Wed. Nov 6th, 2019

मैं और तू स्मृति की आकाश गंगा में बहती कोई अछोह नदी : संजय सिंह

संवेदना‌ओं की भूमि पर जन्म लेती हैं संजय सिंह की कविताएँ जहाँ एक बैचेनी निरन्तर साथ साथ चलती है । प्रस्तुत है संजय सिंह की कुछ कविताएँ ।

मैं और तू!

यह समय,यह सृष्टि और यह ब्रहमाण्ड
केवल मुझसे और तुम से!
अनादिकाल से चराचर जगत में!
अनंत रूपों में अनंत सखा-सहचर
नीले आसमान में उडान भरती चिडिया
पेड पर छितराए अनंत फूल
हवा, पानी और धूप!
सब में मैं और तू!
रेत पर उजडते-बनते घरौंदे
तिनके का घर
कच्ची-पक्की दीवार
सपनों के इन्द्रजाल में सात-रंग
मैं और तू!
मैं और तू स्मृति की आकाश गंगा में बहती
कोई अछोह नदी !

 

नदी में शैवाल की तरह

यूँ तो नदी में बहुत से जलीय जीव
सखा सहचर अनंत जन्मों के
पर तुम्हारी जिन्दगी में
शैवाल की तरह हूँ मैं!
बहूँगा तुम्हारी स्मृति में
जैसे नदी के रन्ध्र में बहता है वह!
कुछ चीजों को कोई कैसे अलग कर देगा?
जैसे नदी से मछली को
फल से रस को
फूल से खुशबू को
याद से प्रेम को
और मुझसे तुमको?
कोई कर भी दे अपनी जिद्द से
तब क्या यह दुनिया रहेगी?
आकाश में चाँद,तारे और सूरज
देह में दूध और लहू
आँखों में स्वप्न
और उम्मीदों में भोर
हम और तुम संपूर्ण ब्रह्माण्ड में!
कोई कैसे अलग कर देगा?
तब यह दुनिया रहेगी?

काबा-ए-दिल का सफ़र

हवा उम्मीद लेकर आयी
फूल और तितली
खुशबू और रंग लेकर
मगर तुम नहीं आए।

चंद्र किरणों से सजी रात सो गयी
सितारे जलकर बुझ गए
मगर तुम नहीं आए।

पंतंग कटकर गिर गयी आसमान से
पक्षी तक थक गए अपनी उड़ान से
कोई सदा आती रही ढलान से
मगर तुम नहीं आए।

नदियों का पानी उतर गया
नाव किनारे की कील से बँध गयी
मगर तुम नहीं आए।

हर चीज बुलाने से
लौट आयी
रूप
,रस
गंध
एक-एक साँस में
एक-एक पोर में
हृदय के अलक्षित कोर में
मगर तुम नहीं आए।

तलवारों के बल पर
दुनिया को जीतने वाले
राज्य-सत्ता के लौलुप
अश्वारोही तक लौट आए
रक्त की नदी में नहा कर
अपने दिग्विजय अभियान से
मगर तुम नहीं आए।
….
अब कहने को क्या रहा जो कहा जाए
वक्त ने किसी के प्यार को इस तरह कत्ल किया
कि आँसू भी कसक कर जज्ब हो गए दिल में…
बन्द आँखों की पुतली में
स्वप्न की बिखरी हुई दुनिया की सबसे हसीन रंगोली…
रहने दो।

एक गुज़ारिश है
भोर के सन्नाटे में
सोयी हुई हसरतों को
मत जगाओ
सोने दो।

आँसू और पीडा में लिथड़े
पथ पर झड़ कर गिरे हरसिंगार के सफेद फूल,
और उनकी रक्ताभ डंटियाँ,
शबनम की बून्दों से
भीगी धरती…
सूखने दो,
भला जागकर
टूटे मन से
कौन देखेगा इन्हें!
आँखों में रिस आए लहू की लाली
कुछ पल में
छिटक जाएगी पूरब के क्षितिज पर…
धीरे-धीरे दिन की जलती धूप में
दर्द के सारे स्याह सुबूत
खुद-ब-खुद मिट जाएँगे!

मैं यह नहीं चाहता
कि उदास यादों के सफ़र
और मिरासी बाजों के शोर से
खत्म हो जाए मुहब्बत की अनमोल दुनिया
हमेशा हमेशा के लिए टूट जाए दिलवालों का जुनून
कि फिर किसी की आह से
कोई धुआँ उठे ही नहीं …
बल्कि मेरी ख्वाहिश है
हर लम्हा नए दर्द की
नई रानाइयों से
चमकता रहे
काबा-ए-दिल का
सफर…

संजय कुमार सिंह
प्रिसिपल, आर.डी.एस. काॅलेज
सालमारी, कटिहार!

 

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