Mon. Dec 9th, 2019

विशेषाधिकार का अंत : चन्दा चौधरी

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हिमालिनी  अंक अगस्त , अगस्त 2019 |अगस्त १५ को भारत अपनी ७३वीँ स्वतन्त्रता दिवस मनाने से पहले भारत के जम्मु कश्मीर को दिया गया विशेषाधिकार जो पिछले सात दशक से चर्चा का विषय बना हुवा था उसे भारत सरकार ने पाँच अगस्त को एक नया मोड़ दे दिया है ।

जम्मु काश्मीर भारत का एक मात्र ऐसा राज्य था जहाँ पर भारत राष्ट्रीय झण्डा के साथ अपना खुद का झण्डा भी लहराया जाता था । इतना ही नहीं उनका अपना ही संविधान था । अपने ही झण्डा और संविधान के आधार पर राज्य संचालन किया जाता था । सत्तर वर्ष पहले एक स्वतन्त्र देश ही था । अभी जम्मु कश्मीर के विभिन्न भाग में भारत, पाकिस्तान और चीन का वर्चस्व कायम है । कुछ ऐसे भी कश्मीरी हैं जो स्वतन्त्र देश की कल्पना कर रहे हैं ।

अगस्त पाँच तारीख के दिन भारत के राज्यसभा में विपक्षी सांसदो के विरोध के बाबजूद भारत सरकार ने जम्मु काश्मीर को विशेष मान्यता देते हुए संविधान के धारा ३७० को खारिज कर दिया है । साथ ही जम्मु काश्मीर राज्य के हैसियत से बाहर कर केन्द्र प्रशासित दो हिस्सों में बाँट दिया गया है । बौद्ध धर्मावलम्बी बहुसंख्यक रहे लद्दाख में विधान सभा नहीं होगा वैसे ही केन्द्रशासित जम्मु काश्मीर का अपना ही संसद रहेगा । इन दोनो क्षेत्रों में अब गभर्नर के जगह लेफ्टिनेन्ट गभर्नर रहने की व्यवस्था की गयी है ।

जम्मु कश्मीर दशकों से भारत का विवादित मुद्दा रहा है । कहा जाता था कि यह भारत के लिए एक समाधानहीन समस्या है । पाँच अगस्त को लिए गए भारत सरकार के फैसले ने भारतीय राजनीति को फिर से एक बार तरंगित कर दिया है । सिर्फ भारत ही नहीं अपितु पूरी दुनिया की निगाह अभी भारत पर है । और यह स्वाभाविक भी है । भारत सरकार ने जो फैसला लिया है वह आने वाले दिन मे देश में स्थिरता लाने मे मदद करेगी या देश अस्थिर अवस्था से गुजरेगा यह भविष्य की बात है ।

परंतु एक ही देश में जिस तरह जम्मु काश्मीर को अनावश्यक अधिकार प्राप्त था वह अपने आप मे खेदजनक था । धारा ३७० हटाने से पहले जम्मु काश्मीर का राजनीतिक अवस्था पर अगर हम एक नजर डाले तो स्पष्ट हो जाएगा कि एक अखण्ड देश में यह प्रावधान कितना शोभनीय था । पहले विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था, दोहरी नागरिकता, राज्य का अपना ध्वज और अपना अलग संबिधान, आपतकालीन अनुच्छेद २५६ जम्मु काश्मीर में लगाना सम्भव नहीं था । वैसे ही विधान सभा का कार्यकाल ६ साल, घाँटी बाहर के लोग वहाँ न जमीन खरीद सकते थे ना ही नौकरी कर सकते थे । दूसरे राज्य के लोग वहाँ से चुनाव नहीं लड़ सकते थे । आरटिआइ, सिएजीलागु नहीं हो सकता था ना ही तिरंगा को अपमानित करने वालों को कोई सजा । क्या यह प्राबधान किसी दूसरे राज्यों को प्राप्त हुवा था ? नहीं । काश्मीर को विशेष परिस्थिति प्रदान करने का एतिहासिक कारण था । अंगे्रज उपनिवेश से स्वतन्त्र होने के बाद भारत पाकिस्तान अलग हुआ था । हिन्दु दबदबा वाले क्षेत्र भारत में और मुस्लिम बहुल क्षेत्र पाकिस्तान मे विलय हुआ था ।

पाकिस्तान को यह उम्मीद थी कि मुसलिम बहुल कश्मीर उसके हिस्से में आएगा । परंतु तत्कालीन जम्मु काश्मीर का राजा हिन्दु होने के कारण भारत को यह लगा था कि वह प्रान्त भारत की ओर रहेगा । परंतु लम्बे समय तक जम्मु काश्मीर का रुख किसी की ओर ढलकते नही दिखा । पाकिस्तान को भी यह लगा था कि जम्मु काश्मीर के राजा हरी सिंह हिन्दु होने के कारण भारत की ओर न आगे बढ जाए उसी डर के कारण पकिस्तान ने अघोषित जम्मु काश्मीर पर आक्रमण कराना शुरु किया । पाकिस्तान से लड़ने के लिए राजा हरी सिंह ने भारत से सहयोग मांगा था । भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरु ने हरी सिंह को सहयोग करने से पहले उनके सामने कुछ ंंशर्त रखी थी । अहम शर्त थी सहयोग पश्चात जम्मु काश्मीर को भारत मे विलय करना । और हरी सिंह ने हरी झण्डी दिखाया था । ंपरंतु भारत में विलय होने पर कुछ शर्तें राजा हरी सिंह ने भी रखी थी नेहरु के सामने ।

भारतीय सेना जब जम्मु काश्मीर गयी तो पाकिस्तान ने अपनी सेना भी भेजी । भारत और पाकिस्तान के बीच भीषण युद्ध हुवा । युद्ध के दौरान ही नेहरु काश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ मे ले गए थे, सन १९४८ में । संघ के द्वारा पाकिस्तान को अपना घुसपैठियो को वापस और भारत को अपनी सेना संख्या काश्मीर में कम करने का निर्णय सुनाया गया । स्थिति समान्य होने के बाद काश्मीर भारत या पाकिस्तान में विलय होगा या स्वतन्त्र देश के हैसियत में रहेगा इस विषय का निर्णय जनमत संग्रह से लेने का प्रस्ताव किया गया । भारत और पाकिस्तान दोनो जनमत संग्रह के मुद्दा पर अपना सहमति दर्ज कराया था । भारत और पाकिस्तान बीच युद्ध विराम होने के बाद अपने सैन्य कब्जा में रहे भूभाग को अपने अपने पास रखा । दूसरों के कब्जे में रहे भाग को भी अपना होने का दाबी करता रहा । पाँच अगस्त को हटाया गया विशेष संबैधानिक व्यवस्था की शुरुवात दरअसल ब्रिटिस राज के वक्त ही सन् १९२७ मे शुरु हो चुका था । उसी वक्त पंजाब और हरियाणा से अधिक संख्या में लोग माइग्रेट हो कर जम्मु काश्मीर न आ जाए इसलिए राजा हरी सिंह घाटी बाहर के लोग घाटी में सम्पत्ति नहीं रख सकता है इससे सम्बन्धित कानून बनाया था ।

काश्मीर के विषय में लिया गया निर्णय भारत सरकार का अपना आन्तरिक मामला है । किसी भी देश की सरकार कोई भी कदम चलती है तो देश हित को केन्द्र मे रख कर ही चलती है । जम्मु काश्मीर के विषय मे इतना कहा जा सकता है कि धारा ३७० के तहत दिया गया विशेषाधिकार के कारण अखण्ड भारत के भीतर एक अलग ही देश है ऐसा प्रतीत हो रहा था । जो की किसी भी स्वतन्त्र देश को कुरुपता प्रदान करने के लिए काफी था । कहा जाता है कि अगर नेतृत्व सबल हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं होता । शायद भारत को मिले कुशल नेतृत्व का ही नतीजा है आज भारत जनहित और देशहितकारी निर्णय लेने मे समर्थ होता दिख रहा है । यह विश्वास किया जा सकता है कि चल रहे जम्मु काश्मीर का मुद्दा का सर्वमान्य अवतरण होगा ।
(प्रतिनिधी सभा सदस्य, राष्ट्रिय जनता पार्टी नेपाल)

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