Sat. Oct 19th, 2019

हरितालिका तीज एवं गणेश चतुर्थी का महामिलन का महासंयोग। कैसे करें पूजा !! : आचार्य राधाकान्त शास्त्री

हरतालिका-तीज

आचार्य राधाकान्त शास्त्री | बहुत वर्षों के बाद एक साथ एक ही दिन बन रहा है संपूर्ण शिव परिवार ( शिव पार्वती और गणेश ) का महापर्व। हरितालिका तीज एवं गणेश चतुर्थी का महामिलन का महासंयोग है। इस वर्ष तीज और चौथ का मिलन होने से  हरितालिका तीज एवं गणेश चतुर्थी 2 सितंबर सोमवार को एक ही दिन ही मनाया जाएगा, सुबह से अपने सुविधा के अनुसार हरितालिका तीज की कथा पूजन कर फिर श्री गणेश की स्थापना एवं जन्मोत्सव मनाया जाएगा । गणेश चतुर्थी पर भगवान श्री गणेश की स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक है एवं सायं 4 बजे से रात्रि 8 बजे तक गणेश स्थापना एवं पूजन का शुभ मुहूर्त है ।

गणेश चतुर्थी का व्रत भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष के दिन मनाई जाती है । गणेश चतुर्थी पर गणेश स्थापना के 11वें दिन गणेश विसर्जन किया जाता है ।  भगवान गणेश को विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है। गणेश जी बुद्धि के देवता भी है। भाद्र पद शुक्ल चतुर्थी इनके जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग गणेश प्रतिमा को बड़े ही धूमधाम से अपने घर लाते हैं और उनका पूजन करते हैं ।

गणेश चतुर्थी का शुभ मुहूर्त :- चतुर्थी तिथि प्रारंभ, 2 सितंबर को दिन में 9 बजकर 30 मिनट से और चतुर्थी तिथि समाप्त 3सितंबर को प्रातः 6 बजकर 50 मिनट पर। अतः गणेश की स्थापना का शुभ मुहूर्त 2 सितंबर सोमवार को सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक है और शाम 4 बजे से रात्रि 8 बजे तक है ।

गणेश चतुर्थी का महत्व :- गणेश जी को बुद्धि का देवता कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार जो भी व्यक्ति गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा करता है। उसे बुद्धि और धन के साथ -साथ रिद्धि और सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। गणेश जो विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है जो भी व्यक्ति गणेश जी की सच्चे मन से आराधना करता है,उस पर किसी भी प्रकार का विघ्न नहीं आता। इस पर्व को गणेशोत्सव के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन बड़ी ही धूमधाम से गणेश जी को घर लाया जाता है और उन्हें सजा कर घर में रखा जाता है। दस दिनों तक गणेश जी की पूजा – अर्चना की जाती है।

गणेश जी को मोदक और लड्डूओं का भोग लगाया जाता है और अपने मंगल की कामना की जाती है। दस दिनों के बाद गणेश जी की प्रतिमा का बड़े ही धूम धाम से विसर्जन कर दिया जाता है और उनसे प्रार्थना की जाती है कि जिस प्रकार वह इस साल उनके घर मे पधारे हैं उसी प्रकार अगले साल भी वह बड़ी धूमधाम से उनके घर में पधारें और उन्हें अपना आर्शीवाद दें।

गणेश चतुर्थी की पूजा विधि :-

1. गणेश चतुर्थी के दिन साधक को प्रातः स्नान करने के बाद सोने, तांबे, मिट्टी की गणेश प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।

2. पवित्र आसन अथवा  एक नए कलश की स्थापना कर उसके उपर वस्त्र बांधकर उसके ऊपर गणेश जी को विराजमान करें।

3. गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को सिंदूर व दूर्वा अर्पित करके 21 या 108 या 1000 लडडुओं का भोग लगाएं। इनमें से 4. लड्डू गणेश जी को अर्पित करके शेष लड्डू ग़रीबों या ब्राह्मणों को बाँट दें।

5. सांयकाल के समय गणेश जी का विशेष पूजन करना चाहिए। गणेश चतुर्थी की कथा, व स्तोत्र का का पाठ करें, तथा

इस दिन चंद्र दर्शन न करें।

6. इस दिन गणेश जी के सिद्धिविनायक रूप की पूजा व व्रत किया जाता है।

गणेश चतुर्थी पर निषिद्ध चन्द्र-दर्शन:- गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है।

पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के, नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है।

नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये।

श्री मद्भागवत के इस कथा के श्रवण मात्र से भी चन्द्र दर्शन के दोष दूर हो जाते हैं ।

मिथ्या दोष निवारण मन्त्र:- चतुर्थी तिथि के प्रारम्भ और अन्त समय के आधार पर चन्द्र-दर्शन लगातार दो दिनों के लिये वर्जित हो सकता है। धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार सम्पूर्ण चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र दर्शन निषेध होता है और इसी नियम के अनुसार, चतुर्थी तिथि के चन्द्रास्त के पूर्व समाप्त होने के बाद भी, चतुर्थी तिथि में उदय हुए चन्द्रमा के दर्शन चन्द्रास्त तक वर्ज्य होते हैं।

अगर भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जायें तो मिथ्या दोष से बचाव के लिये निम्नलिखित मन्त्र का जप करना चाहिये –

सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः।

सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥

संकष्टी चतुर्थी:- प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा अर्चना करने से आपके सभी संकट दूर हो जाते हैं और इसी वजह से इसे संकट हारा चतुर्थी भी कहते हैं। चूंकि यह चतुर्थी हर माह मनाई जाती है, इस वजह से भगवान गणेश के कई रूपों की पूजा होती है। शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। इसे संकट हारा, अंगारकी चतुर्थी और गणेश चतुर्थी आदि के नाम से भी जाना जाता है। यदि यह चतुर्थी कृष्ण पक्ष के मंगलवार को पड़ती है तो इसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। इस दिन गणेश के भक्त उपवास रखते हैं। भगवान गणेश को बल, बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है। यह अपने भक्तों के सभी विघ्न हर लेते हैं। इसलिए इन्हें विघ्नहर्ता भी कहा जाता है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा :- संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश का जन्मदिवस है और इस दिन को भारत के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न नामों धूमधाम से मनाया जाता है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत बहुत कठीन होता है। इस व्रत में केवल फलों का ही सेवन किया जा सकता है। इसके अलावा मूंगफली, साबूदाना आदि भी खाया जा सकता है। यह उपवास चंद्रमा को देखकर तोड़ा जाता है। इस दिन जब आप उपवास रखें तो भगवान गणेश की कथा जरूर सुनें। ऐसा करने से ही आपकी पूजा सफल होगी। इस उपवास को करने वाले व्यक्ति को सुबह नहा धोकर लाल रंग का कपड़ा पहनना चाहिए। पूजा के दौरान फल-फूल आदि चढ़ाएं और गणेश की अराधना करें। गणेश को मोदक का भोग जरूर लगाएं। पूरे विधि विधान से पूजा करने के बाद गणेश मंत्र ओम गणेशाय नमः का जाप करें। यह जाप आप 108 बार करें।

क्यो मनाते है संकष्टी चतुर्थी :- संकष्टी चतुर्थी मनाने के पीछे कई मान्यताएं हैं जिनमें से एक यह भी प्रचलित है कि एक दिन माता पार्वती और भगवान शिव नदी किनारे बैठे हुए थे। और अचानक ही माता पार्वती का मन चोपड़ खेलने का हुआ। लेकिन उस समय वहां पार्वती और शिव के अलावा और कोई तीसरा नहीं था, ऐसे में कोई तीसरा व्यक्ति चाहिए था जो हार-जीत का फैसला कर सके। इस वजह से दोनों ने एक मिट्टी मूर्ति बनाकर उसमें जान फूंक दी। और उसे शिव व पार्वती के बीच हार जीत का फैसला करने को कहा। चोपड़ के खेल में माता पार्वती विजयी हुईं। यह खेल लगातार चलता रहा जिसमें तीन से चार बार माता पार्वती जीतीं लेकिन एक बार बालक ने गलती से पार्वती को हारा हुआ और शिव को विजयी घोषित कर दिया। इस पर माता पार्वती क्रोधित हुईं। और उस बालक को लंगड़ा बना दिया। बच्चे ने अपनी गलती की माफी भी माता पार्वती से मांगी और कहा कि मुझसे गलती हो गई मुझे माफ कर दो। लेकिन माता पार्वती उस समय गुस्से में थीं और बालक की एक ना सुनी। और माता पार्वती ने कहा कि श्राप अब वापस नहीं लिया जा सकता। लेकिन एक उपाय है जो तुम्हें इससे मुक्ति दिला सकता है। और कहा कि इस जगह पर संकष्टी के दिन कुछ कन्याएं पूजा करने आती हैं। तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और उस व्रत को करना। बालक ने वैसा ही किया जैसा माता पार्वती ने कहा था। बालक की पूजा से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और बालक की मनोकामाना पूरी करते हैं। इस कथा से यह मालूम होत है कि गणेश की पूजा और श्री गणेश अथर्वशीर्ष का नियमित पाठ या पुरश्चरण प्रयोग यदि पूरी श्रद्धा से की जाए तो सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ।।

श्री गणपति अथर्वशीर्ष।। 

ॐ नमस्ते गणपतये।

त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि 

त्वमेव केवलं कर्ताऽसि 

त्वमेव केवलं धर्ताऽसि 

त्वमेव केवलं हर्ताऽसि 

त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि 

त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।। 

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।। 

अव त्व मां। अव वक्तारं। 

अव श्रोतारं। अव दातारं। 

अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं। 

अव पश्चातात। अव पुरस्तात। 

अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्। 

अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।। 

सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात्।।3।। 

त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:। 

त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:। 

त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि। 

त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। 

त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि।।4।। 

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। 

सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति। 

सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति। 

सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। 

त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:। 

त्वं चत्वारिवाक्पदानि।।5।। 

त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:। 

त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:। 

त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं। 

त्वं शक्तित्रयात्मक:। 

त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं। 

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं 

रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं 

वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं 

ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।। 

गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं। 

अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं। 

तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं। 

गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं। 

अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं। 

नाद: संधानं। सं हितासंधि: 

सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि: 

निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता। 

ॐ गं गणपतये नम:।।7।। 

एकदंताय विद्‍महे। 

वक्रतुण्डाय धीमहि। 

तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।। 

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्। 

रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्। 

रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्। 

रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।। 

भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्। 

आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्। 

एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।। 

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये। 

नम: प्रमथपतये। 

नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय। 

विघ्ननाशिने शिवसुताय। 

श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।

इस मंत्र का प्रतिदिन पाठ करना समस्त दोषों के निवारण का सचुक प्रयोग होता है, श्री गणपति सदैव आपके साथ रहें।

 आचार्य राधाकान्त शास्त्री,

आचार्य राधाकान्त शास्त्री

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