नारी–जीवन -अर्चना झा
हिमालिनी अंक नवंबर 2019 |नारी एक जीवन नहीं जीती है बल्कि दो जीवन जीती है । पुरुष तो एक जिन्दगी जीता है । लेकिन नारी तो दो जीवन जीती है । एक जीवन अपने पिता के घर और दूसरा जीवन पति के घर । उसे संस्कृति में मेल करना पड़ता है । उसे दो सभ्यताओं मे मेल करना पड़ता है । उसे कई सम्बन्धों को अपना बनाना पड़ता है । इसलिए नारी को एकदम सम्भल कर जीना चाहिए । नारी के लिए मायके का व्यवहार अलग है और ससुराल का अलग । यदि दोनों को जोड़ने की कला आती है तो नारी के पास शक्ति है । यह शक्ति पुरुष के पास नहीं होती है । नारी ही है जो दो सभ्यता, सस्कृति को मेल कराने की शक्ति रखती है । नारी ही है जो इस पृथ्वी पर एक बार में दो जन्म जीती है । यह नारी के वश की बात है पुरुष के नहीं ।
कई रिश्तों को जीती है और उसका निर्वाह करती है । नारी घर को स्वर्ग बना सकती है और नरक भी । परिवार को चलाने में उसकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है । पुरुष कमाते हैं यह उनका दावा है और इसकी वजह से वो जब बाहर से घर आते हैं तो उन्हें सब बैठे बैठे मिलना चाहिए । कमाती तो आजकल औरत भी है पर उसे बाहर से आकर घर का काम करना होता है । अगर उसने नही किया तो फिर ताना सुनना पड़ता है । देवी के दर्शन के लिए मंदिरों में घंटो धैर्य के साथ इंतजार करते हैं पर घर में जो घर को मंदिर बनाती है उसकी परवाह नहीं करते हैं । अगर घर को मंदिर समझ लें तो घर में ही स्वर्ग मिल जाएगा बाहर भटकने की जरुरत नही होगी । हम अच्छे कर्म करे अच्छा व्यवहार करें और अच्छा स्वभाव बनाएँ तो हमारा नसीब बदल जायेगा ।
एक कथा है, एक कुम्हार चिलम बना रहा था चिलम बनाते–बनाते उसके मन मे न जाने क्या विचार आया की उस चिलम को तोड दिया और फिर से मिट्टी में मिला दिया मिट्टी ने पूछा कुम्हार भाई तु तो चिलम बना रहा था, बनाकर क्याें तोड़ दिया ? कुम्हार ने कहा बहन मेरा मन, बुद्घि, दिमाग बदल गया । मैं इस मिट्टी से चिलम नही बनाऊँगा इस सुन्दर मिट्टी से सुराही बनाने का प्रयास करूँगा । सुराही बहुत खुश हुआ बोला, कुम्हार भाई तुम्हें बहुत धन्यवाद तूने चिलम को सुराही बना दिया । अरे कुम्हार भाई तेरी मति तो बदला मेरी जिन्दगी बदल गई । चिलम बनती तो खुद भी जलती और चिलम के साथ–साथ तम्बाकु अफीम गांजा आदि को जलाती और पीने वालो को भी जलाकर खाक कर देती कुम्हार भाई मुझे चिलम से सुराही बना दिया अब से खुद भी ठ०८ा पानी पियूँगी और हजारों की प्यास को बुझाऊँगी तुमने मेरी जिन्दगी सँवार दी । एक कुम्हार शराब की प्याली बनाता है और पूजा का दीपक भी एक का प्रयोग कर फेक दिया जाता है दूसरा पूजा के स्थल पर रखा जाता है ।
बस ऐसे ही अभिभावक कुम्हार ही होते हैं जो अपने बच्चे का गढते हैं । सिखाए गए अच्छे कर्म ही बच्चों को समाज में उच्च स्थान प्रदान करते हैं । इन सबमें माता का दायित्व सबसे अधिक होता है क्योंकि बच्चे माँ के ज्यादा करीब होते हैं । इसलिए एक औरत ही परिवार, देश, समाज को अच्छा नागरिक दे सकती है ।
जहाँ तक औरत की जिन्दगी का सवाल है तो उसकी जिन्दगी रेल की पटरी नहीं है जो एक निश्चित दिशा की ओर चलती रहे । उसकी जिन्दगी में लगातार उतार चढाव आते रहते हैं । और इन सबके बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए वह अपने घर को संभालती रहती है । पर सामान्यतया उसकी कदर कम होती है । इसलिए उसकी कदर कीजिए जिस पर घर टिका है । अतीत से लेकर आज तक नारी की स्थिति बदलती रही है । देवी का सिर्फ नाम है पर उसे देवी नहीं इंसान मानिए और उसे उसके हिस्से का आसमान दीजिए ।
पृथ्वी सी सहने की शक्ति है नारी में,
दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती,
गंगा का स्वरूप है नारी
पितृसत्तात्मक सोच हटाओ,
नारी का सम्मान करो सम्मान पाओ ।
नारी के पास सृजन करने की शक्ति है,
नारी कमजोर नहीं है
हर नारी दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा का रूप है ।।

