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बजेट में सिलिकॉन वैली का सपना लेकिन लोकतंत्र पर खतरा : संतोष मेहता

 

संतोष मेहता, काठमांडू, 12 जून। नेपाल के आर्थिक इतिहास में वित्त वर्ष २०८३/८४ का बजट केवल एक वार्षिक आय-व्यय का पारंपरिक लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक दिशा को आमूल-चूल बदलने का एक आक्रामक और महत्त्वाकांक्षी नीतिगत घोषणापत्र है। युवा शक्ति के उभार, राजनीतिक पुस्तांतरण और शासन के चरित्र व अर्थशास्त्र के स्वरूप को बदलने के जनमत पर टिकी वर्तमान सरकार ने इस बजट के माध्यम से नेपाल को वैश्विक डिजिटल मानचित्र पर स्थापित करने का एक चमकीला खाका खींचा है। सूचना प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में अभूतपूर्व निवेश की घोषणा करके सरकार ने नेपाल में ‘सिलिकॉन वैली’ जैसी तकनीकी क्रांति का सपना बोया है।

परंतु, इस चमकते हुए तकनीकी स्वप्न के पीछे छिपे राजनीतिक-आर्थिक दर्शन का यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो एक चिंताजनक तस्वीर उभरती है। यह बजट विकास के नाम पर ‘टेक्नोक्रेसी’ (विशेषज्ञों या प्रविधिज्ञों का शासन) और ‘प्लूटोक्रेसी’ (धनिकतंत्र या पूंजीपतियों का शासन) के एक ऐसे अनूठे गठजोड़ को बढ़ावा दे रहा है, जो अंततः नेपाल के संविधान द्वारा परिकल्पित ‘समाजवाद-उन्मुख’ लोकतंत्र के मूल ढांचे और सामाजिक न्याय को ओझेल में डालता है।

१. ‘सिलिकॉन वैली’ का सम्मोहन और डिजिटल नवउदारवाद

बजट वक्तव्य में स्यूचाटार में देश के पहले ‘सॉवरेन एआई कंप्यूट केंद्र’ की स्थापना करने, हजारों एआई प्रोसेसिंग यूनिट्स खरीदने, स्टार्टअप्स को भारी रियायतें देने और नेपाल टेलीकॉम के शेयरों को जनस्तर पर बेचकर उस राशि से ‘टेक हब’ निर्माण करने जैसे अप्रत्याशित कार्यक्रम शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि नेपाल की प्रचुर जलविद्युत क्षमता का उपयोग एआई डेटा सेंटरों को चलाने में करके देश को डिजिटल निर्यात का केंद्र बनाया जा सकता है।

प्रसिद्ध अमेरिकी समाजशास्त्री इवगेनी मोरोजोभ ने इस प्रवृत्ति को “टेक्नोलॉजिकल सॉल्यूशनिज्म” यानी ‘तकनीकी समाधानवाद’ कहा है। इस सिद्धांत के अनुसार, जब राज्य यह मानने लगता है कि समाज की गहरी ढांचागत, राजनीतिक, सामाजिक और वर्गीय समस्याओं का हल केवल ‘तकनीक, कोड और एल्गोरिदम’ के माध्यम से किया जा सकता है, तो वह एक गंभीर भ्रम का शिकार हो जाता है।

नेपाल की ज़मीनी हकीकत आज भी कृषि संकट, ग्रामीण बेरोजगारी और बुनियादी स्वास्थ्य-शिक्षा के अभाव से जूझ रही है। ऐसे में बजट द्वारा ‘डिजिटल निर्यात’ को मुख्य आर्थिक चालक बताना ज़मीन से कटे होने का प्रमाण है। वैश्विक अनुभव (जैसे भारत का बेंगलुरु या केन्या का नैरोबी, जिसे ‘सिलिकॉन सवाना’ कहा जाता है) गवाह हैं कि तकनीक-केंद्रित विकास मॉडल पूरे देश को समृद्ध नहीं बनाता। इसके विपरीत, यह एक छोटा सा संभ्रांत वर्ग पैदा करता है, जो वैश्विक बाजारों से तो जुड़ जाता है, लेकिन अपने ही देश के गरीब ग्रामीण परिवेश से पूरी तरह कट जाता है। यह ‘डिजिटल नवउदारवाद’ का एक ऐसा रूप है, जो असमानता की खाई को और चौड़ा करता है।

२. टेक्नोक्रेसी का उदय और डेमोक्रेसी का संकुचन

इस बजट की एक बड़ी विशेषता है; मंत्रालयों और विभागों का बड़े पैमाने पर विलय या उन्हें खारिज करना (३१ निकायों की खारेजी और ६ का विलय) और खरीद प्रक्रियाओं को “मिशन मोड” में चलाना। नीतिगत निर्णयों, कर की दरों में व्यापक हेरफेर और संस्थागत सुधारों की पूरी रूपरेखा पर ध्यान दें, तो यह स्पष्ट होता है कि इस बजट को राजनीतिक संवाद या जन-प्रतिनिधियों के सुझावों के बजाय ‘तकनीकी विशेषज्ञों’ और कॉरपोरेट सलाहकारों द्वारा निर्देशित किया गया है।

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जर्मन दार्शनिक और समाजशास्त्री जुर्गेन हेबरमास ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक वैधता का संकट में लिखा है कि जब राजनीतिक और सामाजिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को केवल ‘दक्षता’, ‘लागत में कमी’ और ‘तार्किक प्रबंधन’ के प्राविधिक कसौटी पर कसा जाने लगता है, तो वहां लोकतंत्र सिकुड़ जाता है। इसे राजनीति का ‘तकनीकीकरण’ कहा जाता है।

जब देश की नीतियां जनभावनाओं और संसद के नियंत्रण से परे जाकर केवल ‘विशेषज्ञता के अहंकार’ से संचालित होने लगती हैं, तो आम नागरिक का राज्य पर से भरोसा उठने लगता है। विदेशी निवेश को ‘स्वचालित स्वीकृति’ देना, कंपनी कानूनों में कॉरपोरेट-अनुकूल संशोधन करना और हेजिंग सेवाओं को लागू करना; ये सभी कदम वैश्विक कॉरपोरेट जगत को लुभाने के लिए तो ठीक हो सकते हैं, लेकिन इनमें नेपाल के सीमांत नागरिकों और स्थानीय श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा का कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है। यह शासन में लोकतंत्र के स्थान पर टेक्नोक्रेसी के संस्थागत कब्जे का संकेत है।

३. प्लूटोक्रेसी का खेल: मध्यमवर्गीय लोकप्रियतावाद और अमीरों को कर-छूट

बजट में कर प्रणाली में जो बदलाव किए गए हैं, वे ऊपर से देखने पर मध्यम वर्ग को राहत देने वाले और बहुत आकर्षक लगते हैं। उदाहरण के लिए: व्यक्तियों के लिए आयकर छूट की सीमा को दोगुना करके १० लाख करना, व्यक्तिगत आयकर की अधिकतम दर को १० प्रतिशत अंकों से घटाना, ३६० वस्तुओं पर लगने वाले उत्पाद शुल्क को समाप्त करना, सूचीबद्ध कंपनियों के धितोपत्र की बिक्री पर लगने वाले पूंजीगत लाभ कर को अंतिम कर बनाना, विदेशी निवेशकों के लिए अपार्टमेंट दीर्घकालीन लीज पर लेने की (२५% तक) कानूनी लचकता प्रदान करना।

फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेट्टी ने अपने ऐतिहासिक शोध क्यापिटल इन दी ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी में यह सिद्ध किया है कि जब भी सरकारें श्रम से होने वाली आय पर कर का बोझ बढ़ाती हैं, लेकिन पूंजी और कॉरपोरेट मुनाफे पर करों को घटाती हैं, तो समाज में आर्थिक असमानता विस्फोटक रूप ले लेती है।

आयकर की उच्च दर को १०% घटाना और पूंजीगत लाभ कर को रियायती व अंतिम बनाना सीधे तौर पर नेपाल के मुट्ठी भर बड़े उद्योगपतियों, रियल एस्टेट घरानों और शेयर बाजार के बड़े खिलाड़ियों को अरबों रुपये का सीधा फायदा पहुंचाना है। मध्यम वर्ग को १० लाख की छूट का लालच देकर पर्दे के पीछे से धनिकों को जो अकूत कर-राहत दी गई है, वह लोकतान्त्रिक कल्याणकारी राज्य की भावना के विपरीत है। हरित कर के नाम पर विभिन्न करों को एकीकृत करने के बहाने भी बड़े उद्योगों को अप्रत्यक्ष लाभ दिया गया है, जबकि आम जनता पर मूल्य वर्धित कर का बोझ और उसकी वसूली को स्वचालित लॉटरी प्रणाली के जरिए और सख्त बनाया जा रहा है। यह शुद्ध रूप से धनिकतंत्र को पोषित करने वाली वित्तीय नीति है।

४. ‘नेबरहुड फर्स्ट’ बनाम ‘डिजिटल आइसोलेशन’: भू-राजनीतिक दरार का असर

बजट में नेपाल को एक स्वतंत्र डिजिटल हब बनाने की जो कल्पना की गई है, वह क्षेत्रीय भू-राजनीति की संवेदनशीलता की अनदेखी करती है। नेपाल की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक, भौगोलिक और व्यापारिक रूप से भारत के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। हाल के वर्षों में भारत के साथ संबंधों में आए उतार-चढ़ाव और द्विपक्षीय विमर्शों में नीतिगत स्पष्टता के अभाव का असर नेपाल की इस नई बजटीय दिशा पर पड़ना तय है।

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नेपाल जिस ‘डिजिटल निर्यात’ और ‘आईटी और एआई डेटा सेंटर’ का सपना देख रहा है, उसके लिए इंटरनेट बैंडविड्थ और अंतरराष्ट्रीय फाइबर कनेक्टिविटी का मुख्य पारगमन मार्ग भारत ही है। यदि पड़ोसियों के साथ कूटनीतिक संबंधों में सुदृढ़ता और रणनीतिक विश्वास नहीं रहता है, तो नेपाल की डिजिटल अर्थव्यवस्था की ‘लाइफलाइन’ हमेशा भू-राजनीतिक जोखिम के साए में रहेगी। बजट ने भारत के साथ ऊर्जा व्यापार को एआई डेटा सेंटर से जोड़ने की बात तो की है, लेकिन दक्षिण एशियाई बाजार के भू-राजनीतिक यथार्थ को नजरअंदाज कर दिया है। भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति का लाभ उठाने के लिए मजबूत कूटनीति के बजाय, केवल तकनीकी घोषणाओं के सहारे आगे बढ़ना नेपाल को एक आर्थिक द्वीप में बदल सकता है, जो वैश्विक बाजार से जुड़ने के लिए पूरी तरह पड़ोसी पर निर्भर है।

५. एफडीआई की मृगतृष्णा: कानून की उदारता बनाम धरातल का डर

बजट ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को आकर्षित करने के लिए स्वचालित मार्ग और पूर्व-स्वीकृति खारेजी जैसे साहसिक कदमों की घोषणा की है। यह नवउदारवादी अर्थशास्त्र के उस ढर्रे पर आधारित है जो मानता है कि ‘कानून लचीला कर दो, निवेश खुद-ब-खुद आ जाएगा’।

अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए केवल कानूनी सरलीकरण पर्याप्त नहीं होता; वे किसी भी देश में राजनीतिक स्थिरता, पूर्वानुमान योग्य कर नीति, सॉवरेन रिस्क और विवाद समाधान की निष्पक्ष व्यवस्था देखते हैं। बजट में कर की दरों को जिस तरह अचानक बड़े पैमाने पर बदला गया है, वह भविष्य में नीतिगत अस्थिरता के डर को भी जन्म देता है। जब तक नेपाल की आंतरिक राजनीति में ‘प्लूटोक्रेटिक’ तत्वों (सीमित व्यापारिक घरानों) का नीति-निर्माण पर परोक्ष कब्जा रहेगा, तब तक वास्तविक और बड़े विदेशी निवेशक खुद को असुरक्षित महसूस करेंगे। यह बजट विदेशी पूंजी को आमंत्रित तो करता है, लेकिन उसे सुरक्षित महसूस कराने के लिए आवश्यक ‘रूल ऑफ लॉ’ के बजाय ‘रूल ऑफ टेक्नोक्रैट्स’ को बढ़ावा देता है, जिससे एफडीआई का आना केवल एक मृगतृष्णा बनकर रह सकता है।

६. स्रोत व्यवस्थापन का संकट और वित्तीय जोखिम

बजट का कुल आकार रू. २१२४ अरब ३४ करोड़ प्रस्तावित है, जो पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान से २५.२ प्रतिशत अधिक है। लेकिन इस भारी-भरकम खर्च को पूरा करने के लिए जो राजस्व और ऋण का ढांचा तैयार किया गया है, वह आर्थिक सिद्धांतों की कसौटी पर अत्यंत जोखिम भरा है: कुल खर्च: रू. २१२४ अरब ३४ करोड़, राजस्व परिचालन: रू. १४०५ अरब ३१ करोड़, वैदेशिक अनुदान: रू. ६१ अरब ७४ करोड़, कुल बजट घाटा (न्यून): रू. ६५७ अरब २9 करोड़। इस विशालकाय बजटीय घाटे को पाटने के लिए सरकार ने रू. २४७ अरब का विदेशी ऋण और रू. ४१० अरब का आंतरिक ऋण लेने की घोषणा की है।

ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स के मंदी के समय घाटे के बजट के सिद्धांत का यहां गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। कीन्स का मानना था कि सरकार को ऋण लेकर उत्पादक क्षेत्रों में निवेश करना चाहिए ताकि रोजगार पैदा हो। लेकिन नेपाल जैसे देश में, जहां करों की दरें घटाई जा रही हैं और राजस्व का आधार सीमित है, वहां रू. ४१० अरब का भारी-भरकम आंतरिक ऋण उठाना निजी क्षेत्र के लिए घातक साबित होगा। अर्थशास्त्र में इसे ‘क्राउडिंग आउट इफेक्ट’ कहते हैं। जब सरकार ही बैंकिंग बाजार का सारा पैसा ऋण के रूप में उठा लेगी, तो निजी बैंकों के पास आम उद्यमियों, कृषि और उद्योगों को देने के लिए पूंजी नहीं बचेगी, जिससे ब्याज दरें बढ़ेंगी और आंतरिक आर्थिक मंदी और गहरी होगी।

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एक तरफ बजट में विदेशी मुद्रा भंडार को ‘सॉवरेन वेल्थ फंड’ के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निवेश करने की बात की जा रही है, और दूसरी तरफ देश के घाटे को भरने के लिए भारी मात्रा में विदेशी और घरेलू कर्ज लिया जा रहा है। यह वित्तीय नीति का एक गंभीर ढांचागत विरोधाभास है।

७. क्या हम इतिहास से सीख रहे हैं?

नेपाल का यह बजट जिन नीतियों पर चल रहा है, उनके परिणाम दुनिया के अन्य देशों में देखे जा चुके हैं:

श्रीलंका का उदाहरण (टैक्स कटौती और ऋण का जाल): श्रीलंका ने २०१९ में लोकप्रिय होने के लिए करों में भारी कटौती की थी (जैसा नेपाल ने व्यक्तिगत आयकर और उत्पाद शुल्क में किया है)। परिणाम स्वरूप राजस्व गिर गया, ऋण का बोझ बढ़ गया और देश गंभीर आर्थिक संकट की ओर चला गया। नेपाल द्वारा आक्रामक रूप से आंतरिक ऋण उठाना इसी ‘श्रीलंकन सिंड्रोम’ की आहट है।

नाइजीरिया और केन्या (डिजिटल असमानता): केन्या ने ‘सिलिकॉन सवाना’ के नाम पर भारी निवेश किया, लेकिन इसका लाभ केवल नैरोबी के एक छोटे से हिस्से को मिला। ग्रामीण इलाकों में गरीबी और बेरोजगारी और बढ़ गई, क्योंकि सरकार ने कृषि और बुनियादी सामाजिक सुरक्षा से ध्यान हटाकर केवल ‘टेक’ पर केंद्रित कर दिया था। नेपाल का बजट भी इसी ‘शहरी-केंद्रित तकनीकी विकास’ की ओर झुकता दिख रहा है।

लाओस (ऋण और बुनियादी ढांचा): लाओस ने अपनी जलविद्युत क्षमता को बेचने के लिए भारी विदेशी कर्ज लिया, लेकिन सही कूटनीतिक प्रबंधन और पड़ोसी देशों के साथ जटिल संबंधों के कारण वह आज ‘डेब्ट डिस्ट्रेस’ (कर्ज के संकट) में है। नेपाल का बजट घाटा और ऋण की अत्यधिक निर्भरता उसे इसी खतरनाक रास्ते पर धकेल रही है।

निष्कर्ष: डेमोक्रेसी बचाने की चुनौती

आर्थिक वर्ष २०८३/८४ का बजट निस्संदेह आधुनिक शब्दावलियों, तकनीक के आकर्षण और प्रगतिशील नारों से सुसज्जित एक बेहद महत्वाकांक्षी दस्तावेज है। यह नेपाल को एक आधुनिक ‘टेक-नेशन’ बनाने का एक सुंदर सपना दिखाता है। परंतु इस सपने की बुनियाद बेहद कमजोर और असमानता पर टिकी है।

यह बजट ‘डिजिटल नवउदारवाद’ के रथ पर सवार होकर टेक्नोक्रेसी और प्लूटोक्रेसी के एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से समावेशी लोकतंत्र का रास्ता ओझेल हो जाता है। नेपाल जैसे देश को आज केवल ‘सिलिकॉन वैली’ के तकनीकी समाधानों की नहीं, बल्कि ‘समतामूलक समाज’ के व्यावहारिक धरातल, मजबूत कूटनीतिक संबंधों (विशेषकर भारत के साथ व्यापारिक सुगमता) और जमीनी प्रत्यक्ष निवेश की आवश्यकता है। यदि इस बजटीय दिशा को समय रहते सुधारा नहीं गया, यदि करों के ढांचे को न्यायसंगत नहीं बनाया गया और यदि कर्ज के इस जाल को नहीं रोका गया, तो नेपाल का लोकतंत्र पूंजीपतियों और तकनीकी विशेषज्ञों के हाथों का खिलौना बनकर रह जाएगा, और आम जनता केवल इस डिजिटल क्रांति की मूक दर्शक बनी रहेगी।

सन्तोष मेहता
नेता लोसपा

 

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