गजल
पूजा बहार
ये क्या हुआ हैं मुझे खÞुद को आजमाती हूँ,
नसीब में ही नही मेरे जिसे मैं चाहती हूँ ।
हजार तरह के गÞम जिन्दगी को घेरे हैं,
मैं रोज रोज नया दुःख समेट लाती हूँ ।
वपÞmा की उनसे उम्मीदे रखूँ भला क्योंकर,
तमाम उम्र यही सोचकर निभाती हूँ ।
मैं जानती हूँ के वो लौटकर ना आएगा,
ना जाने क्यों वही नगमों को गुनगुनाती हूँ ।
ये मेरे जीने का अंदाजा देखते क्या हो,
गमों से चूर हूँ फिर भी मुस्कुराती हूँ ।

