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धोनी तुम ऐसे नहीं जा सकते, तुम इससे बेहतर विदाई के हकदार हो

13 july

क्रिकेट को धर्म मानकर खिलाड़ियों को भगवान की तरह पूजने वाले देश ने सचिन, सौरव, द्रविड़, अजहर और कुंबले से भी विश्व कप की आस लगाई थी। फिर 2007 में इन्हीं खिलाड़ियों के मायूस चेहरों की तस्वीरों में आग तक लगाई थी। भारत में क्रिकेट लगभग अपने गर्त की ओर जा रहा था, तभी एक छोटे से शहर से आए लंबे वालों वाले एक लड़के ने इतिहास रच दिया। 2007 में युवा खिलाड़ियों से सजी टीम ने उलटफेर करते हुए टी-20 विश्व कप का खिताब अपने नाम किया

न्यूजीलैंड से हारने वाली रात पूरा भारत रोया था। सेमीफाइनल से बाहर होकर भारत की विश्व कप से विदाई जो हो चुकी थी। सभी के जेहन में धोनी तैरने लगे थे, उनका रन आउट याद आ रहा था। कोई अब भी यह यकीन करने को तैयार नहीं था कि माही लकीर पार नहीं कर पाए। वह लकीर जिसने भारत की आखिरी उम्मीद भी मिटा दी। मैन इन ब्लू की हार के साथ ही धोनी की चुस्ती पर भी सवाल उठने लगे। उनकी जमकर आलोचना होने लगी, जो बदस्तूर जारी है। कारण सिर्फ एक है, देश का धोनी पर भरोसा, लोगों का गुस्सा धोनी के प्रति जायज भी तो है, क्योंकि उन्हीं ने तो देश को बताया कि हां सपने भी सच होते हैं। लोग चाहते हैं कि धोनी जल्दी रिटायर हो जाए, पर देशवासी ये नहीं जानते कि जिस खिलाड़ी पर वो अंगुली उठा रहे हैं उसका एक नाम कैप्टन कूल भी है, जब माही को लगेगा अब कुछ भी कूल नहीं हो रहा तो वह ठीक वैसे ही चले जाएंगे जैसे चुपचाप ऑस्ट्रेलिया में बीच सीरीज के दौरान टेस्ट कप्तानी छोड़ दी थी।
सेमीफाइनल में रन आउट होने के बाद फील्ड से पवेलियन तक की दूरी तय करने में धोनी करियर में पहली बार हारे हुए से लगे। डेढ़ दशक में उनके द्वारा खेले गए सैकड़ों मुकाबलों में टीम जीती है और हारी भी है, मगर उनके चेहरे के भाव सदैव एक से बने रहे। पोकर फेस वाला यह खिलाड़ी उस शाम सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानियों को भावुक कर गया। क्रिकेट भावनाओं के उभार का खेल है, इसके बावजूद धोनी शांत बने रहते हैं। जो एक परिपक्व मस्तिष्क का परिचायक है। जो प्रत्येक हार और जीत में एक समान बना रहता है और ये जाहिर करता है कि धोनी ने अपनी उपलब्धियों को कैसे बखूबी पचाया। भारत के सबसे सफल कप्तान को कोसने, संन्यास लेने के लिए दबाव बनाने और सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वाले उस नाकामयाब प्रेमी की तरह बर्ताव कर रहे हैं, जिन्हें शायद विश्वास था कि टॉप ऑर्डर के फेल हो जाने के बाद सिर्फ धोनी ही क्रीज पर आकर देश की हर वो उम्मीद पूरी कर देंगे जिसकी आस सभी ने लगाई है।

क्रिकेट को धर्म मानकर खिलाड़ियों को भगवान की तरह पूजने वाले देश ने सचिन, सौरव, द्रविड़, अजहर और कुंबले से भी विश्व कप की आस लगाई थी। फिर 2007 में इन्हीं खिलाड़ियों के मायूस चेहरों की तस्वीरों में आग तक लगाई थी। भारत में क्रिकेट लगभग अपने गर्त की ओर जा रहा था, तभी एक छोटे से शहर से आए लंबे वालों वाले एक लड़के ने इतिहास रच दिया। 2007 में युवा खिलाड़ियों से सजी टीम ने उलटफेर करते हुए टी-20 विश्व कप का खिताब अपने नाम किया।
यही से देश में एक बार फिर से क्रिकेट के लिए जिंदा हो उठा। कप्तानी मिलते ही धोनी ने देश के हर एक सपने को पूरा किया। पहले टीम को टेस्ट और फिर वन-डे में भी नंबर एक बनाया। 90’s के बच्चों ने अपने कमरे में सचिन की जगह धोनी के पोस्टर लगाने शुरू किए, सचिन के प्रति लोगों का प्रेम था, तो धोनी भरोसे का दूसरा नाम बनते गए। ब्लैक एंड वाइट टीवी के जमाने में 1983 में कपिल देव को ट्रॉफी थामे हर किसी ने देखा। फिर देश में कलर टीवी तो आ गई पर वर्ल्ड कप की रंगीन तस्वीर अब तक आनी बाकी थी। 2011 का विश्व कप भला कौन भूला सकता है, जब अपने दनदनाते छक्के के बूते धोनी ने 28 साल बाद भारत को दूसरा विश्व कप दिलाया। दिग्गजों से सजी टीम की कमान संभालने वाले कैप्टन कूल ने विश्व कप अपने हाथों में थामकर देश को समर्पित कर दिया, मानो कहा हो, बस ऐसे ही भरोसा करते रहिए। इस तस्वीर को आज भी यूट्यूब पर देखकर करोड़ों क्रिकेट प्रेमी अपने चेहरे पर मुस्कुराहट घोल लेते हैं।
धोनी की कप्तानी के दौर में सचिन, सहवाग, गांगुली स्लो थे, कोहली की कप्तानी में धोनी स्लो हैं। ये समय का चक्र है, जो चलता रहेगा। नए जमाने वाले फैंस को हक है कि धोनी के प्रदर्शन पर सवाल करें। धोनी हमारी पीढ़ी के क्रिकेटर हैं, मतलब कि हम जैसे जितने लोगों ने क्रिकेट को 2003 के वर्ल्डकप से देखना शुरू किया था या देखने का डेब्यू ही उस वर्ल्ड से किया था। उन सभी लोगों ने धोनी के कद को भारतीय क्रिकेट में बढ़ते देखा। क्रिकेट को माही के रंग में संवरते देखा। माही के हल्के काले-भूरे लंबे बालों को छोटे और फिर सफेद होकर चमकते देखा। धोनी के छक्के पर पूरे देश को झूमते भी देखा।
धोनी एक ऐसे सफल कप्तान रहे हैं, जो हर मैच के लिए अपने घोड़े खुद चुनते, फिर उनके तालमेल से अपने तरकश से अचूक दांव निकालकर विपक्षी टीमों पर चल देते। अपने शांत दिमाग से खुद के फैसलों को सही साबित कर विरोधियों का मुंह बंद कर देना धोनी का एक विशेष गुण है। संन्यास का फैसला धोनी का है, लेकिन फिलहाल टीम इंडिया को माही की जरूरत है। कोहली को अपने बड़े भाई की जरूरत है, ताकि वह सेमीफाइनल में मिली बड़ी हार को दरकिनार कर अगले विश्व कप के लिए टीम तैयार कर सकें। बुमराह, शमी, चहल और कुलदीप को जरूरत है, ताकि माही विकेट के पीछे से उन्हें बताएं कि अब कैसी गेंद फेंकनी है। पूरी टीम को एमएस की जरूरत है, क्योंकि टीम ने ऐसी ही हार 2015 में भी झेली थी और सभी को खड़ा कर एक बार फिर से तैयार किया था। रही बात संन्यास की तो माही चुपचाप वैसे ही अलविदा कह देंगे, जैसे वह जीत के बाद एक स्टंप को बगल में दबाए मैदान से निकल जाते हैं।

अमर उजाला से साभार

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