Tue. Jul 14th, 2020

यही तो है मेरा प्यार जो मुझे बाँधता है, तुमसे अनंत जन्मों की अनंत डोर से : संजय कुमार सिंह

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प्रेम ! जिससे जीवन की शुरुआत है और जिसमें जीवन का अ‌ंत भी । जाे सुख भी है, दुख भी . जहाँ मिलन भी है और विरह भी . जाे अथाह भी है और उथला भी . जाे समर्पण भी है और प्राप्ति भी . जाे व्याख्या भी है और सार भी । प्रेम के इन्हीं भावाें काे समेटती हुई कविता है संजय सिंह जी की । शब्दाें और विचाराें के धनी और शब्दाें काे गुम्फन करने की अदुभुत कला के मालिक हैं संजय जी । आइए आपके लिए पेश है इनकी संवेदनाओं से भरपूर प्रेम की  कुछ कविताएँ।

मेरे लिए प्रेम!

प्रेम!
कोई शब्द नहीं प्रिये
अनुभूति के अनंत में व्याप्त आप्त -लोक!
आत्मा की वेदी पर ढुलकते यादों के अश्रु-कण
पूरा आदमी होने का अहसास!
हे सृष्टि के चराचर रूप
तुमको नमन!
फूल-पत्ती, पेड़-पौधे, नदी ,पहाड, झरने
नाना कलरव करते जीव
तुम सबसे अनुरक्त हूँ मैं!
यही तो है मेरा प्यार
जो मुझे बाँधता है तुमसे
अनंत जन्मों की अनंत डोर से
भूल-गलती,आह-आँसू ,पीड़ा-व्यथा और हँसी-खुशी
सब तुम्हारे प्रति अभिव्यक्ति के अथोर भाव
मम से ममेतर तक फैल-पसरा हमारा यह संसार
इसमें एक शब्द की अंतर्ध्वनि प्रेम… दिग् से दिगंत तक!
और कुछ नहीं
और कुछ नहीं!

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अरी ओ अमृता,
कब माँगा मैंने कुछ
जो तुम आज दोगी?
कोई प्रश्न ही नहीं है मेरे अंतर के शिवालय में
न कोई संशय
और न कोई अनंतर कामना
जो मैं कुछ पूछूँ!
खुशबू फूल से
जल मेघ से
और
प्रेम हृदय से
कौन माँगता है,जो मैं माँगू?
प्रिये आत्मा के ये परम अंश
मुझमें, तुझमें और सबमें
अनंत जन्मों से!
कोई माने या न माने
मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
इसलिए परमात्मा की पूरी सत्ता से
फूल से, नदी से, पेड़ से, पंछी से
जिससे जब भी संबोधित हुआ
लगा तुमसे ही, तो कुछ कह रहा हूँ
तुम्हें कोई एक नाम कैसे दूँ कलाकांता?

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प्रेम!

प्रतीक्षा के पाट पर
हृदय के घाट पर
अजन्ता-एलोरा के भीत्ति-चित्रों में
सदियों से
वह कौन है
देहरी पर दीप लिए
आँखों में सपनों का सीप लिए
वेदना के अथोर जल में
इच्छाओं का अंतरीप लिए?
क्या तुम जानती हो सुमन्या ?
क्या कहा प्रेम?
हाँ ,प्रेम!
युग-संधि की लालसा से
उन्मीलित
एक शब्द प्रेम!

प्रिये!
कुछ लोग कहते हैं मेरा प्रेम झूठा हैं
कुछ मेरे दुख को भी कहते हैं कल्पित
क्या कहूँ उनसे
पूछते हैंं तुम्हारा नाम-पता
क्या नाम दूँ तुम्हें
शेफालिका
मधुकांता
या अपराजिता?
सब फूलों के नाम हैं
आशा,अभिलाषा,या लालसा कुछ भी कहूँ
सारी अनंत इच्छाओं के नाम-रूप
प्रिये नीलपरी, नीलपंखी या मयूरी भी कहूँगा
तो लोग कहेंगे चिडी-चुनमन
नदी से नीलगिरि पर्वत तक सब तुम्हारे ही तो नाम हैं
तुम्हें नाम और रूप में बाँधाना कितना कठिन है नीलांशी!
तुम्ही कहो न, मैं क्या कहूँ तुम्हें?
मैं तो बस इतना जानता हूँ
कहने के बाद भी जिसे कहा नहीं जा सका
वही तो है प्रेम /अजस्र उन्मेष हृदय के अमृत-कोष का
वही तो परमात्मा ,कण-कण में विद्यमान ज्योति-पिण्ड!
मुट्ठी में बाँधकर मैं किसे दिखाऊँ
निस्सीम मन के आकाश,
बहती हुई अनुभूति की दूध-मिश्री की नदी
और अलकनंदा से आती हवा को
इस बचकानी जिद्द को तुम क्या कहोगी चन्द्रकांता?
प्रेम का कोई व्याकरण नहीं
जिसे परिभाषा में कोई बाँधे
मैं भी नहीं बाधूँगा प्रिये
कोई कितना भी कहे!

 

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संजय कुमार सिंह,
प्रिंसिपल, आर.डी.एस. काॅलेज
सालमारी, कटिहार।

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