Sat. Dec 7th, 2019

क्या बाढ की समस्या को लेकर नेपाल और भारत दोनों ही गम्भीर है ? : श्वेता दीप्ति

  • 325
    Shares

डा‍ श्वेता दीप्ति

विपदा बोल कर नही आती पर कुछ विपदाएँ ऐसी हैं जो लगभग तय होती हैं । ऐसी ही विपदा है बाढ़ की, कमोवेश हम सभी जानते हैं कि बारिश का मौसम और मौनसून का आना जहाँ सुखद होता है वहीं यह जानलेवा भी होता है । हर वर्ष देश के किसी ना किसी क्षेत्र में यह आपदा आती है और विनाश के चिह्न छोड़कर चली जाती है । प्रकृति पर किसी का वश नहीं चलता हम लाख दावा करें कि हमने प्राकृतिक विनाश से बचने के लिए साधन तैयार कर लिए हैं पर यह सभी उसके सामने खोखला सिद्ध हो जाता है । आखिर क्या वजह है जो प्रकृति सयंमित नहीं हो पा रही क्या इसके पीछे विकसित सभ्यता और विकास की अदम्य चाहत के नाम पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं है ? निरन्तर वनों का नाश, नदियों को बाँधना, पहाड़ों को काटना ये कौन कर रहा है ? सच तो यह है कि हम स्वयं अपने और आने वाली पीढ़ी के लिए विनाश की जमीं तैयार कर रहे हैं ।

हर मानसून, जब भी नेपाल भारत की सीमा से सटे गांवों में बाढ़ आती है, भारतीय क्षेत्र में बनी सड़कें और आधारभूत संरचना चर्चा का विषय बन जाती है । लेकिन जैसे जैसे बारिश समाप्त होती है, अगले मानसून तक के लिए यह मुद्दा भी खत्म हो जाता है ।
जैसा कि पिछले कुछ दिनों में मूसलाधार बारिश के बाद भारत की सीमा से लगे नेपाली गांवों में भारी बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है, फिर से यह चिंताएं हैं कि सीमा के किनारे भारत द्वारा तेजी से सड़क और बुनियादी ढांचे के निर्माण के कारण आपदा बड़े पैमाने पर हुई थी ।
भले ही यह एक बारहमासी समस्या रही है, नेपाल में लगातार सरकारें स्थायी समाधान की तलाश में विफल रही हैं । और नेपाली पक्ष की कुछ पहल के बावजूद, भारत सरकार की प्रतिक्रिया गम्भीर नही रही है ।
भारत के साथ बातचीत की श्रृंखला में शामिल पूर्व जल संसाधन सचिव शीतल बाबू रेगमी के अनुसार दोनों तरफ की सरकारें तराई क्षेत्र में बाढ़ और बाढ़ की लंबे समय से चली आ रही समस्या को संबोधित करने के लिए गंभीर नहीं हैं ।
रेगमी का मानना है कि “हमारे पास लंबे वादे करने और कुछ नहीं करने की प्रवृत्ति है, भारत पहले सीमा पर संरचनाओं का निर्माण करता है और बाद में बातचीत करता है ।”
सीमा के नेपाली पक्ष में भी समस्याएँ मौजूद हैं । “जिस तरह से हम तराई में ढांचे का निर्माण कर रहे हैं, बिना किसी उचित योजना के, वह भी समस्याएँ पैदा कर रहा है, हमारी नदियाँ जब सीमा पर पहुँचती हैं, तब भारतीय सड़कों पर सड़क और बुनियादी ढाँचा समस्या पैदा करता है ।”

ऐसा नहीं है कि सीमा पर बाढ़ को दूर करने के लिए अतीत में उपाय नहीं किए गए हैं, लेकिन एक बार फिर जब तक नेपाल और भारत एक संयुक्त विस्तृत कार्य योजना के साथ आगे नहीं बढेंगे, तब तक बाढ़ सीमा के दोनों ओर कहर बरपाती रहेगी ।
हालांकि नेपाल और भारत में बाढ़, बाढ़ और तटबंध से निपटने के लिए पांच अलग–अलग तंत्र हैं, “जल संसाधन पर संयुक्त आयोग” ने पांच साल के अंतराल के बाद जनवरी में नई दिल्ली में अपनी बैठक आयोजित की । लेकिन अगर बैठक के निर्णय पर इस मुद्दे को गंभीरता से संबोधित करने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई ।
बैठक में “जल संसाधन पर संयुक्त आयोग ने भारत–नेपाल सीमा पर बाढ़ के मुद्दों को संबोधित करने के लिए बाढ़ और बाढ़ प्रबंधन उप–समूह पर संयुक्त समिति द्वारा किए गए संयुक्त निरीक्षण की सराहना की । यह आपसी परामर्श के साथ उप–समूह की सिफारिशों को लागू करने और आवधिक प्रवण क्षेत्रों की आवधिक संयुक्त निरीक्षण यात्राओं को जारी रखने का निर्णय लिया गया । दोनों पक्ष सीमा पर होने वाली बाढ़ को रोकने के लिए समयबद्ध तरीके से उचित उपाय करने पर सहमत हुए ।
२०११ में बाढ़ पूर्वानुमान गतिविधियों के लिए वास्तविक समय के हाइड्रो–मौसम संबंधी आंकड़ों को साझा करने पर भी दोनों पक्ष एक समझौते पर पहुंचे थे । एक टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट में बाढ़ पूर्वानुमान गतिविधियों के विस्तार और आधुनिकीकरण की सिफारिश की थी ।
पिछले साल जून और नवंबर में झापा से लेकर बांके जिलों तक के क्षेत्र के दौरे के बाद, नेपाली पक्ष ने विदेश मंत्रालय के माध्यम से फरवरी में भारतीय पक्ष के साथ एक तकनीकी रिपोर्ट साझा की थी । रिपोर्ट में मई में संयुक्त समिति पर बाढ़ और बाढ़ प्रबंधन पर चर्चा की गई थी ।
लेकिन  बहुत कम प्रगति हुई है क्योंकि भारतीय पक्ष ने बार–बार कहा है कि नेपाली पक्ष द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को लागू करने से पहले इसे बजट की मंजूरी और संरचनात्मक पुनः डिजाइन की आवश्यकता है ।
उस रिपोर्ट में, नेपाली पक्ष ने भारतीय पक्ष द्वारा एकमत से निर्मित संरचनाओं को नया स्वरूप देने की योजना का सुझाव दिया था जो सप्तरी, धनुशा, सिरहा, रौतहट और बांके जिलों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं ।
रिपोर्ट ने विशेष रूप से जलेश्वर में रातू खोले के तटबंधों की ओर इशारा किया और सुझाव दिया कि भारत बागमती नदी तक अपने तटबंधों का विस्तार करता है । भारत ने अभी तक अपनी तरफ से लालबकैया नदी में तटबंधों का निर्माण किया है । कमला नदी में, नेपाली पक्ष में एक समर्पित तटबंध बनाया गया है, जबकि भारत ने अभी तक तटबंध का निर्माण नहीं किया है ।
जल समस्या के समाधान के लिए, “जल संसाधन मंत्रालय के पूर्व सचिव अनूप उपाध्याय का मानना है कि,“ दोनों पक्षों के अधिकारियों और तकनीशियनों के बीच नियमित संवाद होना चाहिए। “हम बाढ़ और अत्यधिक पानी को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, हम केवल उन्हें विनियमित कर सकते हैं। हम सीमावर्ती नदियों पर तटबंध बनाने के लिए भारत से समर्थन की तलाश करते हैं। लेकिन नेपाली पक्ष सीमा के हमारी तरफ संरचनाओं को ध्वस्त करने के लिए भी तैयार है। इस तरह के विरोधाभास ने समस्या को हल करने में मदद नहीं की ।
दशकों से उच्च स्तरीय द्विपक्षीय यात्राओं के दौरान सीमावर्ती क्षेत्रों में तटबंधों का निर्माण और नदी प्रशिक्षण एजेंडे में उच्च रहा है ।

बार बार भारत सरकार पर यह आरोप लगता आया है कि सीमा क्षेत्र में उसके द्वारा अनाधिकृत रूप में बाँध बनाया जा रहा है, जिसकी वजह से नेपाल के सीमा क्षेत्र में बाढ़ आती है । अन्तर्राष्ट्रीय नियम जिसमें यह तय है कि सीमा क्षेत्र से ८ किलोमीटर के भीतर कोई भी राष्ट्र दूसरे देश को क्षति पहुँचाने वाली संरचना नहीं बना सकता । अगर भारत के द्वारा इस नियम का उल्लंघन किया जाता है तो नेपाल सरकार क्यों खामोश है ? भारत सरकार अगर अपनी जनता की सुरक्षा का खयाल रख रही है, तो हमारी सरकार क्या कर रही है ? वह इस अनाधिकृत संरचना का विरोध क्यों नहीं कर रही ? हाय तौबा उस वक्त मचाया जाता है जब पानी सर से ऊपर जाने लगता है, वक्त गुजरा और बात गई ठंडे बस्ते में । पर एक और सवाल है अगर भारत पर यह आरोप है कि उसने सीमा से चार किलोमीटर की दूरी पर बाँध बनाए हुए है जिसके कारण रौतहट की यह हालत हुई है, तो अगर भारत चार की बजाय आठ किलोमीटर पर बाँध बनाए तो क्या यह आफत नहीं आएगी ? स्वाभाविक सी बात है कि जल का बहाव क्या चार, क्या आठ किसी को सुनने वाला नहीं है । तो ऐसे में क्या दोनों देशों की सरकारों को मिलकर इस आपदा की समस्या का समाधान नही करना चाहिए ? नेपाल और भारत दो ऐसे राष्ट्र हैं जिनकी भौगालिक संरचना एक दूसरे पर निर्भर है, ऐसे में तनाव किसी भी बात का निराकरण नही हो सकता ।

Loading...

 
आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: