चट्टानों से टकरा लौट जाती लहरे : आलोक कुमार

स्मृति
चट्टानो से आती प्रतिध्वनियों में
तेरी स्मृति के गूंजते शब्द अब तक
कुÞछ पलो का स्नेह, स्पर्श की वो सिहरन
बैचन कर जाती है अब तक,
मन में उठते उन पलो के ज्वार भाटा,
यहां मौन बैठूं कब तक ?
हटाते रहेंगे सूखे आंसुओं की परते कब तक ?
सहेजे वो पीली पड़ी तस्वीरें कब तक ?
ना हो पाए निर्णय हमारे कठोर चट्टानों से
क्यूँ बढ़ गये तुम प्रगति पथ पर ?
जान ना पाया मै अब तक,
चट्टानों से टकरा लौट जाती लहरे
देखूँ कब तक ?
देखूँ कब तक ?
himalini, अंक जुलाई, २०१९ |


