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मीरा की भक्ति भावना : उर्मिला सिंह

हिमालिनी अंक मई २०१९ |‘सन्तोऽनपेक्षा मच्चिताः प्रशान्ताः समदर्शिताः ।
निर्ममा निरहांकारा निद्र्वन्द्वा निष्परिग्रहाः ।। ’
अर्थात जिनमें निरपेक्षता भगवतपरायणता, शान्ति, समदृष्टि, निर्ममत्व, अहंकारशून्यता, द्वन्द्वहीनता, और निष्परिग्रह आदि गुण होते हैं, वे सन्त हैं ।
संत कवियों ने स्वतंत्र चिंतन पर जोर दिया । उस स्वतंत्र चिन्तन का आधार तर्क था । इस तर्क से जहाँ एक ओर मिथक चकनाचूर होने लगे, वहीं दूसरी ओर जनता में व्याप्त भय दूर होने लगा । भगवान श्रीकृष्ण ने लोक हित के सामने अपने किसी स्वजन विशेष के हित को स्थान नहीं दिया । यही कारण है कि सन्त नारियों ने श्रीकृष्ण को अपना अराध्य स्वीकार किया है । भारत ही नहीं, बल्कि विश्व में भी कृष्ण के अनेक उपासक रहे हैं । उनका अवतार तो मानों मानवीयता के रक्षार्थ ही होता हैं । अतः सन्त नारी स्वतः ही कृष्ण की अनुगामिनी हो गई । नारी तो स्वयं शक्ति का रूप मानी जाती है इसलिए भारतीय समाज में उन्हें पूज्य माना जाता है । हिन्दी साहित्य में अनेक पूज्य नारियाँ हुईं, जिन्होंने कृष्ण के प्रति स्वयं को समर्पित किया । उनका समर्पण केवल ईश्वर के प्रति समर्पण नहीं था बल्कि लोक हित और राष्ट्र हित के प्रति समर्पण का भाव था ।
अँसुवन जल सींच.सींच प्रेम बेलि बोने वाली राजस्थान कोकिला मीराबाई का जन्म जोधपुर के प्रसिद्ध राठौर राजा रावजोधाजी के कुल में हुआ था । मीराबाई रतनसिंह की इकलौती संतान थीं । बचपन से ही मनमोहन कृष्ण की भक्ति के रंग में रंग गईं थीं । उन्होंने महल त्यागा और साधुओं की संगति की । मीरा ने स्पष्ट कहा है कि कृष्ण के रूप ने उसे लुभाया है । कमल रूपी नेत्रों ने उसे आकृष्ट किया । मोर मुकुट, पीताम्बर तथा कुण्डल ने अपनी ओर खींच लिया । मीराबाई ने भक्ति की महिमा को व्यक्त किया है । उनका आत्मसमर्पण संसार के लिए आदर्श स्वरूप है । भक्ति के क्षेत्र में आत्म समर्पण का भाव श्रेष्ठ माना जाता है । मीराबाई का जीवन संघर्षमय रहा है । भक्ति के क्षेत्र में जो अपने अराध्य की भक्ति में डूब जाते हैं वे तर जाते हैं । मीराबाई कहती हैं–
राम नाम रस पीजै मनुआँ, राम नाम रस पीजै ।
तज कुसंग समसंग बैठे णित हरि चर्चा सुण लीजै ।
काम क्रोध मद लोभ मोह कूँ, बहा चित्त सूँ दीजै ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, ताहिके रंग में भीजै ।

मीरा सामान्य भक्तों से अलग थीं और भक्ति के सांस्थानिक और सांप्रदायिक रूपों के साथ उनके संबंध सहज नहीं थे, इसकी पुष्टि मध्यकालीन वल्लभ साम्प्रदायिक चरित्र आख्यानों में आए मीरा विषयक प्रसंगों से होती है । मध्यकाल में ब्रज मंडल और उससे बाहर कृष्ण भक्ति के वल्लभ सम्प्रदाय, राधावल्लभ सम्प्रदाय चैतन्य सम्प्रदाय, निम्बार्क सम्प्रदाय आदि कई सांस्थानिक रूप अस्तित्व में आ गए थे । इनकी गद्दियां और श्ष्यि परम्परा भी कायम हुई । कृष्ण भक्ति के इन विभिन्न सम्प्रदायों में वैमनस्य का तो कोई साक्ष्य नहीं मिलता, लेकिन प्रभावशाली व्यक्तियों को दीक्षा देने और इस तरह अपने वर्चस्व का दायरा बड़ा करने की प्रतिस्पर्धा इनमें जरूर रही होगी । इन सम्प्रदायों में वल्लभ सम्प्रदाय की पहुँच और प्रभाव का दायरा सबसे बड़ा था । इसका अलग दर्शन, भक्ति पद्धति, संगीत और चित्रकला आदि भी बने । मीरा से इस सम्प्रदाय के संबंध कटुतापूर्ण थे । मीरा की भक्ति सामान्य लोक भक्ति थी, यह उसके लिए राजसत्ता और पितृसत्ता के विरुद्ध विद्रोह का ढ़ग था । मीरा की यही भक्ति और ढ़ग जनसाधारण में लोकप्रिय थे और सामंत स्त्री होने के कारण उनकी सामाजिक हैसियत भी बहुत ऊँची थी, इसलिए वल्लभ सम्प्रदाय के लोग उन्हें दीक्षा देकर अपने साथ संबद्ध करना चाहते थे । मीरा को यह स्वीकार नहीं था क्योकि वह परमात्मा की भक्ति में तल्लीन सभी लोगों को अपना सम्प्रदाय मानती थी । तमाम कोशिशों के बावजूद मीरा ने न तो वल्लभाचार्य से दीक्षा ली और न ही उन्हें कृष्ण का अवतार स्वीकार किया ।

भक्ति के क्षेत्र में भक्त, भगवान और जगत तीनों का अस्तित्व होता है । इन तीनों की सरल व सही व्याख्या से ही ईश्वरोपासना हो सकती है । मीराबाई ने भक्त और भगवान से संबंधित विविध प्रकार के संबंधों का चित्रण किया है । उनकी रचनाओं में विविध प्रकार के संबंधों पर प्रकाश डालने के बावजूद भक्ति की प्रधानता दिखाई देती है । मीरा का रचनाकर्म बारम्बार पुनर्जन्म में विश्वास व्यक्त करता है । यह उनके कृष्ण.प्रेम को प्रेमाभक्ति का आधार देता है और साथ ही कर्मफल का भय समाप्त कर देता है । उनको कृष्ण भक्ति पूर्व जन्मों के पुण्य के कारण प्राप्त हुई है । मीराबाई ने कृष्ण को ही अपना सब कुछ मान लिया था(’’मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’’ उनकी कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम भावना सर्व्विदित है । इसके मूल में वैश्विक भावना ही निहित है । विश्व के कण कण में व्याप्त रहने वाले कृष्ण के चरित्र में छोटा.बड़ा, ऊँच.नीच आदि कुछ भी ऐसे भाव नहीं पाए जाते । मीरा के मन में कृष्ण के चारित्रिक साम्य भाव को देखा जा सकता है । मीराबाई का सम्पूर्ण काव्य श्रीकृष्ण को ही समर्पित है । वह तो प्रेम की दीवानी थी । मीरा में दर्शन या विचारों की खोज व्यर्थ है, वह प्रेम दीवानी थी । प्रेम ही उनका दर्शन और प्रेम ही उनका जीवन है । मीराबाई की भक्ति अद्वैत भाव की ओर मुड़ती दिखाई देती है विरह उनके लिए अग्नि समान है और ईश्वर उसके हृदय में बसता हैः

जिनके प्रिय परदेस बसत है, लिख लिख भेजें पाती ।
मीरा पिय, मोरे हिया बसत है, न कहुँ आती.जाती ।।

मीराबाई की जीवनी और साहित्य को परखने से एक बात स्पष्ट होती है कि पहले वे भक्तिन हैं, बाद में वे कवयित्री बनी हैं । मीरा घुंघरु पहनकर नाचती हुई श्री कृष्ण के पद गाया करती थीं । वे सहज भक्तिन हैं । अपने लौकिक जीवन को त्यागने के बाद ही वे भक्ति की ओर उन्मुख हुईं । उनकी रचनाओं में श्रृंगार रस की प्रधानता है । श्री कृष्ण ही उनके अराध्य है । मीराबाई ने संयोग श्रृंगार के अंतर्गत श्रीकृष्ण के रूप और गुण आदि का वर्णन किया है ।
मैं गिरधर रंग राती, सैंया मैं ।

पंचरंग चोला पहर सखी मैं, झिरमिट खेलन जाती ।
ओह झिरमिट मा मिल्यौ साँवरा,े खेल मिली तन गाती ।
जिनका पिया परदेस बसत है, लिख.लिख भेजै पाती ।
मेरा पिया मेरे हिय बसत है, ना कहूँ आती जाती ।

माधुर्य भक्ति के मर्म में बैठी विरहिणी स्त्री स्वर को अति संवेदी पीड़ा का साकार रूप बना देती है । विरहिणी की यह छवि कई पुरुष भक्तों की रचनाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है(जैसे जयदेव, सूरदास, कबीर, दादूदयाल, नानक, सुंदरदास, दरियासाहब इत्यादि । यहाँ भी विरह को स्त्री व पुरुष भक्तों ने फिर अलग.अलग ले लिया है । मीराबाई में सबसे मुखर व गहरा भाव विरह ही है जो प्रेम कवित्त व लोक गीतों की पारम्परिक शैली में अभिव्यक्त किया गया है(
आप न आवै लिखि नहीं भेजै
दीपक जोय कहा करुँ सजनी, पिया परदेस रहाये
प्रीतम को पतिया लिखूँ रे कागा तू ले जाय
जायजी प्रंीतमजी सू यूँ कहे रे, थारी विरहन धानन काय ।
मीरा की भक्ति की आध्यात्मिक विपणन नीति बहुत कुछ राजपूत राज्य में प्रयुक्त परिवार तथा राजनीतिक अर्थनीति के करीब है किन्तु इसकी रचना प्राचुर्य भाव में की गई है । मीरा की भक्ति एक सुदीर्घ ऐतिहासिक समयान्तराल से जुड़ी है । ऋगवेद तथा ब्राह्मण मिथकों के अनुसार, अकांक्षा इस सृष्टि में या तो ’सहज प्रवृत्ति’ के रूप में या किसी विनाशक शक्ति के रूप में प्रकट होती है । मीरा की भक्ति में संलग्न स्त्री स्वर दासत्व को स्त्री कामनाओं की आधारभूमि बना देता है । ये अवधारणाएं असंगत या परस्पर समानांतर नहीं रह जातीं । मीरा के हृदय प्रदेश को पावन बनाकर जब कृष्ण उसमें बस गये तो इस आनंद को वह अवर्णनीय कहती हैंः
घट के सब पट खोल दिए हैं
लोक लाज सब डार के
मन रे, परसि हरि के चरण
मेरो मन लगो हरि सूँ, अब न रहूँगी अटकी
हरि जन धोबिया रे, मैल मना दी धोय
मेरे पिया मेरे हृदय बसत हैं ये सुख कहियो न जाती
रारली होय के किन रे जाऊँ, तुम हो हिरदारो साज
बिन पिया जोत मन्दिर अँधियारी
मेरो मन बसिगो गिरधरलाल ।
जब कृष्ण उनके हृदय के आभूषण हैं, तो मन एक मंदिर सा बन जाता है, जिसमें सारी जीवन क्रियाएं व इच्छाएँ केन्द्रित हो सकती हैं ।
भक्ति आंदोलन की एकता और अविच्छिन्नता पर यदि ध्यान दे ंतो ज्ञात होता है कि निर्गुण और सगुण का भेद कहीं बाधक नहीं है । मीरा की कविता में भक्ति आंदोलन की एकता का बोध दूसरों से अधिक व्यापक है । भक्ति आंदोलन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर समाज के दबे.कुचले और निचले स्तर के लोगों ने शिरकत की, इसके ऐतिहासिक कारणों की चर्चा भक्ति आंदोलन के संदर्भ में हुई है किंतु इसी भक्ति आंदोलन में बड़े पैमाने पर स्त्रियों ने भाग लिया, अच्छी रचनाएं लिखीं किन्तु उसकी चर्चा बहुत कम हुई है । भक्ति आंदोलन के विचारात्मक आधार पर ध्यान दे ंतो यहीँ नारी के लिए असम्मानजनक धारणा है । भक्ति आंदोलन स्त्रियों के लिए प्राणदायक सिद्ध हुआ हो, ऐसा भी नहीं है । यहाँ साधारण स्त्री नरक का द्वार है । वह साधना में बाधक है । वह सती हो तो कबीर के यहाँ प्रशंसा के योग्य है, वह स्वकीया हो तो तुलसी के यहाँ वरेण्य है । कृष्ण भक्ति के क्षेत्र में गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम आत्मा का परमात्मा से प्रेम है । वहाँ ’रास’ साधारण स्त्री. पुरुषों का उल्लास नृत्य नहीं है बल्कि अखिल ब्रह्मंड का महारास है ।
स्त्री रचनाकारों ने भक्ति आंदोलन के क्षेत्र में जो प्रश्न उठाए हैं वे उनके पुरुष सहयोगियों से भिन्न हैं । महिलाओं के संघर्ष का स्तर वहाँ दोहरा है । सामंती व्यवस्था की जकड़बंदियों और निषेधों से तो उन्हें संघर्ष करना ही पड़ा, प्रेम के स्तर पर भी उन्हें लड़ाई लड़नी पड़ी । ’’भक्तिकाल के कवियों में मीराबाई का प्रेम सबसे अधिक सहज उत्कट और विद्रोही है । उनको प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए किसी मध्यस्थता की जरूरत नहीं होती है । न कबीर की तरह रूपक की, न जायसी की तरह लोक कथा की और न सूर की तरह गोपियों की’’ वहाँ सीधा प्रत्यक्ष निवेदन है, निर्भय और निद्र्वन्द्व आत्माभिव्यक्ति । मीरा के सामने भावजगत से अधिक भौतिक जगत की, सीधे पारिवारिक और सामाजिक जीवन की चुनौतियाँ तथा कठिनाइयाँ थीं । मीरा अपने संघर्ष की परिस्थितियों के बारे में पूरी तरह सजग हैं उन्होंने कहा है कि(’’तन की आस कबहूँ नहिं कीनो, ज्यों रण माँही सूते । ’’ उनका संघर्ष असाधारण है । संकल्प उनकी शक्ति का मुख्य स्त्रोत है । संकल्प के पीछे प्रेम में अटूट आस्था का बल है । तभी वे विरोधियों को चुनौती देती हुई घोषणा करती हैं ः
लोक लाज कुल कानि जगत की, दइ बहाय जस पानी ।
अपने घर का परदा कर ले, मैं अबला बौरानी ।
अपने प्रेम की रक्षा के लिए मीरा का संघर्ष चैतरफा है उनके विरोध में राणा की राज सत्ता है और सिसोदिया कुल की मर्यादा भी । मीरा की सामाजिक सजगता का एक प्रमाण यह भी है कि उन्होंने जहाँ भी सामंती समाज की रुढि़यों को चुनौती दी है वहाँ समान धर्मा माँ या सखी को ही संबोधित किया है, भाई या पिता को नहीं । प्रेम ही मीरा के सामाजिक संघर्ष का साधन है और साध्य भी । यद्यपि कबीर भी कहते हैं कि प्रेम का घर खाला का घर नहीं है, लेकिन मीरा की पे्रम साधना कबीर से भी अधिक कठिन है ः
लगन को नाँव न लीजै, री भोली ।
लगन लगी को पैंडो ही न्यारों, पाँव धरत तन छीजे ।
जे तूँलगन लगाई चाहे, सीस को आसन कीजै ।
मीरा की कविता में भक्तिकाल के सामाजिक संदर्भ मूलतः सामंती संबंधों की आलोचना में मिलते हैं । मैनेजर पाण्डेय ने लिखा है(’’ मीरा का विद्रोह एक विकल्प विहीन व्यवस्था में अपनी स्वतंत्रता के लिए विकल्प की खोज का संघर्ष है । उनको विकल्प के खोज के संकल्प की शक्ति भक्ति से मिली थी यह भक्ति आंदोलन का क्रांतिकारी महत्व है । मीरा की कविता में सामंती समाज और संस्कृति की जकड़न से बेचैन स्त्री स्वर की मुखर अभिव्यक्ति है । उनकी स्वतंत्रता की आकांक्षा जितनी आध्यात्मिक है, उतनी सामाजिक भी । मीरा का जीवन संघर्ष उनके प्रेम का विद्रोही स्वभाव और उनकी कविता में स्त्री. स्वर की सामाजिक सजगता भक्ति.आंदोलन की एक बड़ी उपलब्धि है । नाभादास ने मीरा के संघर्ष के महत्व को पहचानते हुए भक्तमाल में लिखा हैः
’’सदरिस गोपिन प्रेम प्रकट, कलियुगही दिखायो ।
निरअंकुश अति निडर, रसिक जस रसना गायो ।।
मीरा के प्रिय लौकिक व्यक्ति हों या अलौकिक गिरधर गोपाल किंतु मीरा का प्रेम प्रेम की पीर सच्ची है । मीरा ने तो माया के साधनों को , सुख ऐश्वर्य की चीजों को , खुद ही छोड़ा था और मन को एकनिष्ठ कर प्रिय के चरणों में लगा दिया । मीरा, गोपाल से अपने संबंधों के बारे स्पष्ट संकेत करती हैं ः
‘राणाजी म्हारे गिरधर प्रियतम प्यारे हो’
मीरा अपने बाल सनेही की खोज में सब कुछ त्याग कर आई है । यह बाल सनेही उनका मनचीता है, इसके लिए परम्परा से प्राप्त संबंध त्याग आई हैं । प्रेम तो उन्होंने ढोल बजाकर किया है ः
माई मैं तो लियो रमैया मोल ।
कोई कहै छानी ,कोई कहै चोरी
लियो है बजंता ढोल ।
भक्ति आंदोलन के प्रवर्तन के पीछे राजनीतिक, आर्थिक कारणों से वर्ण व्यवस्था को ढीला पड़ना पड़ता है । इस आंदोलन ने बड़ी संख्या नें निम्न वर्ग और नारी को घर की चाारदीवारी की कुंठा को तोड़कर भगवान की उपासना करने की प्रेरणा दी । मीराबाई उन्हीं में से एक हैं । मीरा की भक्ति विरोधाभासी है, वह स्वयं को कमतर करने के प्रयासों का विरोध भी करती हैं, सहयोग भी, इसमें क्रांतिकारिता और समझौते दोनों के तत्व हैं । समाज में आ रहे परिवर्तन से उत्पन्न होकर असमानता के कुछ स्तरों को कम करने की आकांक्षा के साथ, एक नए शब्द भण्डार तथा अनुभूति की कुछ मीनारें बनाने में हिस्सा लेती हैं । जिस आधार को खोज पाने के लिए वे बाहर आईं हैं, उसे खो देने के कारक तत्व उसी के भीतर मौजूद हैं । यदि मीरा की भक्ति स्वयं को घेरे हुए लक्ष्मण रेखा लाँघ पाती है तो इसलिए कि वह स्वयं निर्णय लने के लिए अधिक स्वतंत्र है और इस प्रक्रिया मे बाहरी प्रतिबन्धों को अन्तस्थ कर सकती है ।
सन्दर्भ ग्रंथ
१. भारतीय नारी संत परम्परा÷बलदेव वंशी, २०११
२. हिन्दी काव्य और उनका सौंदर्य÷ डॉ. ओमप्रकाश
३. मीराबाई और भक्ति की आध्यात्मिक अर्थनीति, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, २०१२
४. सुधा सिंहः मध्यकालीन साहित्य विमर्श, आनंद प्रकाश्न, २००४ कलकत्ता
५. डॉ. मैनेजर पाण्डेय ः भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य, वाणी प्रकाशन, दिल्ली १८८३
६. रामस्वरूप चतुर्वेदीः भक्ति काव्य यात्रा, लोकभारती प्रकाशन
७. आलोचना त्रैमासिकः सहस्राब्दी अंक छब्बीस, जुलाई.सितम्बर २००७

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