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  डबल इंजन के साथ ठगा गया उत्तराखंड!

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
राज्य स्थापना दिवस 9 नवम्बर
बीते विधानसभा व लोकसभा चुनाव में केंद्र व राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने के फा यदे गिनाकर उत्तराखंड की भोली भाली जनता से वोट हासिल कर सत्ता की कुर्सी तो दोनों जगह प्राप्त कर ली परन्तु उत्तराखंड की जनता के सपनो का राज्य फिर भी नही बन पाया।आज भी पहाड़ से पलायन जारी है,प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के कोई ठोस इन्तजाम नही है,स्वास्थ्य सेवाएं लचर है तो दिल्ली हरिद्वार होकर देहरादून जाने वाला राजमार्ग जिसे सन 2010 में फोर लेन हो जाना चाहिए था ,आजतक अधर में है।पहले उत्तराखंड की सड़कें गढ्ढा मुक्त और उत्तर प्रदेश की सड़कें गढ्ढा युक्त हुआ करती थी लेकिन आज स्तिथि उलट है।उत्तर प्रदेश की सड़कें बेहतर है तो उत्तराखंड की सड़कों में गढ्ढे ही गढ्ढे है।
उत्तराखण्ड बने उन्नीस साल पूरे हो चुके है और बीसवाँ साल शुरू हो चुका है ,लेकिन उत्तराखण्ड के लोगो के सपने का उत्तराखण्ड सँवरना तो दूर उनकी मूल भूत समस्याएं तक हल नही हो पाई है आज भी उत्तराखण्ड के लोगो की समस्याए जस की तस है।जल,जंगल,जमीन पर अपना हक पाने के लिए उत्तराखण्डी पहले भी लड रहे थे,आज भी लड रहे है।लेकिन उनकी सुनवाई न पहले हो पाई और न ही अब हो पा रही है।इस मुद्दे को उठाकर और पृथक राज्य मिलने पर इस मुद्दे के हल होने की आस मे ही यहां के लोगो ने जिनमे अग्रणी पर्वतीय मूल की महिलाये रही,राज्य की मांग को लेकर लम्बी लड़ाई लडी।अनेक आंदोलनकारियों को इसके लिए संघर्ष करते हुए पुलिस की गोलिया खाकर शहादत देनी पड़ी।कई महिलाओ को अपनी आबरू तक गंवानी पड़ी।तब जाकर लम्बे आंदोलन के बाद 9 नवम्बर सन 2000 को उत्तरांचल राज्य का जन्म हो पाया था,जो अब उत्तराखण्ड के रूप मे हमारे सामने है।लेकिन राज्य बनने के बाद से आज 19 साल बीतने यानि उत्तराखण्ड के किशोर से बालिग होने पर भी जल,जंगल,जमीन पर स्थानीय लोगो का हक नही हो पाया।राज्य बनने से पहले अविभाजित उत्तर प्रदेश मे यहां के पर्वतीय क्षेत्र के विकास के लिए अलग से एक मंत्रालय भी हुआ करता था।लेकिन राज्य बनने के बाद हम पहाड़ के सरोकार ही भूल गए है।जल,जंगल और जमीन के हक की लड़ाई के प्रणेता किशोर उपाध्याय हालांकि टिहरी से विधायक,नारायण दत्त तिवारी मन्त्रीमण्डल मे मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुके है लेकिन फिर भी सत्तापक्ष मे रहने पर भी उनकी मांगे बार बार उठाने के बावजूद आज तक पूरी नही हो सकी।टिहरी बांध के प्रभावितों के पुनर्वास के लिए तो उन्हें अपनी ही सरकार के खिलाफ विधान सभा मे धरना तक देना पड़ा था।फिर भी उनकी मांगे परवान नही चढ़ सकी।आज राज्य व केंद्र मे भाजपा की सरकार है।किशोर उपाध्याय ने एक बार फिर इन मांगो को लेकर आवाज उठानी शुरू की है।इस मुद्दे पर वे सर्वदलीय सम्मेलन भी कर चुके है।जिसमे पर्वतीय क्षेत्र को वन प्रदेश घोषित कर यहां के निवासियो को वनवासी का दर्जा देने,पर्वतीय क्षेत्र मे उगने वाली जड़ी बूटियों पर स्थानीय लोगो का हक घोषित करने,राज्य के वन व प्राकृतिक संसाधनों पर यहां के लोगो के हक की रक्षा करने व उन्हें पोषित करने ,राज्य के लोगो को वनवासी का दर्जा देकर केंद्र मे उन्हें नोकरियो मे आरक्षण देने,वनाधिकार अधिनियम 2006 तथा जैव विविधता अधिनियम 2002 के प्रावधान राज्य मे लागू करने की मांग उठाई गई है।जिसके लिए किशोर उपाध्याय पहले प्रदेश कांगेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह से और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत से समर्थन मांग चुके है।इस मुद्दे को सरकार से जुड़े लोगो के सामने भी ले जाया गया है।चाहे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट हो या प्रदेश सरकार में मंत्री मदन कौशिक हो ,सभी ने इस मुद्दे पर सकारात्मक भरोसा दिया है।लेकिन फिर भी अभी तक ये मांगे यथार्थ के धरातल पर उतर कर फलीभूत नही हो सकी है।जिससे लगता है कि अब इस मुद्दे पर एक बड़े आंदोलन की दरकार है जिसकी  आवाज  दिल्ली तक पहुंचे ।इस आंदोलन के सूत्रधार किशोर उपाध्याय का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्र जहां संसाधनों की भारी कमी है ,वहा लोगो के घर बनाने के लिए मुफ़्त खनन,घर की खिड़की दरवाजो और ईंधन के लिए सुखी लकडिया मुफ़्त मे मिलनी चाहिए।साथ ही पढ़ाई व नोकरी के लिए वनवासी का दर्जा देकर आरक्षण पर्वतीय क्षेत्र को दिया जाना जरूरी है।यह मांगे कब फलीभूत होगी यह तो पता नही ,लेकिन इतना जरूर है कि इन मांगो को चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सबका समर्थन जरूर मिल रहा है।इतना होने पर भी ये मांगे पूरी क्यो नही हो रही है,यह सवाल हर किसी को परेशान कर रहा है। राज्य में डबल इंजन की सरकार लाकर राज्य को भय मुक्त व भ्र्ष्टाचार मुक्त करने का दावा करने वाली  राज्य सरकार  दो कदम आगे बढ़ना तो दूर दस कदम पीछे हो गई है।राज्य में सरकार नाम की कोई चीज दिखाई नही पड़ती।विकास कार्य ठप्प है,अपराध सिर चढ़कर बढ़ रहे है तो महंगाई की मार से आम जन परेशान है।ऐसे में राज्य स्थापना की खुशी भी कही दिखाई नही पड़ती।दिवंगत हो चुके पूर्व मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी ने राज्य में औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देकर जहाँ राज्य को आर्थिक स्वावलम्बन के रास्ते पर ले जाने की कोशिश की थी,वही बीस सूत्री कार्यक्रम में उनके रहते राज्य को लगातार चार बार देशभर में पहला स्थान मिला था।लेकिन आज विकास कही खो सा गया है।राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से विपक्ष ही नही सत्ता पक्ष के लोग भी असन्तुष्ट दिखाई दे रहे है।जिसकारण राज्य स्थापना का उत्साह इस बार भी ठंडा ठंडा  सा और ठगा सा नजर आ रहा है और यह तब तक रहेगा जब तक कि राज्य के लोगो की भावनाओं का उत्तराखंड नही बन जाता।

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