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नेपाल और चीन की घनिष्ठता का भारत पर असर : श्वेता दीप्ति

 

विकास के सपने और चीन का सहयोग

डॉ. श्वेता दीप्ति, हिमालिनी  अंक  अक्टूबर 2019 | चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का बहु प्रतीक्षित नेपाल यात्रा असमंजस और अटकलों के बीच अन्ततः सम्पन्न हुआ । उल्लेखनीय है कि विगत २३ वर्षों में नेपाल की यात्रा करने वाले वे पहले चीनी राष्ट्रपति हैं । इससे पहले वर्ष १९९६ में जियांग जÞमिन ने नेपाल का दौरा किया था । नेपाल यात्रा से पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत के साथ शिखर वार्ता को अंजाम दिया ।

शी की भारत–यात्रा

एशिया के दो ताकतवर नेताओं की दूसरी अनौपचारिक शिखर बैठक उस समय हुई, जब भारत की चर्चा विश्व–पटल पर कश्मीर के मसले पर जोर–शोर से हो रही है । और यह भी साबित हो चुका है कि इस मसले पर चीन का झुकाव पाकिस्तान की तरफ है, जिसकी वजह से वह बार–बार अपने बयानों को बदलता आ रहा है । बीजिंग ने जम्मू–कश्मीर में संविधान के अनुच्छेद घठण् को निष्प्रभावी किए जाने और इस राज्य को दो भागों में विभाजित किए जाने के भारत के फैसले पर सार्वजनिक तौर पर असंतोष और असहमति जताई थी । इसके पीछे सबसे अहम कारण यह है कि, चीन ने चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) परियोजना में अच्छा खासा निवेश कर रखा है, चूंकि इस गलियारे को पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरना है, लिहाजा भारत के जम्मू–कश्मीर में उठाए गए ताजा कदम से इस परियोजना को लेकर कुछ अनिश्चितता पैदा हो गई है । अंत में, कश्मीर के मोर्चे पर भारत के मजबूत कदम ने लद्दाख क्षेत्र में भारत–चीन सीमा के गैरसीमांकित हिस्से को लेकर चीन को बेचैन कर दिया है । यही कारण है कि चीन पाकिस्तान के साथ खड़ा है पर यह भी एक सच है कि, बावजूद इसके वह पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र या अन्य तमाम अंतरराष्ट्रीय तथा बहुस्तरीय राजनयिक मंचों पर मदद करने में बुरी तरह नाकाम साबित हुआ ।

दरअसल जब विश्व ने कश्मीर मसले को भारत के आंतरिक मामले के रूप में स्वीकार किया, तो चीन खुद को पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक रूप से अलग–थलग महसूस करने लगा । यही वजह बनी कि चीन भी अब यह कह रहा है कि भारत और पाकिस्तान को यह मसला आपसी विचार–विमर्श के तहत सुलझाना चाहिए । पाकिस्तान को यह उम्मीद थी कि मोदी और जिनपिंग के बीच कश्मीर मुद्दा पर चर्चा हो सकती है, किन्तु तमिलनाडु के ऐतिहासिक तटीय शहर महाबलीपुरम में प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच हुई दूसरी अनौपचारिक बैठक के एजेंडे में अनुच्छेद घठण् को निष्प्रभावी करने का मुद्दा न तो शामिल हो सकता था और न ही ऐसा किया गया । जम्मू–कश्मीर का मसला भारत का आंतरिक मामला है, यह वह कई बार स्पष्ट कर चुका है । भारत ने स्पष्ट कर दिया कि गलतफहमियों को दरकिनार करके ही भारत–चीन सहयोग को आगे बढ़ाया जा सकता है । ऐसे बहुत से मसले हैं, जहां भारत और चीन में मतभेद हैं और ऐसे रणनीतिक मुद्दे भी हैं, जहां दोनों देशों के हित एक दूसरे से जुड़ते हैं । जब मतभेद, विवाद में बदल जाएं और विवाद टकराव में तब आपसी संबंधों को कई बार ऐसा नुकसान होता है कि उसकी भरपाई नहीं हो सकती । भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने अनौपचारिक शिखर बैठक की जिस रणनीति को विकल्प के रूप में चुना वह यह सुनिश्चित करने के सर्वश्रेष्ठ तरीकों में से है कि कुछ निश्चित मुद्दों पर जारी मतभेद और असहमतियों को उस हद तक न जानें दें कि वह टकराव में बदल जाए और कोई तीसरा पक्ष उससे अवांछित लाभ लेने की कोशिश करे ।
भारत और चीन एशिया के दो ऐसे देश हैं, जो वैश्विक महाशक्ति बनने के लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं । चीन इस लक्ष्य तक एकाधिक कारणों से भारत से पहले पहुंच सकता है । यह सिर्फ समय की बात है कि भारत भी विशिष्ट भारतीय गुणों के साथ उस लक्ष्य को हासिल कर सकता है । दोनों देश जानते हैं कि यह तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक कि, भारत और चीन तेजी से आर्थिक विकास करें, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी हासिल करें और सबसे अहम एक दूसरे की विकास के रास्ते में बाधक न बनें । इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा की जा रही अनौपचारिक शिखर बैठकों से अच्छा कोई और तरीका नहीं हो सकता था । किसी देश के साथ मुद्दों को हल करने, असहमति का प्रबंधन करने, संघर्षों को रोकने और सहयोग के क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए जरूरी है कि उस देश के उच्च नेतृत्व से संवाद हो । इस नाते चीन और भारत की यह पहल निश्चय ही सराहनीय रही ।

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नेपाल और चीन की घनिष्ठता का भारत पर असर

जहाँ तक नेपाल और चीन के बीच के सम्बन्धों की बात है, तो यह अक्सर चर्चा का विषय बन जाता है कि क्या नेपाल और चीन की बढ़ती घनिष्ठता से भारत को चिन्तित होना चाहिए ? यह जग जाहिर है कि भारत हमेशा से लोकतंत्र का पक्षधर रहा है । वहीं चीन का राजनीतिक परिवेश और इतिहास इन सबसे बिल्कुल अलग है । चीन के अंदर सन १९८९ में लोकतान्त्रिक आन्दोलन की शुरुआत हुई, इस आन्दोलन को थिआनमन आन्दोलन के नाम से जाना जाता है,क्योंकि इस आन्दोलन की शुरुआत चीन की राजधानी बिजिंग के थिआनमन चौक से हुई थी । इस स्थान पर एकत्रित होकर आन्दोलनकारी (जिसमे अधिकतर मजदूर और विधार्थी शामिल थे) अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतान्त्रिक अधिकारों की शांतिपूर्ण लोकतान्त्रिक तरीके से मांग कर रहे थे, अपनी मांगों को मनवाने के लिए इन्होने भूख हड़ताल का सहारा लिया, परन्तु सरकार ने इस आन्दोलन को दबाने के लिए सेना का सहारा लिया, सेना ने टैकों से प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाकर हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, यह इतिहास अवश्य है पर सत्ता की मानसिकता कई मामलों में आज भी ऐसी ही है । हांगकांग का उदाहरण सामने है । वर्तमान में चीन की शासन व्यवस्था को देखने पर प्रतीत होता है कि आर्थिक क्षेत्र में चीन लगातार तरक्की कर रहा है, परंतु राजनीतिक क्षेत्र में इसकी संरचना में कोई खास बदलाव नहीं आया है, जहाँ लोकतान्त्रिक देशो में सभी प्रकार के विचारो पर आधारित पार्टी व लोगो को राजनीति में आने और चुनाव लड़ने का अधिकार हैं, वही चीन में केवल एक ही पार्टी (साम्यवादी पार्टी) चुनाव लड़ती हैं, इसी पार्टी के द्वारा ही जनता राजनीति में भाग ले सकती हैं । अर्थात् एकल साम्राज्य और वर्चस्व की अवधारणा सत्ता के मूल में है । चीन का मानव अधिकारों पर विचार भी पश्चिमी देशो से अलग हैं, पश्चिमी देश चीन पर मानव अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते रहते हैं, इतना ही नही विश्व समुदाय मानता है कि अपना राष्ट्रीय हित साधने में बीजिंग नंबर एक है । अपने फÞायदे के लिए चीन कब क्या कर दे, कोई नहीं जानता, इसीलिए कोई चीन पर विश्वास नहीं करता है । चीन ने पाकिस्तान तक से दोस्ती सोची समझी रणनीति के तहत की है । चीन अपने को सिर्फ अपने प्रति जिम्मेदार मानता है, इसीलिए अमेरिका ही नहीं पश्चिम के सभी देश चीन से आशंकित रहते हैं और भारत में चीन का विकल्प दिखते हैं ।
चीन की यही नीति ये सोचने पर बाधित करती है कि नेपाल के साथ चीन का सम्बन्ध सिर्फ नेपाल के विकास को लेकर है या भारत को घेरने की एक सोची समझी नीति । हालाँकि नेपाल इन दोनों देशों के बीच साम्यता स्थापित करते हुए आगे बढ़ना चाहता है । पड़ोसी देशों भारत और चीन से नेपाल का संबंध मजबूत, गर्मजोशी भरा और दोस्ताना बना हुआ है और किसी एक देश के साथ अपने संबंधों की तुलना दूसरे देश से हम नहीं कर सकते । हर देश के लिए अलग– अलग आधार और कारण होते हैं और हर द्विपक्षीय संबंध अनोखा होता है । पर नेपाल में चीन का बढ़ता प्रभाव और चीन का पाकिस्तान को समर्थन एक अलग परिदृश्य भी जरूर खड़ी करता है ।
भारत, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार होने के साथ–साथ विदेशी निवेश का सबसे बड़ा स्रोत है । भारतीय उद्योग, नेपाली उद्योगों के साथ विनिर्माण, सेवाओं (बैंकिंग और बीमा), बिजली क्षेत्र और पर्यटन आदि में संलग्न हैं । नेपाल के साथ भारत का सम्बन्ध कई मायनों में महत्तवपूर्ण है ।

नेपाल एक लैंडलॉक देश है जो तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है और एक तरफ तिब्बत से । भारत–नेपाल ने अपने नागरिकों के मध्य संपर्क बढ़ाने और आर्थिक वृद्धि एवं विकास को बढ़ावा देने के लिये विभिन्न कनेक्टिविटी कार्यक्रम शुरू किये हैं । हाल ही में भारत के रक्सौल को काठमांडू से जोड़ने के लिये इलेक्ट्रिक रेल ट्रैक बिछाने हेतु दोनों सरकारों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर किये गए थे । इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत सरकार नेपाल में जÞमीनी स्तर पर बुनियादी ढाँचे के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करते हुए समय–समय पर विकास सहायता प्रदान करती आई है । जिसमें बुनियादी ढाँचा, स्वास्थ्य, जल संसाधन, शिक्षा, ग्रामीण और सामुदायिक विकास आदि शामिल हैं ।
इतना ही नहीं रक्षा के क्षेत्र में द्विपक्षीय रक्षा सहयोग के तहत उपकरण और प्रशिक्षण के माध्यम से नेपाल की सेना का आधुनिकीकरण शामिल है । गौरतलब है कि भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट्स में नेपाल के पहाड़ी इलाकों से भी युवाओं की भर्ती की जाती है । भारत वर्ष २०११ से नेपाल के साथ हर साल सूर्य किरण नाम से संयुक्त सैन्य अभ्यास करता है । बावजूद इसके अगर जमीनी हकीकत पर दृष्टि डाली जाय तो इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि नेपाल में चीन ने अपनी एक मजबूत पकड़ बना ली है । चीन का प्रभाव दक्षिण एशिया में लगातार बढ़ रहा है । नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान या बांग्लादेश हर जगह चीन की मौजूदगी बढ़ी है । ये सभी देश चीन की महत्त्वाकांछी योजना बेल्ट रोड परियोजना में शामिल हो गए हैं । लेकिन भारत इस परियोजना के पक्ष में नहीं है ।
विगत में नेपाल अपनी कई जÞरूरतों के लिये भारत पर निर्भर रहा है और आज भी है, परन्तु नेपाल लगातार भारत पर निर्भरता को कम करने की कोशिश कर रहा है । इसलिए यह स्वाभाविक है कि वह अपनी दृष्टि भारत के अलावा हर उस जगह दौड़ाएगा जहाँ उसे सहयोग की सम्भावना नजर आएगी ।

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विकास के सपने और चीन का सहयोग
नया नेपाल विकास के सपने देख रहा है । इसलिए तेइस वर्षों के बाद होने वाली चीन के राष्ट्रपति की नेपाल यात्रा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी । राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के मध्य २० समझौतों पर हस्ताक्षर किये और साथ ही चीनी राष्ट्रपति ने नेपाल के विकास कार्यक्रमों के लिये ५६ अरब नेपाली रुपए की सहायता देने की भी घोषणा की । इसके अलावा चीनी राष्ट्रपति ने काठमांडू को तातोपानी ट्रांजिट पॉइंट से जोड़ने वाले अरनिको राजमार्ग को दुरुस्त करने का भी वादा किया । ध्यातव्य है कि यह राजमार्ग वर्ष २०१५ में आए भूकंप के बाद से बंद है । राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नेपाल यात्रा को ‘ऐतिहासिक महत्व’ वाली यात्रा करार दिया गया है । जिनपिंग की नेपाल यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नेपाल के अंदर नार्थ–साउथ आर्थिक कॉरिडोर का विकास को लेकर चीन और नेपाल के बीच सहमति बनना रहा । यही नहीं केरूंग–काठमांडू हाइवे को विकसित करने को लेकर भी दोनों मुल्कों के बीच सहमति बन गई । वहीं ट्रांस हिमालयन रेल लाइन को जल्द से जल्द विकसित करने को लेकर भी बातचीत हुई ।

इन सबके बीच राष्ट्रपति जिनपिंग के सम्बोधन में जो धनक और चेतावनी थी, वह भी काफी चर्चा में रही । काठमांडू में जिनपिंग ने नेपाली नेताओं के साथ बैठक के बाद साफ शब्दों में कहा कि दुनिया की कोई ताकत चीन को तोड़ने की कोशिश न करे । चीन इस तरह की कोशिश को विफल कर देगा । चीन की मीडिया ने इशारा किया कि जिनपिंग का ब्यान उइगुर, तिब्बती और हांगकांग के अलगाववादियों के लिए स्पष्ट संदेश है । गौरतलब है कि नेपाल लंबे समय तक पश्चिमी ताकतों का बफर इलाका रहा है ।

चीन का आरोप है कि चीन विरोधी गतिविधियों को चलाने का बड़ा केंद्र काठमांडू रहा है, जहां पश्चिमी ताकतें सक्रिय रही हैं । चूकि तिब्बत से नेपाल की सीमा लगती है और नेपाल का भारत और तिब्बत के बीच स्पेशल जियोस्ट्रैटजिक पोजिशन है, इसलिए चीन १९९० के बाद नेपाल को लेकर खासा सतर्क हो गया । नेपाल में हजारों की संख्या में तिब्बती रहते हैं, इसलिए चीन नेपाल को लेकर खासा संवेदनशील है, क्योंकि चीन को हमेशा यह शक रहा है कि इन तिब्बती शरणार्थियों को पश्चिमी ताकतें समर्थन देती है । उन्हें आर्थिक रूप से फंडिग भी होती है । हालांकि नेपाली लीडरशीप में आपसी गतिरोध के कारण जिनपिंग के दौरे के दौरान दोनों मुल्कों के बीच प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर नहीं पाया, लेकिन चीन लगातार यह कोशिश आगे भी करेगा । अभी फिलहाल दोनों मुल्कों के बीच अपराधिक मामलों में कानूनी सहयोग को लेकर सहमति बन गई है ।

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दरअसल, प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर होने के बाद परेशानी नेपाल में रहने वाले २० हजार तिब्बती शरणार्थियों को होगी, जिनपर चीन का आरोप है कि ये नेपाल में चीन विरोधी गतिविधियां चलाते हैं । नेपाल की सरकार ने वन चाइना पालिसी को खुला समर्थन दिया है । यह संकेत पश्चिमी ताकतों के लिए अच्छे संकेत नहीं है । नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और जिनपिंग की बैठक में बेल्ट एंड रोड पहल पर काम तेज करने को लेकर बातचीत हुई । साथ ही नेपाल के अंदर तीन नार्थ–साउथ इकनॉमिक कॉरिडोर विकसित करने पर सहमति बनी है । प्रस्तावित नार्थ–साउथ इकनॉमिक कॉरिडोर में कोशी, गंडक और करनाली को शामिल किया गया । चीन ने साफ संकेत दिए है कि चीन–पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर के तर्ज पर नेपाल में नार्थ–साउथ इकनॉमिक कॉरिडोर विकसित किया जाएगा ।

दरअसल, नेपाल का बेल्ट एंड रोड पहल में शामिल होना ही भारत के लिए एक बड़ा झटका है । भारत चीन के बेल्ट एंड रोड पहल का लगातार इसका विरोध कर रहा है । नेपाल बेल्ड एंड रोड पहल में २०१७ में ही शामिल हो गया था ।

नेपाल ने चीन के साथ बेल्ट एंड रोड पहल के तहत नेपाल के अंदर विकास के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किया था । बेल्ट एंड रोड पहल के बाद चीन का निवेश नेपाल के अंदर आने का रास्ता साफ हो गया । इस समय चीन नेपाल के अंदर सबसे ज्यादा पूंजी निवेश करने वाला मुल्क बन गया है । चीन और नेपाल के बीच सलाना दिपक्षीय व्यापार एक अरब डॉलर पार गया है ।
जिनपिंग और नेपाली लीडरशीप की हुई बैठक में बेल्ट एंड रोड पहल के तहत ट्रांस हिमालयन मल्टी डायमेंसनल कनेक्टिविटी नेटवर्क पर काम तेज गति से करने को लेकर सहमति बनी । इसके तहत नेपाल को उड्ड्यन, रेलवे, रोड और संचार से जोड़ा जाएगा । नेपाल में दो एयरपोर्टों का विकास चीन कर रहा है ।
यही नहीं नेपाल को दो हवाई जहाज भी चीन ने अनुदान के रूप में दिए है । दरअसल उड्ड्यन सेक्टर के विकास के बाद नेपाल को चीनी पर्यटकों का एक बड़ा केंद्र बनाने के खेल में चीन लगा हुआ है । बेल्ट एंड रोड पहल से नेपाल का विकास के तहत नेपाल क्षेत्रीए संतुलन साधने में लगा है ।
नेपाल भारत पर पूरी तरह से अपनी निर्भरता खत्म करने के लिए तत्पर है । उधर चीन ने भी अपनी नीति बदली है । माओत्से तुंग ने किसी जमाने में नेपाली लीडरशीप को साफ बोला था कि हिमालय पर्वत की दुर्गम परिस्थितियों के कारण नेपाल को भारत जैसे मुल्कों से अच्छे संबंध रखने चाहिए, क्योंकि इसी में नेपाल की भलाई होगी ।
जाहिर है चीन नेपाल को हिमालय पर्वत की दुर्गम परिस्थितियों के कारण बहुत ज्यादा सहयोग करने की स्थिति में नहीं है । लेकिन अब स्थिति बदल गई है । अब चीन हिमालय की दुर्गम परिस्थितियों को पार करने तिब्बत से लुंबिनी तक रेल कनेक्टिविटी देने पर काम शुरू कर चुका है । चीन की रणनीति साउथ एशिया में साफ है । यह रणनीति ‘चीन फसर््ट’ की है । उसकी रणनीति एशिया में अपना दबदबा बनाए रखने की है ।
चीन के पक्ष को नजरअंदाज करें तो देखना यह है कि नेपाल इस ऐतिहासिक यात्रा से कितना फायदा लेता है ? इस यात्रा ने नेपाल की वैश्विक स्तर पर सिर्फ प्रतिष्ठा बढ़ाया है या फिर भविष्य में इस यात्रा का कोई सुखद पहलू भी सामने आने वाला है । क्योंकि चीन से सहायता लेने से पहले दूरगामी विश्लेषण और सतर्कता की भी आवश्यकता अवश्य है ।

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