Sun. Jul 12th, 2020

*हांडी  वाला रसगुल्ला* : राजेश कुमार सिंह “राजेश”

(आज से चालीस बर्ष पूर्व की घटना पर आधारित कहानी, स्थान एवं पात्र के नाम परिवर्तित है  )
शाम ढलने को थी । रोज क़ी तरह रामसूरत  आज भी आ गया था । नमस्ते डाक्टर साहब ! ..चंद्रेश कहाँ है ? आजाओ  बेटा अंदर आ जाओ । नही अम्मा , मेरे  पैर बहुत गंदे  हैं  । कोई बात नही बेटा , तुम भी तॊ मेरे बेटे के ही समान हो ।
  अम्मा,  क़ी आंखो से माँ क़ी ममता झलक रहा था ।
राम सूरत  क़रीब ढाई कोस यानि साढ़े सात किमी दूर  अपने गांव से प्रतापपुर  कस्बे मेंं आया था । रामसूरत  एक गरीब घर का बालक था , जिसके माँ बाप थोड़ी बहुत खेती औऱ मजदूरी करते थे , लेकिन अपने बेटे को पढाना चाहते थे । चंद्रेश औऱ रामसूरत  दोनो अभिन्न मित्र थे औऱ प्रतापपुर से क़रीब सात किमी दूर पुष्पनगर के एक प्रतिष्ठित इण्टरकालेज मेंं एक ही क्लास मेंं पढते थे । चंद्रेश के पिता जी प्रतापपुर के पशु चिकित्सालय मेंं चिकित्सक  थे ।
     बेटा !  बाहर आंगन मेंं पडी तक्थ  पर बैठ कर  पढ़ाई करो,  तब तक मै खाना बनाती हूँ । रामसूरत  ने लालटेन के शीशे को चूने से अच्छी तरह पोछा औऱ औऱ  जला दिया । अब दोनो के बीच जल रही लालटेन किसी पेट्रोमैक्स से कम नही थी । दोनो पढ़ाई मेंं मशगूल थे । रामसूरत के घर मेंं लालटेन नही थी औऱ मन मेंं पढ़ाई की उत्सुकता लालटेन की तरह प्रज्वलित हो रही थी । चंद्रेश की दोस्ती औऱ अम्मा का प्यार ,रामसूरत को अपने गांव से  खीच कर लाता था ।
    अम्मा ने छोटी छोटी दो कटोरिया मेंं थोड़ी थोड़ी सब्जी निकाली  औऱ बड़े थाली मेंं कुछ रोटियां रखते हुए बोली , पहले तुम लोग खाना खा लो फिर पढ़ाई करना । दोनो ने एक  एक रोटी उठाई औऱ खाना खाना शुरू कर दिया । रामसूरत  खाना खाते हुए , ठहाके के साथ बोला , अरे चंद्रेश अम्मा की बनाई सब्जी मेंं जो स्वाद है वह स्वाद तॊ रामप्रसाद हलवाई के चाट मेंं भी नही था जो  तुमने परसों मुझे खिलाई थी ।
      हर दिन की तरह आज भी सायकिल की घंटी घनघनाई । घंटी की आवाज सुनकर  चंद्रेश भी सायकिल लेकर बाहर आगया । रामसूरत  पहले से बाहर खड़ा था । दोनो मित्रों ने आंखो आंखो मेंं एक दूसरे का अभिवादन किया औऱ तेजी से कालेज की ओर चल दिये ।
   रोज की तरह आज भी रामसेवक ने सफेद कमीज औऱ पैजामा पहना हुआ था । चंद्रेश के पिता जी जो पशुओ के डाक्टर थे , वे अस्पताल मेंं बैठ गये थे ।
   अस्पताल के सीढ़ियों से उतरते हुए सुबोध  ने रामसूरत के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला , अरे रामसूरत  ! पढ़ाई लिखाई कैसी चल रही है ?  राम सूरत  सहमे हुए आवाज मेंं बोला , जी सुबोध  भईया सब ठीक चल रही है ।
  सुबोध, ठिगने कद का एक कुटिल व्यक्ति था और  चंद्रेश के पिता जी के अस्पताल का एक मुलाजिम भी था ।  वह डाक्टर साहब औऱ अम्मा को ऊपर से दिखाने के लिऐ आदर देता लेकिन भीतर ही भीतर जड़  काटने को तैयार रहता था । रामसूरत का डाक्टर साहब के घर आना जाना उसे बिल्कुल ही अच्छा नही लगता था , क्योकि एक गरीब बालक को डाक्टर साहब के घर मेंं जो बेटे जैसा प्यार मिलता था , इसे देख कर सुबोध जल भून जाता था ।
  वैसे तॊ रामसूरत औऱ चंद्रेश दोनो ही कुशाग्र बुद्धि के छात्र थे , लेकिन राम सूरत कु़छ ज्यादा मेधावी  था । रामसूरत गणित विषय के साथ इंटर कर रहा था औऱ चंद्रेश जीव विज्ञान का छात्र था ।
   पिछ्ले साल जब राम सूरत ने हाई स्कूल की परीक्षा दी थी , तॊ साथ ही साथ पालीटेक्निक की भी प्रवेश परीक्षा दी थी औऱ उसका सिविल इंजीनियरिंग के लिऐ सलेक्शन हुआ था औऱ उसने यह बात सुबोध से सबसे पहले बताई थी । लेकिन सुबोध के ठहाके ने उसके खुशी औऱ इरादे दोनो बदल दिये थे । सुबोध ने कहा था कि तुम्हारे पास जो क्षमता है तुम डायरेक्ट इंजीनियर बन सकते हो । उस वक्त रामसूरत ने अपना इरादा बदल दिया था , औऱ अब वह इंटर की पढ़ाई औऱ रुड़की इंजीनियरिंग के प्रवेश की तैयारी, दोनों ही  मन लगा कर रहा था । इंटर की फाइनल परीक्षाए होने वाली थी । पुष्पनगर इंटरव्यू कालेज का सेन्टर हरिकेशपुर  इंटर कालेज मेंं पड़ा था । डाक्टर साहब ने चंद्रेश , रामसूरत औऱ सुबोध तीनों को अपने कमरे मेंं बुलाया औऱ सुबोध की तरफ मुखातिब होते हुए बोले ..बेटा सुबोध ! इन दोनो को अपने सेन्टर पर रुक कर परीक्षा देनी है । आपको भी इनके साथ सेन्टर पर रुकना होगा औऱ इन लोगों की खाने , रहने औऱ पढ़ने की व्यवस्था करनी होगी, जो कि तुम अच्छी तरह से कर सकते हो ।
मुझे तुम पर पूरा भरोसा है । डाक्टर साहब की बातों मेंं सुबोध के प्रति प्यार औऱ आदेश का भाव परिलक्षित हो रहा था ।
  अपनी कुटिल मुश्कान के साथ सुबोध ने अपना सिर हिलाते हुए सहमति जताई । अब सुबोध को अपने कुटिल गुणो को प्रदर्शित करने का अच्छा अवसर मिल गया था ।
  लाल बहादूर के मकान मेंं एक  कमरे का बढिया बंदोबस्त डाक्टर साहब ने कर दिया था । अम्मा ने भी कुछ राशन पानी , मिट्टी के तेल वाला स्टोव , कई  किस्म के छोटे बड़े बर्तन,  गिलास कटोरी आचार आदि दे दिया था ।
   सभी  हरिकेशपुर आ गये थे ।  कमरे मेंं सारे सामानों को बड़े सही ढ़ंग से सेट कर दिया गया । राम सूरत ने स्टील का एक बड़ा डिब्बा खोला , चहकते हुए बोला कि अरे वाह !  अम्मा ने मेरे लिऐ मेरा पसंदीदा खुरमा भी भेजा है। यह बात सुबोध को चुभ गईं औऱ उसने तपाक से बोला,  अच्छा अब तुम्हे भी खुरमे का स्वाद समझ मेंं आने लगा है । उसकी इस बात को सुनकर  थोड़ी देर के लिऐ रामसूरत उदास सा हो गया था ।
   आज हरिकेशपुर सेन्टर पर तीनों की पहली रात थी । सुबोध ने पहले दिन सबका खाना बड़े ही मन से बनाया और एहसास जताते हुए बोला कि डाक्टर साहब का हमारे ऊपर बहुत एहसास है , यही कारण था कि मै अपने बिजी समय मेंं से समय निकाल कर यहाँ आया हूँ ।
   पिछ्ले दिन हिन्दी का पेपर था । सभी का पेपर अच्छा हुआ । सभी काफी खुश भी थे । आज रात मेंं पूर्वांचल का खास व्यंजन बाटी चोखा बना था । सभी बड़े ही चाव से खा रहे थे, अचानक सुबोध को शरारत सूझी और उसने राम सूरत के सिर पर ठोकते हुए कहा , अबे ये अचार कौन खायेगा ? …. राम सूरत की आंखो मेंं आंसू आ गये  । उसका मन उदास हो गया । उसको उदास देख चंद्रेश भी उदास हो गया था । उस रात चंद्रेश ने भी मन से खाना नही खाया ।
   अगले दिन फिजिक्स का पेपर था । सभी पढ़ने की तैयारी कर रहे थे।
     अरे चंद्रेश !  तुमने मेरी फिजिक्स की नोटबुक देखी है क्या ?  मुझे नही मिल रहा है । यह कहते हुए रामसूरत दहाड़ मार कर रोने लगा । मेरा तॊ कैरियर ही बर्बाद हो गया । गरीबी के मारे रामसूरत बुक नही खरीद सका था । चंद्रेश ने उसके आँसू पोंछते हुए , उसे समझाया , कोई बात नही तुम परेशान मत होओ, मेरे पास बुक और नोटबुक दोनों है, उसी से बारी बारी पढ़ाई कर लेंगे ।
   रामसूरत के चहरे पर चंद्रेश के प्रति एक सच्चे मित्र के लिऐ स्नेह का भाव झलक रहा था । अब वे दोनों पढ़ाई करने लगे ।
    अगले दिन दोनों परीक्षा देने गये । दोनों का पेपर अच्छा हुआ । आज फिर दोनों खुश थे और आपस मेंं चहक चहक कर फिजिक्स के एक्जाम की चर्चा कर रहे थे ।
   इधर सुबोध चिंता मेंं डूबा हुआ था , झल्लाते हुए बड़बड़ा रहा था ।  “मैने उस साले की नोटबुक चूल्हे मेंं डालकर जला दी थी फिर भी उसका पेपर अच्छा हो गया”।
   अब परीक्षा समाप्त हो गई और गर्मियों की छुट्टियाँ भी शुरू हो गईं । इधर एक महीने से अधिक ही हो गये,  रामसूरत डाक्टर साहब के घर नही आया था । रामसूरत ने  अपनी पूर्व योजना के मुताबिक  रुड़की इंजीनियरिंग का फार्म डाला था, और उसकी प्रवेश परीक्षा मेंं शामिल भी हुआ था । बस रिजल्ट आना बाकी था ।
    आज सुबह सुबह रामसूरत चंद्रेश के घर आया।  आते ही उसने अम्मा का पैर छुआ । अम्मा ने उसे प्यार करते हुए अपना हाथ उसके सिर्फ़ पर फेरते बोला बेटा ! आज बड़े  खुश नजर आ रहे हो ?  रामसूरत की आंखो से खुशी के आँसू छलक पड़े और वह बोल पड़ा । “अम्मा ! मेरा चयन रुड़की इंजीनियरिंग के लिऐ हो गया । अब क्या डाक्टर साहब के घर मेंं खुशी का माहौल बन गया,  सब खुश थे  । चंद्रेश और रामसूरत दूसरे कमरे मेंं मस्ती करते हुए बतियाये जा रहे थे ।
   बस एक व्यक्ति दुखी हो गया,  वह था सुबोध । सुबोध को यह खुशी नही सुहा रही थी लेकिन बनावटी मुश्कान के साथ वह कमरे मेंं घुसा ।
    आज फिर रामसूरत इस मुद्दे पर भी सुबोध से सलाह लेने से नही चुका और पूछ बैठा । सुबोध भईया कैसा रहेगा यह । हमें क्या करना चाहिए ? इस बार सुबोध  वहां कुछ भी नही बोला और रामसूरत को लेकर हरी मिस्त्री की दुकान की तरफ बढ़ गया ।
    देख रामसूरत !  तुम्हें पता है रुड़की इंजीनियरिंग की फीस और खर्च क्या है,  कुल बीस हजार ।  तुम्हारे पिता जी का सब कुछ बिक जाएगा तब भी तुम पुरी फीस नही भर पाओगे , और अगर तुमने किसी तरह से ऐडमिशन ले भी लिया तॊ तुम कहीं के नही रह पाओगे ।
    अब रामसूरत सोच मेंं डूब गया था और वह सुबोध के जाल मेंं फंसता हुआ नजर आ रहा था ।
वह यह भूल गया था कि इसी सुबोध ने आज से दो बर्ष पहले उसे रुड़की इंजीनियरिंग की बात कह कर पालीटेक्निक मेंं प्रवेश लेने से रोक दिया था ।
   सुबोध का दांव सही पड़ गया और रामसूरत ने रुड़की इंजीनियरिंग को छोड ,जनपद मुख्यालय  स्थित  नेशनल डिग्री कालेज मेंं बी एस सी (मैथ्स) मेंं एड्मिशन ले लिया । इधर चंद्रेश ने अपना  एड्मिशन लखनऊ के एक प्रतिष्ठित  कालेज मेंं बी एस सी (जीव विज्ञान) मेंं करा लिया ।
    करीब एक साल से अधिक का समय बीत गया । चंद्रेश और रामसूरत एक दूसरे से नही मिले । प्रतापपुर  मेंं अब डाक्टर साहब , अम्मा , चंद्रेश का छोटा भाई और सुबोध रहते थे । सुबोध अपने मिशन मेंं कामयाब हो  जश्न मना रहा था ।
    आज डाक्टर साहब अपने आफिस मेंं बैठे हुए थे और अम्मा आफीस से सटे अपने कमरे मेंं थी । सुबोध भी डाक्टर साहब के कमरे के बगल वाले कमरे मेंं बैठा कु़छ लिख पढ रहा था । अचानक एक छोटे कद का नौजवान हल्के आसमानी रंग का सूट और नीले रंग की टाई लगाए हुए डाक्टर साहब के कमरे मेंं दाखिल हुआ । उसके हाथों मेंं दो हंडिया थी जिसमें रसगुल्ले थे । प्रतापपुर  मेंं रामप्रसाद हलवाई का हंडिया का रसगुल्ला बहुत फेमस था।
   रामसूरत को देख कर डाक्टर साहब एक बार नही पहचान पाये , लेकिन अगले क्षण खुशी से बोल पड़े , अरे चंद्रेश की अम्मा ! आओ देखो , आज बहुत दिन बाद अपना रामसूरत आया है।
    अम्मा ने रामसूरत को अपने गले लगा लिया , अब दोनों के आंखो से आँसू की बूंदे टपक कर कंधे को गीला कर रही थी । कंधे पर सिर रखे रखे रामसूरत बोला , अम्मा ! मेरा सलेक्शन भाभा एटामिक सेन्टर मेंं असिस्टेंट साइण्स्टिस्ट पद पर हो गया है । मैने तीन महीने जॉइन भी कर लिया है । अभी पहली छुट्टी पर घर आया,  तॊ सबसे पहले आप से  मिलने चला आया ।
यह कहते हुए उसने एक हांडी  की मिठाई अम्मा को पकडा दी ।
  सुबोध दरवाजे के पास खड़े हुए यह सब देख रहा था ।  सच मेंं उसे  यह सब विश्वास नही हो रहा था । तभी रामसूरत की नजर सुबोध की तरफ गई और वह दौड़ता हुआ सुबोध के पास पहुचा । एक हांडी की मिठाई को सुबोध के हाथों मेंं थमाते हुए बोला ।
सुबोध भईया ! आपका मुझपर बहुत बड़ा एहसान है ,जो मै यहाँ तक पहुचा । अगर आप नही होते तॊ मै एक जूनियर इंजीनियर  बन कर नहर की पटरी पर मिट्टी डलवाता ही रह जाता । आज जब सुबोध ऐसे बोल रहा था तब , सुबोध के चेहरे पर ग्लानि का भाव झलक रहा था और वह खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा था ।
राजेश कुमार सिंह “राजेश”
, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
लेखक …
राजेश कुमार सिंह “राजेश”
, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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1 thought on “*हांडी  वाला रसगुल्ला* : राजेश कुमार सिंह “राजेश”

  1. बहुत सुंदर कहानी, मार्मिक है, सत्य कथा है इसलिए दिल को छू रही है । राजेश जी ने अपनी लेखन शैली से कहानी को मनन योग्य पाठ्य बनाने का सफल प्रयोग किया है । कभी कभी नकारात्मक लोगो की नकारात्मकता भी सकारात्मक हो जाती है, बस आपको अपना लक्ष्य और सोच सकारात्मक रखनी है ।
    राजेश जी आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं ।

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