलता और पहाडि़यों के साहसिकता के बीच प्राविधिक सम्वन्ध का । जबकि यहाँ के ७ प्रतिशत शासक और उनके अनुयायी तथाकथित बुद्धिजीबी लोग अपनी साख और सत्ता कायम रखने के लिए नेपाल के ९३ प्रतिशत नागरिक के भावनाओं को कुचलने के लिए आध्यात्मिक देश भारत से दूरी बढ़ाकर आतंकी देश पाकिस्तान से हार्दिकता दिखा रहे हैं । इन मूढो को कौन समझाए कि परिवार के किसी सदस्य को दमन करने पर उसके भविष्य के रक्षा हेतु न्यायालय का द्वार खुला रहता है । चाहे वो राष्ट्रीय हो या अंतर्राष्ट्रीय। नेपाल के ९३प्रतिशत नागरिक अब अपने को इस व्यवस्था में सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं । एक एक कदम पर लड़ना पड़ता है । हर काम के लिए आन्दोलित होना पड़ता है । जो अपनेआप होना चाहिए, उसके लिए मधेसियों को आन्दोलन के सिवा कोई उपाय नहीं है । यहाँ वही मधेसी अपने को सुरक्षित अनुभव कर रहे हैं, जो खस के गुलामी को अपने मांस मज्जा में घुसाए हुए हैं । या वो जो निपट मुर्ख हैं । जिन्हें जीवन और भविष्य का कोई वोध नहीं है । नयी पीढ़ी शिक्षित हो रहे हैं, जो गुलामी और षडयंत्र को सपने में भी स्वीकार नहीं करेंगे । आनेवाला दस वर्ष नेपाल के लिए कठोर निर्णय का काल होगा । गणतंत्र की गरिमा को समझने का प्रयास यहाँ के सत्तासीनो को करना होगा ।
प्रत्येक नागरिक को सम्मान पूर्वक अधिकार संपन्न करना होगा । देश का अर्थ भूमि का सीमाखंड ही नहीं होता है, जनता और सांस्कृतिक विरासत भी होता है । इसे गंभीरता पूर्वक लेना ही होगा । भारत और नेपाल केवल पड़ोसी देश नहीं हैं बल्कि इनका सदियों पुराना नाता है जो इन्हें सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, और धार्मिक रूप से जोड़ता है ।
नेपाल से भारत का रिश्ता रोटी और बेटी का है । जिसका आधार मधेसी और गोरखाली हैं । जो कि नेपाल और भारत को कभी शत्रु के रूप में नहीं देख सकता । भले ही तथाकथित राष्ट्रवादी भारत से नेपाल की दूरी बढ़ाने का असफल प्रयास करे । आम जनता भारत और नेपाल को शरीर और आत्मा के रूप में देखती है । वैसे सरकारी स्तर से भी सदियों से इस रिश्तों की परंपरा को दोनों देशों ने निभाया है । भारत–नेपाल के बीच कोई सामरिक समझौता नहीं लेकिन नेपाल पर किए गए किसी भी आक्रामण को भारत बर्दाश्त नहीं कर सकता । जिस प्रकार डोकलाम से चीनी घुसपैठ और षडयंत्र को भारत ने निष्फल कर दिया वही अवस्था नेपाल में घुसपैठ करने की सोच रखनेवाले किसी भी देस के साथ भारत करेगा ।
१९५० से लेकर अब तक नेपाल में जो भी समस्याएं आई भारत ने उसको अपना माना और भरपूर साथ दिया, भारतीय नेपाली या भारतीय गोरखा वह लोग हैं जो नेपाली मूल के लोग हैं लेकिन भारत में रहते आ रहें हैं जिन्हें भारतीय नागरिकता प्राप्त है । वह लोग नेपाली भाषा के अलावा भी कई भाषाएं बोलते हैं । नेपाली भाषा भारत के कार्यालयी भाषाओं में से एक है । ठीक इसी प्रकार नेपाल के दक्षिणी भूभाग में रह रहे लगभग १.५ करोड़ भारतीय मूल के नेपाली नागरिक नेपाल में रह रहे हैं । जिनकी मूल भाषा हिंदी, मैथिली, भोजपुरी, बज्जिका और थरुहट है । जिन्हें नेपाल में तीसरे दर्जे के नागरिक के रूप मे देखा जाता है । भारत पर लगाए जा रहे नाकावंदी के आरोप वास्तव में भारतीय मूल के नेपालियो के संवैधानिक अधिकार को हनन करने और ओझल में डालने का षडयंत्र है । मोदी को नहीं गाली दिया जा रहा है वास्तव में मधेसी को गाली दिया जा रहा है । वह जानता है कि अब उसके हाथों से सत्ता खिसकने लगा है । और मधेसियों को अब ज्यादा दिन तक गुलाम नहीं बनाया जा सकता । वास्तव में मधेश वह उर्वरा भूमि है, जिसको विकसित होने में चन्द महीने लगेंगे । यदि भारत ठान ले तो, बस भय यही से शुरू होता है। कहावत है, खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे । यही हाल यहाँ के खस समुदायों का है । हिमालय की महिमामयी भूमि में इतने क्षुद्र लोगों को देख पर्वतराज हिमालय भी सर को झुका लिए होंगे । भगवान पशुपति नाथ को लग गया होगा कि, ये लोग पशु ही रह गए । भला वानाशुर को कृष्ण से प्यार भी हो तो कैसे ?
इन मूढो को कौन समझाय की मनीषा कोइराला चीन में नायिका नहीं बन सकती । उदित नारायण चीनी गायक नहीं हो सकते । पशुपति नाथ के दर्शन करने आनेवाले शैलानियों का झुण्ड पाकिस्तान और चीन का नहीं हो सकता । घर घर में देखे जानेवाले टी भी सीरियल और फिल्म चीनी नहीं हो सकता । नेपाली भाषा पाकिस्तानी और चीनी लोग नहीं समझते । बुद्ध को जानने के लिए भी भारत ही जाना होगा । महावतार बाबा, पायलट बाबा, ओशो, जे कृष्णमूर्ति, श्री श्री रवि शंकर, बाबा रामदेव लगायत के संत पाकिस्तान में नहीं मिलेंगे । पतंजलि, चरक, सुश्रुत, चार्वाक, वेदव्यास, कणाद,याज्ञवल्क्य, गार्गी, कालिदास, मम्मट, अष्टावक्र, जनक, सुखदेव, रविन्द्रनाथ टैगोर, बाल्मीकि, तुलसीदास, विवेकानन्द‘‘ जैसे लाखों दिव्यात्माओं को कहाँ से लाओगे ? ध्यान से समाधि तक का यात्रा क्या आत्मघाती आतंक के शिरमौर से प्राप्त होगा ? कणकण में रमण कर रहें राम , जिसको पाना हमारा परम लक्ष्य है । उसको क्या अणुबम में खोजोगे ? कृष्ण की बाँसुरी की धुन और भक्ति का महारास क्या काश्मीरी पत्थर बाज और मोर्टार में मिलेगा ? ध्यान रहे, अब भगवान बुद्ध के वर्तमान प्रतिनिधि बुद्ध श्री दलाईलामा भी अब तिब्बत में नहीं भारत में ही मिलेंगे । चीन में बुद्ध के लिए कोई स्थान नहीं है । और बुद्ध ज्ञान का वह हिमालय हैं जिनका जन्म नेपाल में हुआ था क्या इसे भी खो दोगे ? एक मधेशी को अपमानित करने में पूरी संस्कृति और ऐतिहासिकता को कलंकित करना होगा । जिस आर्यावर्त भरतखण्ड को स्वयं परमात्मा ने सृजन किया हैं, उसको विधर्मियों के हाथों में सौपकर अपनी संस्कृति और पूर्खा को कलंकित कर भस्मासुर मत बनो ।
है तंत्र वही सर्वोत्तम जिसमे, सब की सहमति ली जाए ।
सब का आदर सब का ख्याल, प्रतिभा की इज्जत की जाए ।।
जबतक सब का सम्मान नहीं, तबतक उत्तम परिणाम नहीं ।।।
अथ प्रज्ञा शरणं गच्छामि, भज बुद्धं शरणं गच्छामि ।।।।

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