Tue. Jan 21st, 2020

सुनियोजित सीमा विवाद (नेपाल-भारत) : अजय कुमार झा

  • 699
    Shares

हिमालिनी, अंक- दिसंबर 2019 । हाल ही में भारत के द्वारा प्रकाशित नक्शा, जम्मु और कश्मीर राज्य को दो नए युनियन टेरिटोरी, जम्मु–कश्मीर और लद्धाख के नाम से किए गए विभाजन को विश्व मंच पर लाने के लिए किया गया है । जिसको लेकर नेपाल में भारत द्वारा नेपाली भूमि कब्जÞा कर नक्शांकित के आरोप में भुचाल सा आ गया है । लोग सड़कों पर भारत के विरोध में नारेबाजी कर नेपाली राष्ट्रीयता प्रदर्शन कर रहे हैं । जबकि चीन के द्वारा कब्जÞा किया गया नेपाल के भूभाग प्रति किसी का भी ध्यान नहीं है । कोई भी चीनी सरकार के विरुद्ध बोलने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहे हैं ।

एक सरकारी प्रतिवेदन के अनुसार नेपाल का ६४ हेक्टर भूमि चीन के द्वारा कब्जÞा कर लिया गया है । कृषि मन्त्रालय अंतर्गत के नापी शाखा के प्रतिवेदन में चार जिला के ११ स्थान पर चीन ने नेपाली भूमि को कब्जÞा में लेने का उल्लेख है । हुम्ला के भाँगदारे खोला में ६ हेक्टर, कर्णाली में ४ हेक्टर, रसुवा के सान्जेन खोला में २ हेक्टर, भुर्जुग खोला में एक हेक्टर, जम्बु खोल में ३ हेक्टर नेपाली भूभाग चीन ने अतिक्रमण कर लिया है । लेम्दे खोला में भी समस्या है । सिन्धुपाल्चोक के खराने खोला में ७ हेक्टर, भोटेकोशी में ४ हेक्टर, इसी तरह संखुवासभा सुमजुँग खोला में ३ हेक्टर, कामखोला में २ हेक्टर और अरुण खोला में ४ हेक्टर जमीन चीन के साथ सीमा समस्या में है । प्रतिवेदन के अनुसार नदी वहाव में परिवर्तन के कारण नेपाल का भूभाग चीन के सीमा भीतर पड़ गया है । तो हाल यह है कि चीन के सीमा से सटे नेपाली भूभाग की सुरक्षा करनेवाला कोई नहीं है । क्योंकि वहाँ लोगों का आना जाना ही नहीं है । नेपाल के पास अपनी सीमा स्तम्भ को खोजने का भी सामथ्र्य नहीं है । चीन के विरुद्ध आवाज उठाना तो दूर अपनी सीमा रेखा तक पहुँच पाना भी नेपाल के लिए संभव नहीं है । अतः यह सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारा उत्तरी सीमा कितना सुरक्षित है !

नेपाल भारत के बीच ज्ञडज्ञट में हुए सुगौली संधि में राष्ट्रीय परिसीमन को स्पष्ट नहीं किया गया था, इसलिए इसका प्रभाव आज तक कायम है । संधि में यह स्पष्ट नहीं है कि कुछ स्थानों पर एक स्पष्ट वास्तविक सीमा रेखा कहां से गुजरेगी । कई स्थानों पर सीमा के निर्धारण और सीमा स्तंभों की स्थापना को लेकर विवाद है । अनुमान लगाया गया है ऐसे विवादित स्थानों का क्षेत्रफल लगभग ६०,००० हेक्टेयर है । ऐसे कई क्षेत्रों में दोनों ओर से अब भी दावे, प्रतिदावे किये जा रहे हैं, जिन पर विचार–विमर्श, विवादों और तर्कों का दौर जारी है ।
नेपाल–भारत की सीमा रेखा के छद्ध स्थानों पर अतिक्रमण और विवादों के आरोप हैं । प्रमुख क्षेत्रों में कालापानी÷लिम्पियाधुरा, सुस्ता, मेची क्षेत्र, टनकपुर, सन्दकपुर, पशुपतिनगर हिले थोरी आदि स्थानों की पहचान की गई है । सुगौली संधि के तहत, नेपाल ने अपने नियंत्रण वाले भूभाग का लगभग एक तिहाई हिस्सा गंवा दिया जिसमें पूर्व में सिक्किम, पश्चिम में कुमाऊं और गढ़वाल राजशाही और दक्षिण में तराई का अधिकतर क्षेत्र शामिल था । तराई भूमि का कुछ हिस्सा ज्ञडज्ञट में ही नेपाल को लौटा दिया गया । ज्ञडटण् में तराई भूमि का एक बड़ा हिस्सा नेपाल को ज्ञडछठ के भारतीय विद्रोह को दबाने में ब्रिटिशों की सहायता करने की एवज में पुनः लौटाया गया ।

ज्वलंत विवाद में कालापानी क्षेत्र है । काली नदी का मूल स्रोत भारत और तिब्बत की सीमा पर स्थित लिपु–लीख दर्रे के निकट कालापानी माना जाता है, हालांकि नदी के कुछ भौगोलिक स्रोत यहाँ से ५ किलोमीटर आगे नेपाल तथा तिब्बत में भी स्थित हैं । १८१६ की सुगौली संधि के अनुसार कालापानी से आगे यह नदी भारत तथा नेपाल के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनाती है । तवाघाट में (२९º५७’ल्, ८०º३६’भ्) धौलीगंगा नदी काली में दायीं ओर से मिलती है ।

२९º३६’ल्, ८०º२४’भ् पर काली में बायीं ओर से चमेलिया नदी नेपाल की गुराँस हिमाल पहाडि़यों से दक्षिण पश्चिम में बहने के बाद मिलती है । थोड़ा आगे ही झूलाघाट नगर (२९º३४’ल्, ८०º२१’भ्) पड़ता है, जिसका बाजÞार नदी के दोनों किनारों पर फैला है । इसके बाद नदी पंचेश्वर पहुँचती है, जहाँ इसमें दायीं ओर से सरयू नदी आकर मिलती है । सरयू काली की सबसे बड़ी सहायक नदी है ।

नेपाल के दक्षिणी सीमा पर पूरब से पश्चिम तक तराई के लोग एक मजबूत प्रहरी के रूप में सीमा की रक्षा कर रहे हैं । मधेसी के रहते नेपाल की एक इंच भूमि भी कोई कब्जÞा नहीं कर सकता है । स्मरण रहे ! फागुन द्दठ गते २०ठघ को भारतीय सुरक्षा बल के गोली से निधन हुए (कंचनपुर) के गोविन्द गौतम को शहीद घोषणा कर उच्च अधिकारियों की तरह ग्यारह तोपों की सलामी दी गई क्योकि गौतम पहाड़ी मूल के थे । जबकि २०६७ जेठ में भारतीय सुरक्षा बल के ही गोली से निधन हुए मोरंग के वाशुदेव शाह को किसी प्रकार का सम्मान नहीं दिया गया । जबकि भारत पर मीडिया में खूब हल्ला मचाया गया । क्योंकि नेपाल सरकार खुद अपनी ही आधी आबादी के साथ दोहरा व्यवहार करती है । नेपाल सरकार को खुद मधेसी पर विश्वास नहीं है । उनके भीतर की खस मानसिकता मधेसियों को पलायन होने को मजबूर करा इस सुन्दर भूभाग को अपने स्वार्थ हेतु हड़पना चाहती है । वास्तव में देखा जाय तो नेपाल के तराई वासियों के वजूद को नष्ट करने के लिए ही बिना कारण भारत के साथ बार–बार तकरार का माहौल सृजना कर नेपाल भारत बीच के युगों के धार्मिक–सांस्कृतिक हार्दिकता को कटुता में बदलना चाहती है । वैसे भी हम ग्रेटर नेपाल की तो मांग कर ही रहे हैं । इस हालात में तराई का भूभाग तो कोशों भारतीय सीमा की ओर बढेगा । फिर भूमि अतिक्रमण की चिंता क्यों ? और अगर भारत नेपाली भूमि को अपने नक्से में दिखाता है, तो क्या हम इतने काहिल और गँवार हैं ! हम भी अपने नक्से में पुरे भारत को क्यों न समेट लें ? हम हीं क्यों परेशान हों ! परन्तु हमें इसमे भी भय लगेगा । हमारी बेटियाँ विदेशों में अपना पसीना बहा रही हैं और हम उसके पसीने पर ऐश कर रहे हैं । हममें थोड़ा भी संस्कार होता तो हम इस तरह के दुश्चक्र में न पÞmसकर राष्ट्र की मौलिक आवश्यकता और आधारभूत कर्तव्यों पर जोर देतें । भ्रष्टाचारियों को निर्मूल कर देश के चतुर्दिक विकास हेतु युवाओं को अपने देश में काम का भरपूर मौका देते । अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और समाजिकता को फलने फूलने के लिए अवसर का निर्माण करतें । सुरा सुंदरी में डूबे इन भ्रष्ट नेतृत्व से आत्मा तक को गिरवी रखने के कुकृत्यो के अलावा और क्या प्राप्त हो सकता है ? क्योकि हम ने चीनी भाषा और संस्कृति के प्रति विस्तार हेतु ममत्व और अपनी ही सनातन धर्म और संस्कृति के विनाश हेतु षडयंत्र में सहभागी होकर गौरव अनुभव किया है । शायद ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ इसी को कहते हैं ।

नेपाल और भारत के बीच की सीमा विश्व में विशेष महत्व रखती है । कौटुम्बिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध सेतु से जुड़े दोनों देश के नागरिको के सदियों से चलती आ रही सहज आवागमन और सामाजिक सम्बन्ध को राजनीतिक नक्सा के कारण अवरुद्ध करने की छूट दोनों देश में से किसी को भी नहीं है । हम दोनों देशों के सीमावासी इसका सुक्ष्म संज्ञान रखते हैं । परन्तु आज यह मौलिकता नेपाली पक्ष के तथाकथित भौगोलिक राष्ट्रवाद और भारतीय पक्ष के राज्य सुरक्षा की भावना के कारण खतरा में पर गया है । काठमाडौं उपत्यका में भारत विरोधी भावना भड़काना बहुत सहज हो गया है । जो नेपाली राजनीतिकों को वोट की रोटी सेकने की वस्तु और घरेलु एवं विदेश नीति का अस्त्र बन चुका है । उग्र राष्ट्रवादी भावना राजनीतिक उपलब्धि के लिए शक्तिशाली उपकरण के रूप में प्रयोग होने लगा है । नेपाल में भारत को बदमास और अभिमानी प्रस्तुत कर अपने को राष्ट्रीय हित का कट्टर हिमायती के रूप में प्रस्तुत करने की होड़बाजी होने लगी है । जिसका एक दृश्य इन दिनों काठमांडू के सड़को पे देखा जा रहा था । क्या कम्युनिष्ट और क्या कांग्रेस ! सबके सब भारत को गाली देने में कत्थक कर रहे थे । जबकि सीमा विवाद को नेपाली राजनीति कर्मी दीर्घकालीन रूप में सुलझाना नहीं चाहते हैं । पाकिस्तान की तरह नेपाली राजनीतिक कर्मियों के लिए भी यही वह एक सूत्र है (भारत के विरुद्ध नपÞmरत का बीज बोना) जिससे नेपाली नेता लम्बे समय तक जनता को मुर्ख बनाकर सत्तासीन होने में कामयाब रह सकते हैं । आज कम्युनिष्ट पार्टी इसी के आधार पर राज कर रही है । और कांग्रेस भी अब इसी का सहारा लेना चाहती है । जिसका खामियाजा भविष्य में सभी पार्टियों को भुगतना पड़ेगा ।

गौरतलब है कि भारत में आयोजित हुए सैन्य अभ्यास ःक्ष्ीभ्ह्(ज्ञड में नेपाल का शामिल न होना लेकिन चीन के साथ क्बनबचmबतजब ँचष्भलमकजष्उ नामक सैन्य अभ्यास के दूसरे चरण में शामिल होना नेपाल के चीनी रुझान को स्पष्ट करता है ।
दरअसल, नेपाल द्वारा बार–बार भारत की उपेक्षा करने के पीछे कई कारक काम कर रहे हैं । नेपाल में चीन का बढ़ता हस्तक्षेप, नेपाल की आंतरिक राजनीति, मधेसियों के बढ़ती राजनीतिक सक्रियता और भारत की पड़ोस–नीति की समस्या कुछ ऐसे पहलू हैं जो दोनों देशों में मतभेद के कारण बन रहे हैं । जहाँ तक चीन का सवाल है तो, उसने पिछले कुछ समय से नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव में अपनी सक्रियता बढ़ाई है । वह पाकिस्तान सहित सभी सार्क देशों को आर्थिक सहायता का लालच देकर अपने प्रभाव में लाना चाहता है । नेपाल में चीन द्वारा भारी निवेश इसी का दूसरा पहलू है ।

इससे इतर, भारत को अपनी विदेश नीति की समीक्षा करने की भी जरूरत है । भारत को नेपाल के प्रति अपनी नीति दूरदर्शी बनानी होगी । जिस तरह से नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है, उससे भारत को अपनी पड़ोस में आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन करने से पहले रणनीतिक लाभ–हानि पर विचार करना होगा ।

सबसे पहले तो भारत को अपने खिलाफ बने चीन–नेपाल–पाकिस्तान गठजोड़ के लक्ष्य को समझना होगा जो दक्षिण एशिया में भारत के लिये सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है ।

वि.सं. २०ठद्द जेठ ज्ञ गते चीन ने भारत के साथ लिपूलेक को व्यापारिक केंद्र बनाने के उद्देश्य से नेपाल के भूमि में समझौता किया, जिसकी जानकरी समेत नेपाल को नहीं दी गयी । इस प्रकार चीन ने नेपाल के साथ धोखा किया है । वास्तव में चीन अपने व्यापारिक लाभ के लिए नेपाल को अपनाकर भारत को खोना नहीं चाहता है । अतः ऐसा न हो कि चीन नेपाल को अपने पौराणिक मित्र भारत से शत्रुता बढ़ाकर कालान्तर में तिब्बतियों की तरह आत्म समर्पण के लिए बाध्य न कर दे । चीन से सहयोग माँगकर ही तो तिब्बत ने अपने वजूद को खो दिया । अतः नेपालियो को सावधान रहने की विशेष जरुरत है ।

इस वक्त नेपाल की राजनीति और समाज में ‘ग्रेटर नेपाल’ को लेकर बात चल रही है । ‘ग्रेटर नेपाल’ का अर्थ है– प्राचीन नेपाल, यानी वह नेपाल जो भौगोलिक रूप से विस्तृत था । इसी ‘ग्रेटर नेपाल’ की आज नेपाली लोग मांग कर रहे हैं और इसकी हवा पाकिस्तान और चीन दोनों दे रहे हैं कि नेपाल अपने ‘ग्रेटर नेपाल’ की बात करे और बिना कारण समस्या को सिर्जित कर उलझा रहे । जबतक नेपाल चारो ओर से समस्या से नहीं घिर जाता तबतक उसे ऋण में डूबना मुश्किल होगा, अतः चीन हमें ऋण में डुबाकर दीनहीन बना देना चाहता है । जिससे हम उसके आगे आत्म समर्पण कर दें ।

भारत का कहना है कि नेपाल ने भारत नेपाल मैत्री संधि की पुनरावलोकन की मांग की तो भारतीय पक्ष ने सन २०ण्ज्ञ में ही नेपाल के मांग अनुसार समानता के आधार पर दायित्व एवं अधिकार में सामानता हेतु संधि संशोधन के लिए विदेश सचिव स्तरीय वार्ता के लिए राजी हो गया, जो प्रथम चरण के वार्ता में ही सीमित रह गया । उनके अनुसार इस तरह के हर वार्ता को नेपाल नजर अंदाज करता रहा है । नेपाली नेता सिर्फ अपनी बोट बैंक के लिए इस तरह के मुद्दे को उखाड़ता रहता है । परन्तु समाधान के लिए ठोस कदम नहीं उठाता है ।

भारत और नेपाल के बीच उत्पन्न विवादों और उसपर आधिकारिक व्यक्तियों के द्वारा दी जानेवाली आक्रामक वक्तव्य से हम समाधान की ओर नहीं बल्कि संग्राम की ओर बढ़ रहे हैं । जो कि हमारी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पौराणिक एकता को कलंकित करता है । अतः हमें प्रमाणिकता की ओर बढ़ना चाहिए । कालापानी भूमि खण्ड को लेकर भारत और नेपाल को अपनी अपनी ओर से प्रमाणिक कागजात प्रस्तुत करना चाहिए । और मिलकर बातचीत के जरिये किसी ठोस फैसले पर पहुंचकर दोनों देशों की जनता में किसी तरह का कोई मतभेद पनपाए बिना समाधान निकालना चाहिए । जिससे दोनों देशों के रिश्ते भी प्रगाढ़ बने रहे । आज का भारत पहले वाला नहीं रहा । मोदी से पहले भारत नपुंसक और अदूरदर्शियों के चंगुल में था । जिसने अपने पड़ोसियों से सम्बन्ध बिगाड़ने का काम किया है । पड़ोसियों के बीच अविश्वास का परिचय दिया है । सिर्फ वादा करना जाना था निभाना नहीं । लेकिन,अब भारत एक सुयोग्य, राष्ट्रवादी, सक्षम तथा सुसंस्कृत दुरदर्शी विश्वचेतना मोदी के हाथों में है । जो वादा करते हैं तो उसे पूरा करना भी जानते हैं । यह किसी से छुपा नहीं है । अतः यदि अब भी भारत नेपाल के बीच पूर्ण समझदारी नहीं बन पाया तो भविष्य में दूर दूर तक कोई संभावना दिखाई नहीं देता है । जिस भारत को पाकिस्तान कभी आँख दिखाता था आज उस भारत को पाकिस्तान का आका भी गले मिलाने को तड़पता है । डोक्लाम में चीन को मोदी ने अपनी मौजूदगी का मजेदार परिचय दिया । इन्डो पैसिफिक योजना भी कुछ कहता है । अतः हमें शान्ति से विकास पथ पर अग्रसर होने के लिए भारत का पूर्ण सहयोग आवश्यक है । मधेस के एक सौ पचास लाख बुलंद नागरिक दक्षिणी सीमा को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त है । सरकार उत्तरी सीमा को संभाल ले तो बहुत है ।

स्मरण रहे ! योजनाबद्ध षडयंत्र के तहत सीमा क्षेत्र को सम्वेदनशील बनाकर तराई बासी को भारत के विरुद्ध लड़ाने का प्रयास न किया जाय । नेपाल के मधेसी भारत के बीच भावनात्मक एकता है । सांस्कृतिक एकता है । धार्मिक एकता है । भाषिक और सामाजिक एकता है । पारिवारिक और व्यवहारिक एकता है । आत्मा और शरीर का सम्बन्ध है । पुष्प और सुगंध का सम्बन्ध है । वेद और उपनिषद् का सम्बन्ध है । इसको संसार का कोई भी वाद और सिद्धांत तोड़ नहीं सकता । कोई भी आँधी मोड़ नहीं सकता । कोई भी शस्त्र काट नहीं सकता ।

Loading...

 
आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: