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राजनीतिक पार्टी या गुटबन्दी ? : बाबूराम पौड्याल

 

हिमालिनी अंक जुन २०१९ |राजनीति में पारदर्शिता और जिम्मेदारी का अभाव हो तो समझ लेना चाहिए कि देश बुरे दिन झेल रहा है । बार–बार होने वाले राजनीतिक बदलाव के बावजूद भी नेपाल की राजनीतिक पार्टियांँ पारदर्शिता और जिम्मेदारी की कसौटी में अभी भी खरी नहीं उतर पाई हैं । नेताओं की कथनी और करनी के बीच का फासला कहीं पटता नहीं दिखाई देता है । यही कारण है कि राजनीतिक पार्टी और नेताओं और उनके द्वारा संचालित सरकारों के प्रति आम जनता में अविश्वास पनप रहा दिखता है । फिलहाल तकरीबन सभी राजनीतिक पार्टियों  के अन्दर चल रही हैरतअंगेज उठापटक से उनकी काबीलियत पर भी सवाल खडे हो जाते हैं । लगता है पार्टियाँ स्थायी पार्टी से अधिक स्वार्थी गुटों के मोरचे हैं ।
देश में चल रही विकृतियों के लिए प्रमुख रूप से सरकार चलानेवाली और क्रान्ति और परिवर्तन के नाम पर अराजक बननेवाली राजनीतिक पार्टियाँ ही जिम्मेदार हैं । भ्रष्टाचार के संजाल में कहीं न कहीं इनकी व्यक्तिगत या संस्थागत संलग्नता दिखाई देती है ।

इसी कारण दलों और नेताओं पर लोगों का विश्वास उठ रहा है । लाभ के लिए की जानेवाली राजनीति के साये में गुटों की परवरिश होती चली आ रही है ।
सत्तारुढ नेपाल कम्यूनिष्ट पार्टी की बहुमतवाली सरकार सिंहदरबार की सत्ता पर काबिज है । उसपर जनता की दी हुई जिम्मेदारी की फिक्र से अधिक अन्दरुनी गुटों की खिचड़ी ज्यादा पकती दिखाई देने लगी है । इस पार्टी के दो अध्यक्ष केपी ओली और प्रचण्ड के बीच पार्टी एकीकरण से पहले बहुत बड़ा फासला था । यह फासला आज भी किसी न किसी रूप में बना हुआ दिखाई देता है ।

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वैसे प्रचण्ड का दावा है कि वे निरन्तता में क्रम भंग की नीति पर विश्वास करते हैं । वे यह कहते ही नहीं हैं करके भी दिखाते आये हैं । आज वे क्या हैं और किस के पक्ष में हैं उससे खास फर्क नहीं पड़ता है । वे कल और कुछ भी हो सकते हैं । उनके इस सिद्धांत से किस को कितना फायदा मिला है— यह अलग बात है । फिलहाल नेकपा में केपी ओली के उपर सिर पर लटकते तलवार के रूप में दिखाई देते हंै ।

अध्यक्ष प्रचण्ड ने सरकार का नेतृत्व कर रहे दूसरे अध्यक्ष तथा प्रधानमंत्री ओली नवनिर्वाचित भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत करने जब दिल्ली जा रहे थे तब पुराने सम्झौते की बात मीडिया में छेड दिया जिसके मुताबिक पाँच सालों में से आधे कार्यकाल सरकार का नेतृत्व उनको करना था । दोनों नेताओं के क्या आपसी सम्झौते हुये थे और उनको अमल में कैसे लाया जाये और न लाया जाये यह उनकी पार्टी का अन्दरुनी मसला था । परन्तु, प्रचण्ड ने इसे पार्टी के अन्दर आगे बढ़ाने की बजाय बाहर लाना ही उचित समझा । दूसरे नेता वामदेव गौतम ने प्रचण्ड के पक्ष में मोरचा संभाला तो ईश्वर पोखरेल ओली के पक्ष में खडे हो गये । प्रधानमंत्री ओली दिल्ली में रहते हुये इस बात को लेकर काफी दबाव में रहे । दिल्ली में भी इस मसले पर चर्चा  होना लाजिमी था । लगता है, नेकपा में गुटों की सरगर्मी तेज हो चली है । इस बात का यह एक मिसाल मात्र था । बताया जाता है — नेकपा में उपर के तकरीबन पाँच नेता अपने फिरके चला रहे हैं ।

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देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी नेपाली काँग्रेस के पास देश का एकलौता लोकतान्त्रिक होने और सभी राजनीतिक परिवर्तनों का नेतृत्व करने जैसे बड़े नाम तो हैं परन्तु दर्शन खोटे ही हैं । इस पार्टी के जीवन में न तो कहीं लोकतन्त्र का सामयिक अभ्यास होता है न ही कोई सैद्धांतिक कसरत । संसद में प्रमुख प्रतिपक्ष के रूप में रहते हुये भी उसको कस कर पकड़ने के लिए मुद्दे नहीं मिल रहे हैं । सरकार की ओर से कसते सिकंजे को प्रतिवाद करने के लिए वह तार्किक होने के बजाये कम्यूनिष्ट और अधिनायकवाद के ठण्डे बस्ते में डाल कर आँख मुंद लेता है । इस पार्टी की बद्हाली भी गुटों के कारण ही हुई है ।
लगता है, काँग्रेस स्वच्छ आन्तरिक राजनीतिक अभ्यास के बजाये गुटों के कारण ही जीवित है । उसमें इतनी अराजकता है कि कोई एक दूूसरे को दिल से नेता मानने को तैयार ही नहीं है । काँग्रेस ने जब जागरण अभियान को शुरु करने का ऐलान किया तब बहुतों को उम्मीद थी कि अभियान के जरिये जनता को पार्टी  में नेताओं के बीच मतभेद न होने का पुख्ता संदेश दिया जायेगा । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । जागरण को गुटों ने ही भरपूर उपयोग किया ।
मधेश का बडेÞ बैनर समाजवादी पार्टी में अध्यक्ष तथा वर्तमान उपप्रधानमंत्री उपेन्द्र यादव पूर्वप्रधानमंत्री डा. बाबुराम भट्टराई जातिवाद क्षेत्रवाद की राजनीति नई उहापोह में तब्दील हो रहा है । सरकार सदन और सड़क पर एकसाथ सक्रिय रहने का अनोखा प्रयोग भी इस उहापोह में शामिल है । ऐसे में गुटों का आकार लेना और उनमें टकराव के सतह में आने के आसार दिखाई दे रहे हैं ।
राजनीतिक दलों में पनपते गुटों की अराजकता दलों तक ही सीमित नहीं है । उसका बुरा असर समूचे देश पर पड़ रहा है । उससे निजात पाये बगैर देश की तरक्की असंभव है ।

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