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प्रेम का मंत्र देने वाले संतः गुरूनानक देव

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हिमालिनी  अंक  नवंबर  2019 |भारत की पावन भूमि पर कई संत–महात्मा अवतरित हुए हैं, जिन्होंने धर्म से विमुख सामान्य मनुष्य में अध्यात्म की चेतना जागृत कर उसका नाता ईश्वरीय मार्ग से जोड़ा है । ऐसे ही एक अलौकिक अवतार गुरु नानकदेव जी हैं ।

कहा जाता है कि गुरु नानकदेवजी का आगमन ऐसे युग में हुआ जो इस देश के इतिहास के सबसे अंधेरे युगों में था । उनका जन्म संवत १५द्दट में लाहौर से घण् मील दूर दक्षिण–पश्चिम में तलवंडी रायभोय नामक स्थान पर हुआ जो अब पाकिस्तान में है । बाद में गुरुजी के सम्मान में इस स्थान का नाम ननकाना साहिब रखा गया । श्री गुरु नानकदेव संत, कवि और समाज सुधारक थे ।
गुरु नानक देव जी का अवतरण संवत १५द्दट में कार्तिक पूर्णिमा को माता तृप्ता देवी जी और पिता कालू खत्री जी के घर श्री ननकाना साहिब में हुआ । उनकी महानता के दर्शन बचपन से ही दिखने लगे थे ।

उन्होंने बचपन से ही रूढि़वादिता के विरुद्ध संघर्ष की शुरुआत कर दी थी, जब उन्हें ११ साल की उम्र में जनेऊ धारण करवाने की रीत का पालन किया जा रहा था । तब पंडितजी बालक नानकदेव जी के गले में जनेऊ धारण करवाने लगे तब उन्होंने उनका हाथ रोका और कहने लगे— ‘पंडितजी, जनेऊ पहनने से हम लोगों का दूसरा जन्म होता है, जिसको आप आध्यात्मिक जन्म कहते हैं तो जनेऊ भी किसी और किस्म का होना चाहिए, जो आत्मा को बांध सके । आप जो जनेऊ मुझे दे रहे हो वह तो कपास के धागे का है जो कि मैला हो जाएगा, टूट जाएगा, मरते समय शरीर के साथ चिता में जल जाएगा । फिर यह जनेऊ आत्मिक जन्म के लिए कैसे हुआ ? और उन्होंने जनेऊ धारण नहीं किया ।’

गुरू नानकदेव के सत्विचार
अपने अंदर झांके ः गुदेव का मूलमंत्र था कि अंतर मैल जे तीर्थ नावे तिसु बैंकुठ ना जानार लोग पतीणे कछु ना होई नाही राम अजाना, अर्थात सिर्फ जल से शरीर धोने से मन साफ नहीं हो सकता, तीर्थयात्रा की महानता चाहे कितनी भी क्यों न बताई जाए, तीर्थयात्रा सफल हुई है या नहीं, इसका निर्णय कहीं जाकर नहीं होगा । इसके लिए हरेक मनुष्य को अपने अंदर झांककर देखना होगा कि तीर्थ के जल से शरीर धोने के बाद भी मन में निंदा, ईर्ष्या, धन–लालसा, काम, क्रोध आदि कितने कम हुए हैं ।
सब ईश्वर के बंदे ः एक बार कुछ लोगों ने नानक देव जी से पूछा— आप हमें यह बताइए कि आपके मत अनुसार हिन्दू बड़ा है या मुसलमान ।

उन्होंने उत्तर दिया— अवल अल्लाह नूर उपाइया कुदरत के सब बंदेर एक नूर से सब जग उपजया को भले को मंदे, अर्थात सब बंदे ईश्वर के पैदा किए हुए हैं, न तो हिन्दू कहलाने वाला रब की निगाह में कबूल है, न मुसलमान कहलाने वाला । रब की निगाह में वही बंदा ऊंचा है जिसका अमल नेक हो, जिसका आचरण सच्चा हो ।
माता पिता की सेवा करें ः गुरु नानक देव जी जनता को जगाने के लिए और धर्म प्रचारकों को उनकी खामियां बतलाने के लिए अनेक तीर्थस्थानों पर पहुंचे और लोगों से धर्मांधता से दूर रहने का आग्रह किया । उन्होंने पितरों को भोजन यानी मरने के बाद करवाए जाने वाले भोजन का विरोध किया और कहा कि मरने के बाद दिया जाने वाला भोजन पितरों को नहीं मिलता । हमें जीते जी ही मां–बाप की सेवा करनी चाहिए ।

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मन का मैल धोने की सीख ः एक बार नानक जी ने तीर्थ स्थानों पर स्नान के लिए इकट्ठे हुए श्रद्धालुओं को समझाते हुए कहा— मन मैले सभ किछ मैला, तन धोते मन अच्छा न होई, अर्थात अगर हमारा मन मैला है तो हम कितने भी सुंदर कपड़े पहन लें, अच्छे से तन को साफ कर लें, बाहरी स्नान, सुंदर कपड़ों से हम संसार को तो अच्छे लग सकते हैं मगर परमात्मा को नहीं, क्योंकि परमात्मा हमारे मन की अवस्था को देखता है ।

सच्चा सौदा ः उनके एक प्रसंग के अनुसार बड़े होने पर नानकदेव जी को उनके पिता ने व्यापार करने के लिए २० रु. दिए और कहा— ‘इन २० रु. से सच्चा सौदा करके आओ । नानक देव जी सौदा करने निकले । रास्ते में उन्हें साधु–संतों की मंडली मिली । नानकदेव जी ने उस साधु मंडली को २० रु. का भोजन करवा दिया और लौट आए । पिताजी ने पूछा— क्या सौदा करके आए ? उन्होंने कहा— ‘साधुओं को भोजन करवाया । यही तो सच्चा सौदा है ।’

नानक जी ने लोगों को सदा ही नेक राह पर चलने की समझाइश दी । वे कहते थे कि कि साधु–संगत और गुरबाणी का आसरा लेना ही जिंदगी का ठीक रास्ता है । उनका कहना था कि ईश्वर मनुष्य के हृदय में बसता है, अगर हृदय में निर्दयता, नफरत, निंदा, क्रोध आदि विकार हैं तो ऐसे मैले हृदय में परमात्मा बैठने के लिए तैयार नहीं हो सकता है । अतः इन सबसे दूर रहकर परमात्मा का नाम ही हृदय में बसाया जाना चाहिए । सिख अनुयायी इन्हें ‘गुरु नानक’, ‘बाबा नानक’ और ‘नानकशाह’ नामों से संबोधित करते हैं ।
आप का अवतरण उस समय में हुआ था जब धर्म काफी समय से थोथी रस्मों और रीति–रिवाजों का नाम बनकर रह गया था । उत्तरी भारत के लिए यह कुशासन और अफरा–तफरी का समय था । सामाजिक जीवन में भारी भ्रष्टाचार था और धार्मिक क्षेत्र में द्वेष और कशमकश का दौर था । न केवल हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच में ही, बल्कि दोनों बड़े धर्मों के भिन्न–भिन्न संप्रदायों के बीच भी ।
इन कारणों से भिन्न–भिन्न संप्रदायों में और भी कट्टरता और बैर–विरोध की भावना पैदा हो चुकी थी । उस वक्त समाज की हालत बहुत बदतर थी । ब्राह्मणवाद ने अपना एकाधिकार बना रखा था । उसका परिणाम यह था कि गैर–ब्राह्मण को वेद शास्त्राध्यापन से हतोत्साहित किया जाता था । निम्न जाति के लोगों को इन्हें पढ़ना बिलकुल वर्जित था । इस ऊँच–नीच का गुरु नानकदेव पर बहुत असर पड़ा । वे कहते हैं कि ईश्वर की निगाह में सब समान हैं ।

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ऊंच–नीच का विरोध करते हुए गुरु नानकदेव अपनी मुखवाणी ‘जपुजी साहिब’ में कहते हैं कि ‘नानक उत्तम–नीच न कोई’ जिसका भावार्थ है कि ईश्वर की निगाह में छोटा–बड़ा कोई नहीं फिर भी अगर कोई व्यक्ति अपने आपको उस प्रभु की निगाह में छोटा समझे तो ईश्वर उस व्यक्ति के हर समय साथ है । यह तभी हो सकता है जब व्यक्ति ईश्वर के नाम द्वारा अपना अहंकार दूर कर लेता है । तब व्यक्ति ईश्वर की निगाह में सबसे बड़ा है और उसके समान कोई नहीं ।
नानक देव की वाणी में — नीचा अंदर नीच जात, नीची हूं अति नीच।
नानक तिन के संगी साथ, वडियां सिऊ कियां रीस।।
समाज में समानता का नारा देने के लिए नानक देव ने कहा कि ईश्वर हमारा पिता है और हम सब उसके बच्चे हैं और पिता की निगाह में छोटा–बड़ा कोई नहीं होता । वही हमें पैदा करता है और हमारे पेट भरने के लिए खाना भेजता है ।
नानक जंत उपाइके, संभालै सभनाह ।
जिन करते करना कीआ, चिंताभिकरणी ताहर ।।

जब हम ‘एक पिता एकस के हम वारिक’ बन जाते हैं तो पिता की निगाह में जात–पात का सवाल ही नहीं पैदा होता ।
उन्होंने समाज को बताया कि मानव जाति तो एक ही है फिर यह जाति के कारण ऊंच–नीच क्यों ? गुरु नानक देव ने कहा कि मनुष्य की जाति न पूछो, जब व्यक्ति ईश्वर की दरगाह में जाएगा तो वहां जाति नहीं पूछी जाएगी । सिर्फ आपके कर्म ही देखे जाएंगे ।
गुरु नानक देव ने पित्तर–पूजा, तंत्र–मंत्र और छुआ–छूत की भी आलोचना की । इस प्रकार हम देखते हैं कि गुरु नानक साहिब हिंदू और मुसलमानों में एक सेतु के समान हैं । हिंदू उन्हें गुरु एवं मुसलमान पीर के रूप में मानते हैं । हमेशा ऊंच–नीच और जाति–पाति का विरोध करने वाले नानक के सबको समान समझकर ‘गुरु का लंगर’ शुरू किया, जो एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करने की प्रथा है ।
सिख धर्म में श्रद्धा व उल्लास के साथ गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व मनाया जाता है । इस मौके पर शबद कीर्तन व गुरु की जीवनी पर प्रकाश डाला जाता है तथा अटूट लंगर का आयोजन भी किया जाता है ।

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इस वर्ष मनाया जाएगा ५५० वां प्रकाश पर्व
गुरु नानक देवजी का प्रकाश पर्व सिख समुदाय का सबसे बड़ा पर्व है । सिखों के पहले गुरु नानक देव जी की जयंती देशभर में प्रकाश पर्व के रूप में मनाई जाती है । यह पर्व समाज के हर व्यक्ति को साथ में रहने, खाने और मेहनत से कमाई करने का संदेश देता है । इस बार गुरु नानक देव की छ५०वीं जयंती २३ नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जा रही है ।
सिखों के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में विशाल नगर कीर्तन निकाला जाता है । इस दौरान पंज (पांच) प्यारे नगर कीर्तन की अगुवाई करते हैं । श्री गुरुग्रंथ साहिब को फूलों की पालकी से सजे वाहन पर सुशोभित करके कीर्तन विभिन्न जगहों से होता हुआ गुरुद्वारे पहुंचता है । प्रकाश उत्सव के उपलक्ष्य में प्रभातफेरी निकाली जाती है जिसमें भारी संख्या में संगतें भाग लेती हैं । प्रभातफेरी के दौरान कीर्तनी जत्थे कीर्तन कर संगत को निहाल करते हैं ।
इस अवसर पर गुरुद्वारे के सेवादार संगत को गुरु नानक देवजी के बताए रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं ।
भगवान एक है । एक ही गुरु है और कोई नहीं । जहां गुरु जाते हैं, वह स्थान पवित्र हो जाता है । भगवान को याद करने, मेहनत से कमाई करने और उसके बाद बांट के खाने का संदेश दुनियाभर में देने वाले ऐसे ही गुरु को सिख समुदाय उनकी जयंती पर याद करता है ।
एक ओर जहां गुरुद्वारों में भव्य सजावट की जाती है, वहीं गुरु का प्रसाद लंगर भी बांटा जाता है । साथ ही गुरु नानक देव जी पर आधारित पोस्टर जारी किए जाते हैं । अपनी परंपरानुसार प्रभातफेरी में शामिल स्त्री–पुरुष सफेद वस्त्र एवं केसरिया चुन्नी धारण कर गुरुवाणी का गायन करते हुए चलते हैं । सभी जत्थों का जगह–जगह पर हार–फूल से स्वागत किया जाता है । शाम को दीवान सजाकर शबद कीर्तन का कार्यक्रम भी किया जाता है ।
प्रकाश पर्व के दिन सुबह से ही गुरुद्वारों में धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो देर रात तक चलता है । प्रकाश पर्व यानी मन की बुराइयों को दूर कर उसे सत्य, ईमानदारी और सेवाभाव से प्रकाशित करना ।

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