Wed. May 27th, 2020

नेपाल सम्पदा और सम्भावनाओं से सम्पन्न देश है, आवश्यकता है सही नेतृत्व की : डॉ प्रमोद कुमार झा

प्रो.डा. प्रमोद कुमार झा नेपाल में विज्ञान के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा नाम है– प्रो. डा. प्रमोद कुमार झा । आप त्रिभुवन विश्वविद्यालय वनस्पति शास्त्र केन्द्रीय विभाग, नेपाल विज्ञान तथा प्रविधि प्रज्ञा प्रतिष्ठान (नास्ट) में प्राज्ञ, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में विज्ञान समूह के संयोजक जैसे कई संस्था में रहकर विज्ञान और वातावरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया है, जो उदाहरणीय भी है । त्रिभुवन विश्वविद्यालय से सेवा–निवृत्त होकर भी आज आप उसी विश्व विद्यालय में ‘प्रोफेसर इमेरिटस’ के रूप में नियुक्त हैं । यह एक विशिष्ट सम्मान भी है । इसी से पता चलता है कि विज्ञान में आपका योगदान और मूल्यांकन किस ऊँचाई पर है । इसीतरह सन् २००७ से आप नास्ट में प्राज्ञ (आजीवन) के रूप में हैं । नेपाल सरकार से मिलनेवाला सबसे अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय वनस्पति पुरस्कार, तीसरा विश्व–विज्ञान प्रज्ञा–प्रतिष्ठान (ह्वास) युवा वैज्ञानिक पुरस्कार, सु–प्रबल गोरखा दक्षिणबाहू जैसे कई पुरस्कार और सम्मान भी आप को मिल चुके हंै । आज के दिन में आप टोनी हेगन फाउण्डेशन के अध्यक्ष भी हैं । इसतरह अन्य कई संघ–संस्थाओं से आप प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष रूप से आबद्ध हैं । आप सबके समक्ष प्रस्तुत है– डा. प्रमोद कुमार झा जी का जीवन–सन्दर्भ–
प्रस्तुतिः लिलानाथ गौतम

पारिवारिक पृष्ठभूमि
मेरा जन्म २२ जुलाई १९५४ के दिन महोत्तरी जिला स्थित साढा–३ में हुआ है । मेरे पिता जी का नाम पं. श्री सुरेश झा है और माता जी का नाम श्रीमती विन्ध्यवासिनी देवी है । मेरे ४ भाई और एक बड़ी बहन हंै, मैं चौथे नम्बर पर आता हूँ । हम लोगों का परिवार प्राज्ञिक परिवार में से है । पिताजी संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे । उनका स्वर्गवास सन् १९९५ श्रावण पूर्णिमा के दिन हुआ । उन्होंने बनारस से शिक्षा–दीक्षा प्राप्त की थी । पिताजी का योगदान संस्कृत, मैथिली और हिन्दी में अतुलनीय है । इसीलिए उनके बारे में थोड़ी–सी चर्चा वान्छनीय है ।
हां, मेरे पिताजी संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान, लेखक और कवि थे । उनका जन्म सन् १९२० में हुआ था । लेकिन जन्म के कुछ ही वर्ष के बाद उनके पिताजी (मेरे दादाजी) जयदेव झा का देहान्त हो गया । इसीलिए उनका पालन–पोषण बड़े चाचा नन्द झा जी ने किया । उस समय औपचारिक शिक्षा–दीक्षा की अवस्था आज की तरह नहीं थी । लेकिन पिता जी का संस्कार इतना प्रबल था कि पारिवारिक सदस्यों ने पिताजी को पढ़ने के लिए बाहर जाने के लिए प्रेरित किया । उनकी प्रारम्भिक शिक्षा कुआ (जनकपुरधाम) से शुरु हुई थी और क्वींस कॉलेज (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) काशी तक रही । वे सरल, निश्चल व्यक्ति थे । मिथिला–मैथिली से अनन्य प्रेम था । उन्हें अध्ययन–अध्यापन एवं लेखन में रुचि थी । वह राजस्थान (भारत) में वरिष्ठ अध्यापक एवं तत्पश्चात साधुबेला संस्कृत महाविद्यालय में सम्मानित प्राध्यापक रहे । उन्होंने संस्कृत, मैथिली एवं हिन्दी में १६ पुस्तक लिखा हैं । साथ में कई पुस्तकों का सम्पादन किया । उनकी अमर कृति श्लोक सिद्धान्त कौमुदी (दो भाग, १४००० श्लोक सहित) सम्पूर्णानान्द संस्कृत विश्वविद्यालय से १९८२ में प्रकाशित हुई, जिस पर अभी नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय के उप–प्राध्यापक श्री भानु आचार्य विद्यावारिधि कर रहे हैं । संक्षेप में कहे तो पिताजी एक प्राज्ञिक आदर्श व्यक्तित्व थे, जिसका प्रभाव मुझ पर अधिक रहा है ।
काशी में विद्यार्थी काल में उनकी मुलाकात तत्कालीन बड़ा गुरुजी से हुई और उन्होंने पिता जी को काठमांडू आने के लिए प्रेरित किया । उस समय एक प्रावधान था कि बाहर से काठमांडू आनेवाले नेपाली व्यक्ति को भी राहदानी लेना पड़ता था । सामान्य नागरिकों को राहदानी मिलना मुश्किल था । इसीलिए मेरे पिताजी को भी नहीं मिला । निराश होकर पिता जी ने बड़ा–गुरुजी को एक पत्र लिखा । जिसका भाव था– ‘मैं नेपाल में सेवा करना चाहता था, इसके लिए आपने प्रेरित किया । लेकिन परिस्थिति ऐसी बनी कि मुझे यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका । इसीलिए मैं पुनः विश्वनाथजी के शरण में ही जा रहा हूँ ।’
इसतरह पिताजी पुनः भारत की ओर ही चले गए और राजस्थान में शिक्षा क्षेत्र में अपनी सेवा शुरु की । पिता जी राजस्थान में होने के कारण मेरी शिक्षा–दीक्षा भारत में ही होने लगा । मैंने जोधपुर विश्व विद्यालय से बीएससी किया ।उसके बाद एमएसी (सन् १९७५) कानपुर विश्वविद्यालय से किया । एमएसी करने के बाद पिता जी भी रिटायर्ड हो गए थे । उनकी प्रबल इच्छा थी कि बच्चे लोग नेपाल में ही सेवा करें । मेरे बड़ेभाई साहेब डॉ. जयशंकर झा (पूर्व प्रोफेशर, त्रिवि) को भी पिताजी ने ही सुझाव दिया था कि वह नेपाल में ही सेवा करें । पिताजी की इच्छा अनुसार ही मैंने भी त्रिभुवन विश्वविद्यालय अन्तर्गत महेन्द्र मोरङ कैंपस विराटनगर से सेवा शुरु की । १९७८ में यूजीसी भारत की छात्रवृत्ति में पुनः जोधपुर विश्वविद्यालय में विद्यावारिधि करने गया और १९८२ में विद्यावारिधि (पीएचडी) किया । उसके पश्चात् त्रिभुवन विश्वविद्यालय कीर्तिपुर में स्थानान्तरण हुआ । तब से निरन्तर विश्वविद्यालय सेवा में अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान में संलग्न हूँ ।
अनुशासित विद्यार्थी
बचपन से ही मैं एक अनुशासित और शान्त स्वभाव का था । इसीलिए बालपन में मुझमें ऐसी कोई शरारत करने वाली आदत नहीं थी, जो उल्लेख कर सकें । लोगों का स्नेह बना रहता था । प्रायः गर्मी मौसम में डेढ़ महिनों की छुट्टी होती थी, उस समय हम लोग गांव में आते थे ।
गर्मी का मौसम, बच्चों लोगों के लिए गांव के पोखर में तैरना (स्वीमिङ करना) स्वभाविक क्रिया है । मैंने भी पोखर में स्वीमिङ करने का प्रयास किया । लेकिन असफल रहा । आज की तुलना में उस समय पोखर का पानी साफ–सुथरा ही रहता था । फिर भी लगता था कि पोखर का पानी गंदा है । सिखानेवाले व्यक्ति ने भी बहुत कोशिश की, तब भी मैं स्वीमिङ नहीं सीख पाया ।
आम के बगीचे में बाल सखाओं के साथ रहना बहुत अच्छा लगता था । उस समय की पीढ़ी ने बच्चों की शिक्षा पर काफी ध्यान दिया । छुट्टी में मैं अपनी बडी बहन के यहां रहना चाहता था । मुझ पर मेरी जीजी (बहन) का स्नेह अत्यधिक रहा है । आज भी जीजी के यहां बिताए समय की याद ताजी है ।
शिक्षक की नाराजगी
मेरे पिताजी संस्कृत के विद्वान होने के कारण घर में ही संस्कृत का ज्ञान पर्याप्त होता था । स्कूल में ६, ७ और ८ कक्षा में अनिवार्य संस्कृत विषय पढ़ना पड़ता था । संस्कृत पढ़ानेवाले जो शिक्षक थे, वह मुझसे बारबार ‘नाराज’ हो जाते थे । क्योंकि इस विषय में मेरा ज्ञान बेहतर था । कभी–कभी मैं संशोधन भी कर दिया करता था । उन शिक्षक को पता चला कि मेरे पिता जी संस्कृत के विद्वान हैं, उसके बाद उनका व्यवहार प्रशंसनीय रहा ।
बचपन में मुझे बचत करने की भी आदत थी, जो आज भी मेरे व्यवहार में है । मुझे और मेरे भाइयों को टिफिन के लिए साथ कुछ पैसे मिला करते थे । मैं उन पैसो को जमा करता था । एक बार मेरे बचत किए हुए रुपये किसी ने गायब कर दिया । वह चोरी उस समय मेरे लिए बहुत बड़ा नुकसान था ।
सेवा क्षेत्र में प्रवेश
पारिवारिक पृष्ठभूमि शिक्षा से संबंधित रहने के कारण मैं भी विश्वविद्यालय में शिक्षण सेवा (विराटनगर) में प्रवेश किया । विश्वविद्यालय सेवा में स्थानान्तरण का भय नहीं रहता है, स्थायित्व और शान्त जीवन रहता है । जब मैं पीएचडी कर नेपाल वापस हो गया, उस समय मेरी उम्र २८ साल की थी । उसके दो साल बाद मुझे रीडर (सह–प्राध्यापक) में प्रमोशन मिला और १९९६ में प्रोफेसर में पदोन्नति हुई । मैं त्रिभुवन विश्वविद्यालय वनस्पति शास्त्र केन्द्रीय विभाग में १० वर्ष विभागीय प्रमुख रहा हूँ । ४० वर्ष निरन्तर सेवा के पश्चात् सन् २०१६ में सेवा निवृत्त हुआ । उसके बाद त्रिभुवन विश्वविद्यालय ने मुझे ‘प्रोफेसर इमेरिटेस’ के रूप में नियुक्त किया है । कम ही उम्र में मुझे त्रिवि में सेवा करने का जो अवसर मिला, उससे मुझे प्राज्ञिक उपलब्धियां हासिल हुई । अपने कार्यकाल में मैंने विश्व के कई विश्वविद्यालयों से सम्पर्क रहा और सहकार्य किया । अनुसंधान के सिलसिले में काफी विदेश भ्रमण किया । जापान, अमेरिका, कनाडा, इटाली के विश्वविद्यालय मैं विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में रहा ।
अध्ययन, अध्यापन, अनुसंधान के साथ–साथ लेखन एवं सम्पादन के कार्य में भी मैं संलग्न रहा । १८ पुस्तकों का लेखन, सम्पादन एवं दो सौ से अधिक शोधलेख एवं एक दर्जन से अधिक विषयगत संघ–संस्थाओं से जुडाव एवं कई जर्नलों का सम्पादन उल्लेखनीय रहा है । करीब दो दर्जन विश्वविद्यालयों के विद्यावारिधि परीक्षक (पीएचडी परीक्षक) भी रहा हूँ । अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में सहभागी होना और अनुसंधानमूलक चर्चा करना मेरी रुचि रही है । अभी हाल ही में तान्जानिया में सहभागी होकर आया हूँ और नवम्बर में हैदरावाद में होनेवाले अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में सहभागी होने जा रहा हूँ, जहां मैं एक विशेष सत्र का आयोजन करने जा रहा हूँ । अपने नेतृत्व में तीन अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन (१९९४, १९९८, २००४) का सफल आयोजन किया, जिससे त्रिभुवन विश्वविद्यालय वनस्पति विभाग को काफी ख्याति मिली ।
पीएचडी करते वक्त मेरे जो सुपरभाइजर थे, वह हैं– प्रो. डेबिड एन सेन । उनसे मैंने काफी कुछ सीखा । वह बहुत ही प्रख्यात प्राध्यापक थे, उनका स्नेह मुझे हरदम बना रहा । मैं उन्हें आदर्श प्राध्यापक के रूप में मानता हूँ । उनकी जीवन–शैली से मैं काफी प्रभावित रहा हूँ । पीएचडी करते समय ही मुझे जोधपुर विश्वविद्यालय से प्रकाशित ‘इण्डियन रिभ्यू अफ लाइफ साइन्सेज’ नामक दो अंक का सह–सम्पादन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था । यह सौभाग्य प्रो. सेन साहेब ने ही दिया था । वही से मेरी लेखन और सम्पादन क्षमता का विकास हुआ है ।
अनुसंधान के लिए अवसर
पीएचडी कर आने के बाद मुझे राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र से काफी अनुसन्धानमूलक प्रोजेक्ट मिलना शुरु हो गया । सन् १९८५ में ही मुझे इन्टरनेशनल फाउण्डेशन ऑफ साइन्स (आईएफएस, स्वीडेन) की ओर से अनुसंधान सहयोग मिला । उसके बाद १९८७ और १९९० में भी इस परियोजना के लिए आइएफएफ से प्रोजेक्ट मिला । मेरी प्रथम विदेश यात्रा १९८५ में सिंगापुर विश्वविद्यालय में आयोजित वर्कसाप में सहभागी होने से से शुरू हुई थी । उसके बाद से प्रायः प्रमुख सभी राष्ट्रों में गया हूँ । जिससे मेरा अन्तर्राष्ट्रीय संपर्क बढ़ गया । जैविक विविधता तथा वातावरण से संबंधित लगभग दो दर्जन परियोजना का मैंने संचालन किया, जिसमें आईएफएस (स्वीडेन), नेशनल साइंस फाउण्डेशन, यूएसएड, बोक्सबेगन फाउण्डेशन जर्मनी, विश्व वन्य जन्तु कोष, ए.पी.एन. जापान, इटली आदि प्रमुख है । अभी मैं यूएसएआईड का परियोजना प्रमुख हूँ, जिसमें जैविक विविधता एवं जलवायु परिवर्तन संबंधी अनुसंधान हो रहा है । इसमें पाँच विद्यावारिधि और १७ एमएमसी विद्यार्थी संलग्न है । अतिक्रमण वाले प्रवृत्ति के पौधों का नियन्त्रण से लेकर औषधिमूलक वनस्पति एवं औषधीय रसायन की खोज, पोषकीय वनस्पतिक गुण, जलवायु परिवर्तन का जैविक विविधता पर प्रभाव, जलवायु परिवर्तन का विश्लेषण, जैविक विविधता संरक्षण आदि विषय अनुसंधान का विषय रहता है ।
विज्ञान क्षेत्र में नेपाल की प्रगति
नेपाल एक विकाशील देश है । अन्य देशों की तुलना में यहां आधुनिक शिक्षा और विज्ञान का प्रारम्भ विलम्ब हुआ है । त्रिभुवन विश्वविद्यालय (१९५९) में स्थापना के बाद सन् १९६५ से एमएसजी की शिक्षा यहां प्रारम्भ हुई है । विद्यावारिधि कार्यक्रम १९८० के दशक में प्रारम्भ हुआ । आधुनिक प्रयोगशालाओं का अभाव रहा है । अनुसंधान परियोजनाओं के लिए नेपाल में स्रोत का अभाव था, जो आज भी है । लेकिन इस परिस्थितियों में विगत दो दशक में कुछ प्रगति हुई है । त्रिभुवन विश्वविद्यालय एवं काठमांडू विश्वविद्यालय में शिक्षण के साथ–साथ अनुसंधान पर बल दिया जाने लगा । स्वदेश एवं विदेश से पीएचडी करके विशेषज्ञता हासिल करनेवालों की संख्या में संख्यात्मक और गुणात्मक वृद्धि हुई है । नेपाल विज्ञान तथा प्रविधि प्रज्ञा प्रतिष्ठान (नास्ट) की १९८३ में स्थापना हुई, उसके बाद इस दिशा में व्यापक जागरूकता, प्रर्बद्धन एवं सहयोग होने लगा है । मैं नास्ट (तत्कालिक रोनास्ट) से शुरु से ही सम्बद्ध रहा हूँ और २००७ से इसका प्राज्ञ (आजीवन) नियुक्त हूँ । त्रिभुवन विश्वविद्यालय के विज्ञान के विभिन्न विषयों में सबसे अधिक पीएचडी वनस्पति शास्त्र केन्द्रीय विभाग ने ही कराया है और आज भी विज्ञान में सबसे अधिक पीएचडी कराने का योगदान मेरा ही रहा है । अभी भी मेरे अन्तर्गत ५ विद्यार्थी पीएचडी कर रहे हैं । नास्ट के प्राज्ञ के रूप में भी सक्रिय रहा है । इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) में विज्ञान समूह का सदस्य और संयोजक के रूप में विगत ७ वर्ष से सक्रिय रहा हूँ । विज्ञान के क्षेत्र में नेपाल में काफी अवसर एवं सम्भावनाएं हैं । युवा वैज्ञानिकों को सहयोग और प्रोत्साहन मिले तो आश्चर्यजनक उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं ।
प्राकृतिक सम्पदा में धनी नेपाल
नेपाल वो जगह है, जहां प्रकृति ने सब कुछ दिया है । समुद्री सतह से लेकर सबसे ऊँची चोटी (सगरमाथा) तक नेपाल में ही है । विश्व में जितने भी प्रकार की परिस्थितियाँ, प्रणाली और जलवायु हैं, वे नेपाल में पाई जाती हैं । जैविक विविधता के दृष्टिकोण से नेपाल विश्व ही में ख्याति प्राप्त देश है । हम लोग  नेपाल को प्राकृतिक प्रयोगशाला एवं संग्रहालय कहते हैं । हां, यहां अनुसंधान के द्वारा जैविक विविधता के विभिन्न पक्षों का लाभ लिया जा सकता है । विदेशियों के लिए नेपाल एक आकर्षक और अनुसंधान के लिए उपर्युक्त देश है, जिसका हमें लाभ उठाना चाहिए ।
जलस्रोत के हिसाब से नेपाल बहुत ही धनी देश है, जिसको हम लोग सदुपयोग नहीं कर पा रहे हैं । हां, नेपाल आर्थिक रूप में कमजोर है, गरीब है । इसके लिए हम लोग खुद जिम्मेदार हैं । सक्षम एवं दूरदर्शी नेतृत्व इस समस्या समाधान के लिए आवश्यक है । देश में प्रचुर संभावनाएं होते हुए भी हम अपनी ही कमजोरियों के कारण आज आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं ।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता
नेपाल विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं से गुजरा है । इस कारण यहां काफी परिवर्तन और अस्थिरता रही है । इसका प्रभाव हमारे जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ा है । शैक्षिक क्षेत्र भी इससे काफी प्रभावित रहा है । वर्तमान में देखा जाए तो शैक्षिक संस्थाओं की स्थिति प्रायः आलोचनात्मक रही है । युवा अध्ययन एवं काम के लिए विदेश पलायन हो रहे हैं ।
संख्यात्मक रूप से विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों की संख्या में प्रगति हुई है । लेकिन गुणात्मक दृष्टिकोण से कुछ अपवाद छोड़ प्रायः शिकायत ही है । मैं पिछले ४ दशक से विश्व विद्यालय से जुड़ा रहा हूँ । यहां के विकासक्रम पर नजर रही है । शैक्षिक क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप का आरोप वर्षों से लग रहा है । लेकिन किसी प्रकार का सुधार नहीं देखा गया है ।
पदाधिकारियों की नियुक्ति में कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता जग जाहिर है । ऐसा नहीं कि देश में सक्षम और योग्य व्यक्तियों का अभाव है । लेकिन वे लोग राजनीतिक मुख्य धारा से दूर है । अपार सम्भावनाओं से युक्त युवा विद्यार्थी व्यवस्था के कमजोरी के कारण शिक्षा का पूर्ण लाभ नहीं ले पाते । डिग्री लेना और ज्ञान लेने का अन्तर अभी भी कई लोगों के समझ से परे है ।
एक कहावत है कि किसी देश को बरबाद करना है तो उस देश की शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद (नष्ट) कर दो । जाने अनजाने वही हो रहा है, हमारे यहां । समाज इससे पीडित और असहाय–सा है । देश में शिक्षा व्यवस्था का नेतृत्व सक्षम और दूरदृष्टि वाले व्यक्ति के द्वारा होना चाहिए । राजनीतिक कार्यकर्ताओं की पदपूर्ति देश के भविष्य के लिए नुकसान दे रही है ।
शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्र से पहल होना जरुरी है । सबसे पहले घर और परिवार से ही सही शिक्षा शुरु होती है तो बेहतर है । क्योंकि शिक्षा की प्रारम्भिक नींव घर और परिवार से ही है । अगर परिवार से सही शिक्षा और सोच प्राप्त नहीं हो सकता तो व्यक्तित्व विकास नहीं हो सकता । अगर स्कूली शिक्षा सही और मजबूत होती है तो विद्यार्थी मेधावी और प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं । आज स्कूली शिक्षा बहुत ही कमजोर अवस्था में है । कुछ अपवाद को छोड़ प्रायः सभी सरकारी स्कूल एवं समग्र शैक्षिक संस्थाओं की अवस्था दयनीय है । जब तक स्कूली शिक्षा मजबूत नहीं होगी, तब तक यूनिवर्सिटी शिक्षा भी मजबूत नहीं हो सकती ।
सही सोच की आवश्यकता
हमारे यहां अधिकांश की मानसिकता यथास्थितिवादी है– न करो, न करने दो । विशेषतः उच्च तह में रहे जिम्मेवार लोगों में निर्णय क्षमता का अभाव है । इसतरह का अनुभव मेरे जीवन में भी हुआ है । अनेक घटनाओं में से दो घटना उल्लेख करना चाहता हूँ, जो हमारी कमजोर मानसिकता को दर्शाता है । लेकिन मैं उन लोगों का नाम उल्लेख करना नहीं चाहता ।
सन् १९९८ साल की बात है । वातावरण और कृषि संबंधी अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन काठमांडू में हो रहा था, उसका नेतृत्व मैं ही कर रहा था । मैं त्रिभुवन विश्वविद्यालय में होने कारण कार्यक्रम में विश्वविद्यालय का भी सहकार्य रहा था । कार्यक्रम की भव्य तैयारियां हो रही थी । बानेश्वर स्थित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन केन्द्र (आज का संसद् भवन) में कार्यक्रम का उद्घाटन होनेवाला था । हम लोगों ने तत्कालीन राजा स्व. वीरेन्द्र शाह को प्रमुख आतिथ्यता ग्रहण और कार्यक्रम उद्घाटन के लिए अनुरोध किया । उन्होंने स्वीकार भी किया । विज्ञान और अनुसंधान के लिए उस समय यह एक महत्वपूर्ण और बहुत बडी घटना भी थी ।
इकोलोजीसोसाइटी ऑफ अमेरिका के प्रेसिडेन्ट एवं अन्य २२ देशों के वैज्ञानिक सम्मेलन में सहभागी हो रहे थे । प्रमुख वक्ता के रूप में डा. टोनी हेगन थे । लेकिन पता चला कि दो उच्च पदस्थ व्यक्ति को उद्घाटन कार्य स्वीकार्य नहीं हो सका । वे लोग दो अलग–अलग निकाय (एकेडेमिक फिल्ड) के उच्चपदस्थ पदाधिकारी थे, जो मेरे से पदीय दृष्टिकोण से भी उच्चस्थान में थे । उन लोगों ने राजा वीरेन्द्र को कार्यक्रम में सहभागी होने के लिए दरबार में प्रयास किया । इसके पीछे का कारण अप्राज्ञिक सोच की थी । उन लोगों को लगा होगा कि अगर राजा वीरेन्द्र कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे तो कार्यक्रम सफल होगा, इसकी चर्चा होगी । राजा वीरेन्द्र और रानी ऐश्वर्या कार्यक्रम में आए और उद्घाटन हुआ ।
एक अन्य घटना भी बारबार स्मरण हो जाती है । सन् १९८५ की बात है । एमएसी गोल्ड मेडलिस्ट विद्यार्थी ने मेरे सुपरीवेक्षण में विद्यावारिधि करने का आवेदन किया । उस विद्यार्थी को आईएफएस परियोजना में पूर्णकालिक वेतन एवं सुविधाएं भी उपलब्ध थी । लेकिन उसका पीएचडी रजिष्ट्रेशन अप्राज्ञिक सोच के कारण नहीं हो पाया । बाद में वह विद्यार्थी त्रिवि में स्थायी नियुक्ति पाकर सहायक प्राध्यापक हो गए और पुनः विद्यावारिधि के लिए आवेदन दिए । दूसरी बार भी उसका रजिष्ट्रेशन नहीं किया । आज वह विद्यार्थी प्राध्यापक है ।
इस प्रकार के निषेधात्मक सोच ने विश्वविद्यालय और देश का काफी अहित हुआ है । अभी भी अयोग्य व्यक्ति जब किसी पद पर आसीन होते हैं तो इस प्रकार के नकारात्मक मानसिकता हावी रहती है । ऐसी परिस्थिति में संघर्ष का समय लम्बा हो जाता है ।
मैंने शुरु से ही एक रास्ता तय कर लिया था । उसी में निरन्तर बिना विचलन चलता रहा । मैं स्वभाव से प्रजातान्त्रिक विचार और संस्कार से प्रभावित हूँ । लेकिन राजनीति से दूर रहा हूँ । इसका मुझे लाभ भी मिला है । हरेक राजनैतिक पार्टी के प्राध्यापको से मेरा अच्छा संबंध रहा है । तुलानात्मक रूप में मैं देखता हूँ तो मुझे काफी सफलता और सहयोग मिली है । हां, जब आप ४०–४५ साल किसी भी संस्था में काम करते हैं तो वहां कुछ घटनाएं तो होती ही है ।
इसीतरह सामान्यतः मैं अपने विचार पर अडिग रहता हूँ । जो विचार मेरे लिए ठीक लगेगा, मैं वही करता हूँ । अनुशासन में रहना, प्रिय बोलना, जिम्मेदारी का ध्यान रखना मेरी कुछ आदत हैं ।
अन्य क्षेत्र में रुचि
मैं प्राज्ञिक क्षेत्र से जुड़े हुए व्यक्तियों में से हूँ । युनिवर्सिटी में अध्यापन और अनुसंधान ही मुख्य जिम्मेदारी होती है । थोड़ी–बहुत सामाजिक कार्य   दिलचस्पी है । लेकिन वह भी प्राज्ञिक क्षेत्र से जुड़े हुए सामाजिक कार्य में ही सीमित रहता हूँ । हां, जैसे–जैसे आदमी की जिम्मेदारी बढ़ती है, उसके बाद उसको समाज और समुदाय के लिए भी कुछ करना चाहिए । मैं प्राज्ञिक क्षेत्र से वही कर रहा हूँ । वातावरण संरक्षण से जुड़े विषयों पर विशेष सहभागिता रहती है ।
सर्वोच्च अदालत में उपस्थिति
एक विशेष घटना का उल्लेख भी उचित रहेगा । नेपाल सरकार ने वातावरण संरक्षण ऐन २०५४ प्रारम्भ किया । लेकिन उसके प्रावधानों का वातावरण मन्त्रालय ने ही पालन नहीं किया । इससे क्षुब्ध होकर प्रोपब्लिक नामक संस्था (जिसका मैं बाद में अध्यक्ष भी रहा) ने वातावरण मन्त्रालय पर सर्वोच्च अदालत में मुकदमा कर दिया । न्यायाधिशों को वातावरण संबंधी प्राविधिक जानकारी के लिए सर्वोच्च अदालत में विशेषज्ञ के रूप में मुझे उपस्थित होना पड़ा । मैंने तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई । और उस जानकारी के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने वातावरण मन्त्रालय को कानून के प्रावधान लागू करने का निर्देश दिया । शायद विशेषज्ञ का नाम सहित निर्णय की यह पहली घटना थी । जीवन में वही पहली और अंतिम घटना है, जहां मुझे न्यायालय (अदालत) का अनुभव हुआ ।
डा. टोनी हेगन से प्रभावित
डा. टोनी हेगन का नाम नेपाल में सर्वविदित ही है । वह प्रथम विदेशी थे, जिन्हें काठमांडू से बाहर बेरोक–टोक जाने की छूट थी । वे १९५० में नेपाल में भू–गर्भविद् के रूप में आए थे । यहां रहकर उन्होंने विभिन्न रूप में नेपाल का भू–गर्भ का अध्ययन–अनुसंधान किया । अनुसंधान के दौरान १९५० से १९६० तक उन्होंने १४ हजार कि.मी. की यात्रा की । वे बाद में विकासवादी और अंत में मानवतावादी के रूप में विख्यात हुए । उनका योगदान नेपाल में अतुलनीय रहा है । उन्हें मानव नागरिकता के साथ ही विभिन्न सम्मान से सम्मानित किया गया है ।
डा. टोनी हेगन से मेरी पहली मुलाकात सन् १९९३ में हुई थी । तब से उनके मृत्यु (२००३) ना होने तक अत्यन्त गहरा संबंध रहा । उनसे मुझे काफी सीखने को मिला । वे एक सिद्धान्तवादी प्रजातान्त्रिक विचारधरा के थे, साथ में नेपाल के प्रति अत्यन्त प्रेम रखनेवाले व्यक्ति थे । युवाओं के प्रति उनकी विशेष आस्था और विश्वास थी । वह युवाओं में लोकतान्त्रिक संस्कार देखना चाहते थे । उनकी पुस्तकें नेपाल के लिए एक मार्गदर्शक है । मैं तो कहता हूं कि ‘नेपाल– द हिमालय किंगडम’ से लेकर ‘विकेन्द्रीकरण और विकास ः प्रजातान्त्रिक सिद्धान्त’ नामक पुस्तक सभी को पढनी चाहिए । इस पुस्तक में नेपाल का इतिहास, संस्कृति, परिस्थिति आदि की चर्चा करते हुए विकास संबंधी मन्त्र भी दिए गए हैं । डा. टोनी हेगन के जीवनकाल में ही टोनी हेगन फाउण्डेशन गठन हुआ । जिसके पहला अध्यक्ष प्रा.डा. नवलकिशोर राई थे । ४ वर्ष पहले मुझे इस फाउण्डेशन का अध्यक्ष बनाया गया । इस फाउण्डेशन के द्वारा प्राज्ञिक सभा–सम्मेलन, स्कॉलरशिप, समाज सेवा, यूथ पार्लियामेन्ट आदि कार्य हो रहे हैं ।
मेरी मान्यता है कि प्रजातन्त्र सिर्फ प्रणाली ही नहीं, संस्कार भी है, उसको आत्मसात् करना जरूरी है । टोनी हेगन फाउण्डेशन द्वारा संचालित कार्यक्रम का उद्देश्य भी यही है । किसी भी विषय में कैसी नीति होनी चाहिए ? इसके बारे में युवा एवं विद्यार्थी सोचें और विमर्श करें । और इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क किस तरह किया जाए ? इन सारे प्रश्नों में केन्द्रीत रहकर फाउण्डेशन की ओर से युवाओं के बीच ‘यूथ–पार्लियामेन्ट’ संचालित किया जाता है । एक सिटिङ में ४० से ५० विद्यार्थियों की सहभागिता रहती है । जनकपुर, काठमांडू, पोखरा जैसे प्रमुख शहरों में फाउण्डेशन ने कार्यक्रम किया है । अलग–अलग स्थान पर अलग–अलग विषयों में कार्यक्रम करते हैं और स्थानीय युवाओं को ही सहभागिता कराते हैं ।
धर्म सिर्फ पूजापाठ ही नहीं
मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ, आस्तिक हूँ । लेकिन हमारे यहां अध्यात्म को पूजापाठ से जोड दिया गया । मैं पूजापाठ कम ही करता हूँ । अध्यात्म के प्रति अधिक ज्ञान नहीं है, सभी धर्म और धार्मिक समुदाय को समान रूप से देखता हूँ । मैंने बाल्यकाल में एक संस्कृत श्लोक पढ़ा है, जो पिता जी ने भी बारबार सम्झाया था और पढ़ाया था–
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्
अर्थात् व्यास जी ने कहा है कि परोपकार से बड़ा कोई पुण्य नहीं है और दूसरों को दुःख देने से बड़ा कोई पाप भी नहीं है । मेरी अध्यात्म इसी सोच में सीमित है । जहां तक धर्म की बात आती है, मैं हिन्दू धर्म का हूँ । हिन्दू धर्म के अन्दर जो भी पर्व–त्योहार (दशहरा, दिवाली) आता है, उसमें पूजापाठ भी करता हूँ । लेकिन मुझसे ज्यादा मेरे परिवार के लोग करते हैं । पर्यटक के रूप में हर धर्म के बड़े–बडेÞ मन्दिर, मस्जिद और चर्च में मैं पहुँच चुका हूँ । हर धर्म का सम्मान करता हूँ और अपने धर्म के प्रति किसी भी प्रकार की नकरात्मकता नहीं रखता हूँ ।
मानव जीवनः एक अमूल्य उपहार
६५ साल से ऊपर हो चुका हूं । आज भी सक्रिय जीवन जी रहा हूँ और आनेवाले दिनों में भी सक्रिय ही रहूंगा । मेरे खयाल में जीवन एक अमूल्य उपहार है । बिना रचनात्मक होकर मानव जीवन नहीं जी सकते । रचनात्मक और सकारात्मकता में ही मानव जीवन का अर्थ अन्तरनिहित है । आज हम लोगों को जो जीवन मिला है, उसको सही सदुपयोग करना चाहिए, इसी में जीवन की सार्थकता है । ‘जीवन’ भगवान का आशीर्वाद ही है ।
परिवारिक सुख–शान्ति महत्वपूर्ण
पारिवारिक जीवन में सुख और शान्ति रहती है तो व्यक्तिगत जीवन में भी सुख और शान्ति मिलती है । सुख और शान्ति के लिए आपके चारों तरफ क्या है, इसका मायने बाद में रहता है । सबसे पहले तो आपके पारिवारिक वातावरण सुखद और शान्त होना चाहिए । आपके परिवार के अन्दर माता–पिता, पति–पत्नी, बेटा–बेटी जो भी हैं, वे लोग खुश हैं कि नहीं हैं ? वे लोग खुश हैं और उनका जीवन सही रास्ते पर जा रहा है तो आप का जीवन भी सुखद रहेगा । ऐसी अवस्था में बाहरी दुनिया का कोई भी दुष्परिणाम आप को दुखित नहीं बना सकता । अगर बाहरी दुनिया सुखद है और आपका पारिवारिक माहौल दुखद है तो आपका जीवन सुखद् नहीं रहेगा । इसीलिए सुख और शान्ति के लिए पारिवारिक सुख और शान्ति बनना जरुरी है । जितनी भी पद–प्रतिष्ठा और सम्पत्ति प्राप्त हो, अगर आपके घर के अन्दर सुख–शान्ति नहीं है तो आप सुखद जीवन नहीं जी पाएंगे ।
व्यक्तिगत रूप में जीवन के प्रति कोई भी शिकायत नहीं है । मैंने जितना चाहा, उतना पाया । जितना पाया, उससे ज्यादा मैंने कभी सोचा नहीं । जितना करना चाहा, मैंने किया । वैसे तो काम करने की कोई सीमा भी नहीं है, लेकिन नेपाल में रहकर अपने क्षेत्र (वनस्पति विज्ञान) में मैंने जो किया, वह ऐतिहासिक भी है । विज्ञान और प्राज्ञिक क्षेत्र में जो भी महत्वपूर्ण पुरस्कार है, वह मुझे मिल चुका है । इसीलिए मैं जीवन और अपनी सफलता के प्रति सन्तुष्ट हूँ ।
आजकल
सामान्यतः सुबह ६ बजे के आसपास उठता हूँ । मर्निङवाक में अनियमितता है । १०–११ बजे के बाद मेरा सक्रिय जीवन प्रारम्भ होता है । प्रोफेसर इमेरिटस के रूप में मुझे दैनिक डिपार्टमेन्ट (त्रिवि) जाने की बाध्यता नहीं है । तब भी प्रायः त्रिभुवन विश्वविद्यालय में ही रहता हूँ । विद्यावारिधि एवं एमएससी विद्यार्थियों का शोध निर्देशन करता हूँ । उसके अलावा विभिन्न संघ–संस्थाओं की ओर से आयोजित मीटिङ–गोष्ठी–सेमिनार आदि में सहभागी होता हूँ । नास्ट, टोनी हेगन फाउण्डेशन एवं कुछ संघ–संस्थाओं से आज भी प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष संलग्न हूँ । उसके बाद जो समय बच जाता है, पढ़ने–लिखने में बीत जाता है । पहले–पहले मैं रात देर तक काम करता था । लेकिन आज उसतरह देर रात तक नहीं रहता ।
आज मेरे परिवार में श्रीमती रेणु झा, एक बेटा और बहु, एक बेटी और दामाद हैं, सभी लोग डाक्टर हैं । सब लोग अपने–अपने क्षेत्र में तरक्की कर रहे हैं । बेटा पियुष झा और बहू बविता झा आस्ट्रेलिया में हैं । बेटी प्रज्ञा और दामाद साकेत झा काठमांडू में ही हैं । सबका जीवन सुखद् है । मेरा एक पौत्र प्रणय और नाती दर्शन है । दोनों ही मेरे अच्छे साथी है । सुखी जीवन के लिए इतना पर्याप्त है ।
अन्त में
व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र की अपनी क्षमता और सोच होती है । व्यक्ति आता है, जाता है । समाज और राष्ट्र लम्बे समय तक रहते हैं । दीर्घायु के लिए अच्छी सोच, स्वास्थ्य और प्रगति की जरुरत रहती है । राष्ट्र में प्रचुर सम्पदा और सम्भावनाएं है, आवश्यकता है– सही नेतृत्व की । आशा करता हूँ– युवा पीढ़ी आनेवाले दिनों में महत्वपूर्ण योगदान देगी ।

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