Wed. Aug 26th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

महिला का दर्द कौन सुनेगा ? : चन्दा चौधरी

 

नेपाल के एक नामी पत्रिका के सम्पादकीय को आधार माना जाय तो गण्डकी प्रदेश के प्रदेश सभा मे पुरुषप्रदेश सभा सदस्य की ओर से महिला सदस्य महिला हिंसा का शिकार बन रही है
हिमालिनी, अंक- दिसंबर 2019 ।महिला हिंसा विरुद्ध का १६ दिन का अभियान १० दिसम्बर को समापन किया गया है । प्रत्येक वर्ष यह अभियान चलाया जाता है, दुनिया भर में । विश्व स्तर पर महिला हिंसा का शिकार होती आ रही है । इस अभियान का औचित्य इसी से सिद्ध होता है । ऐसा कोई विश्लेषणात्मक तथ्यांक नहीं देखा जा रहा है कि ऐसे अभियानों से महिला हिंसा मे कोई कमी आयी हो । फिर भी ऐसे अभियान की आवश्यकता को नकारा नहीं जाना चाहिए । न जाने क्या इत्फाक है प्रत्येक वर्ष इसी अभियान के दौरान महिला हिंसा की ज्यादा घटना बाहर आती है ।

इस वर्ष भी महिला हिंसा विरुद्ध के अभियान के दौरान ही भारत के हैदरावाद से दिल धड़का देने वाली घटना बाहर आयी है । पशु डाक्टर प्रियंका रेड्डी को बलात्कार कर उन्हें जला कर मार दिया गया । वैसे भारत की यह पहली घटना नहीं थी । वैसे ही नेपाल के सुदूर पश्चिम प्रदेश मे २१ वर्षीय पार्वती बुढा महिनावारी के समय छाउ घर मे रहने को मजबुर हुई तो उनकी मृत्यु हो गयी । संस्कृति और धर्म के नाम पर हुई यह मृत्यु है या हत्या, अलग विश्लेषण का विषय–वस्तु हो सकता है । न जाने कितनी ऐसी घटनाएँ हमारे समाज मे प्रतिदिन घटित होती है और बाहर नहीं आ पाती । १६ दिन अभियान के क्रम में ही मुझे एक गोष्ठी मे भाग लेने का मौका प्राप्त हुवा था जिस में नेपाल के सामुदायिक बनो में महिला हिंसा व्याप्त है परंतु न तो कोई घटना बाहर आ पाती है और ना ही पुलिस के रिकॉर्ड मे दर्ज हो पाती है ।

यह भी पढें   काठमांडू में मध्यम बारिश की संभावना

कहा जाय तो समाज के हरेक कोण में महिला हिंसा जारी है, सदियाें से । अभी के आधुनिक युग मे भी अगर महिला प्रताडि़त होती रहेगी तो हम भले दुनिया को कैसे अपना मुँह दिखा पाएंगे ? सच कहा जाय तो महिला हिंसा हमारी सभ्यता और इतिहास पर एक काले धब्बे की तरह है जिसको हटाना आज की प्रथम आवश्यकता हो चुकी है । अशिक्षित समुदाय में ऐसी घटनाएँ होती हैं तो हम कहते हैं कि अशिक्षा के कारण ऐसा हो रहा है । परंतु जब शिक्षित वर्ग और सम्मानित पद पर विराजमान लोगों की तरफ से महिला को हिंसा का सामना करना पड़ रहा हो तो हम क्या कहेंगे ? कुछ दिन पहले की बात है, नेपाल के एक नामी पत्रिका के सम्पादकीय को आधार माना जाय तो गण्डकी प्रदेश के प्रदेश सभा मे पुरुषप्रदेश सभा सदस्य की ओर से महिला सदस्य महिला हिंसा का शिकार बन रही है । यह कितनी शर्म और खेदजनक अवस्था है नेपाली समाज के लिए । जब कानून बनाने वाली प्रतिनिधि ही महिला हिंसा में उतर आए तो आम जनता में क्या सन्देश प्रवाह होगा ? आवश्यकता है महिला प्रदेश सभा सदस्यों को इसपर खुलकर बोलने की और पीड़क सदस्य को दण्डित करने की ताकि पूरे देश में यह सन्देश पहँुचे की महिला हिंसा करने वालों का नेपाल में कोई जगह नहीं है बचने के लिए । समाजिक वहिष्करण की आवश्यकता है महिला विरोधी महिला को वस्तु समझने बाले पुरुषों के लिए ।

यह भी पढें   गरिमा चौधरी हत्या मामले में बयान का वीडियो वायरल करने के आरोप में एक पुलिसकर्मी गिरफ्तार

नेपाल मे महिला आयोग की व्यवस्था नेपाल के संविधान ने किया है । आयोग पदाधिकारी विहीन तो है ही और यह आयोग कार्य विहीन भी ऐसा प्रतीत होता है । क्या औचित्य है महिला आयोग नेपाल का, सोचने का वक्त आ चुका है । राजनीतिक नियुक्ति के कारण इस आयोग को नए ढंग से संचालन मे लाने का वक्त आ चुका है । देश मे बढ़ रही महिला हिंसा का अगर आकड़ा आयोग से मांगा जाए तो शायद उनके पास उपल्ब्ध नहीं होगा । महिला प्रताडि़त हुई घटनाओं को अगर महिला आयोग नही उठा पाएगा और पीडि़त को न्याय दिलाने मे सक्रिय नहीं हो पाया तो यह अपने आप में खेदजनक अवस्था है जो कि सम्पूर्ण महिला समुदाय के लिए दुखद होगा ।

नेपाल के राष्ट्रीय मानवअधिकार आयोग का भी हाल कुछ इसी तरह का है । इस आयोग को अगर ‘दाँतबिना का बाघ’ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । संवैधानिक आयोग के दर्जा में रहे मानवअधिकार आयोग के लिए जरूरी है कि महिला हिंसा की घटना में अपनी स्पष्ट अडिगता ले और पीडि़तो को न्याय दिलाने में अपने धर्म का पालन करे । वर्ना रोजीरोटी पूरा करने के लिए आयोग की आवश्यकता क्या है ?जनता के कर से चलने वाले आयोग को महिला हिंसा जैसे मुद्दो में सकारात्मक एवं पीडि़त केन्द्रित प्रतिफल लाने में कोई भी कसर नहीं छोड़नी चाहिए । अब बात करे नेपाल पुलिस की । किसी भी घटना में पीडि़त का एफआइआर दर्जकर यथाशीघ्र घटना का विस्तृत अध्ययन कर प्रमाण संकलन कर के पीड़क को न्यायालय के कठघरे मे लाना जरुरी है । परंतु देखा गया है कि राजनीतिक दबाब के कारण कई सारी महिलाएँ हिंसा जैसे संवेदनशील मुद्दों में भी प्रहरी पीडि़त के दर्द को अनदेखा कर देते है । कितनी शर्मनाक बात है ये ।

यह भी पढें   भारत चीन सीमा विवाद पर चर्चा के लिए आज डोभाल बीजिंग जा रहे

महिला हिंसा जैसे गम्भीर मुद्दों को आखिर कैसे हटाया जा सकता है समाज से ? आधुनिकता के इस दौर मे जहाँ राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय कानूनों की कमी नहीं फिर भी महिला हिंसा का ग्राफ दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जाना विश्व समुदाय की विफलता है । कहा जाय तो महिला हिंसा पुरुषवादी मानसिकता की उपज है । महिला को अभी भी एक कामुक वस्तु के रूप में देखा जा रहा है । समाज मे तीनवर्ष से ले कर साठ वर्ष की महिला हिंसा का शिकार होती आ रही है । समाज मे यह मानसिकता विकराल रूप में बढ़ती जा रही है । समाज मे शिक्षा का स्तर कागज मे बढ़ा जरूर है परंतु इसका अनुवादन ही हो पाया है । नैतिक शिक्षा लागु करने की मुहिम यथाशीघ्र चलाना होगा हमें । देश के हरेक गाँव मे महिलां हिंसा विरुद्ध मे बने कानून का ज्ञान देना होगा । देश के विभिन्न भागाें में नेपाल पुलिस की सक्रियता बढ़ानी होगी । आज की युवा पीढ़ी मे बढ़ रही मादक पदार्थ वा नशे की आदत का न्यूनीकरण करना भी उतना ही जरूरी है । और जरूरी है समाज को हरेक तरफ से सभ्य बनाने की । नेपाल मे विद्यमान कानून को सशक्त ढंग से लागु करना भी आज की आवश्यकता है ।
प्रतिनिधी सभा सदस्य ।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com