कमजोर वर्ग और संतुलित विकास के लिए संघीयता
शंकर लाल चौधरी:कमजोर वर्ग और क्षेत्रका राष्ट्रिय स्तर में संतुलित विकास के लिए आज संघीयता अति आवश्यक एवं अनिवार्य हो गया है। जल्दी विकास और प्रगतिके लिए संघीयता आज अपरिहार्य हो गया है।
आज देश में कमजोर वर्ग सुविधाविहीन हो गया है। संतुलित विकास के अभाव में कमजोर वर्ग, अल्पसंख्यक आदिवासी, जनजाति, दलित, मधेशी पिछड वर्ग आदि पीडÞीत है। यह सब कैसे हुआ – आज तर्राई-मधेश अथवा दर्ुगम क्षेत्र क्यों पीछडेÞ हैं – इसके बहुत कारण हैं। पर कुछ मुख्य कारण नीचे दिए गए है।
पहिचान
कमजोर वर्ग और क्षेत्रको कभी ग्राहृयता और उचित स्थान में नहीं मिला। बिभेद की नीति सदा से जडÞ जमाए हर्ुइ है। खस अहंकारवाद के कारण कमजोर वर्ग सदा से दवा हुआ है। ऊपर से कमजोर वर्ग और समूह के लिए कोई ठोस कार्यक्रम नहीं आया। अपने ही देश में, घर में सदियों से शोषित और अपहेलित पडÞा रहा।
न्याय
कमजोर वर्ग सब दिन से अन्याय में पडÞा हुआ है। तर्राई समतल होते हुए भी राज्य के द्वारा उस के प्रति अन्याय हुआ है। राज्यके उच्च अंग और राष्ट्रिय स्तर में कभी नहीं लाया गया। कुछ लोग उच्च स्तर में पहुँचे भी तो कुछ उच्च वर्गके लोग ने ही मौका का फायदा उठाया। पिछडÞा वर्ग पीछे ही रह गया। २४० वर्षतक एक जाति और एक भाषा का राज्य लादा गया। केन्द्रिकृत शासन का विकास हुआ। फलत ः साधारण लोग प्रशासनिक और न्यायिक सेवा से अलग रहे।
समानता
जाति जनसंख्या क्षेत्र विशेष, कमजोर वर्ग जाति समूह आदि को राज्य के हरेक अंग में लाने की कोशिश कभी नहीं की गई। एक ही जाति और समूह कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका में हाबी रहा। अन्ततः पिछडÞा और कमजोर वर्ग जहाँ था, वही पडÞा रहा। शासन का बागडÞोर खास करके खस समूह के हाथ में ही रहा। अतः यह अवस्था आज हमे भुगतना पडÞ रहा है।
दोस्ती और भाइचारा
तर्राई-मधेश के लोग आज से नहीं शदियों से विभेद के शिकार बने हुए हैं। बराबर का हक कभी नहीं मिला। साथ-साथ उठ, बैठ खाने घूमने की मांग करने पर विभिन्न किसिम की समस्या का सामना करना पडÞा है। एक ही देश में एक भाषा के कारण प्रशासन और न्याय प्रवेश में बाधा पडÞी है। विभिन्न किसिमका भेद भाव हुआ है। सेना प्रहरी प्रशासन में तो तर्राई मधेशवासी का प्रवेश नहीं के बरावर हुआ है। पहाडÞके आदिवासी जनजाति भी पीछडÞे तथा अविकसित हैं। मगर सेना-प्रहरी में लडÞाकू जाति समझे जाने के कारण उन लोगों को कुछ सहूलियत अवश्य मिली है। मगर तर्राई-मधेश के लोग मूकदर्शक बनकर शदियों सें अपने देश में निःसहाय बने है।
तर्राई को अन्न का भंडÞार बना ने में जीवन की बाजी लगानेवाले लोगों को न्यायोचित स्थान नहीं मिला है। इसलिए आज भी तर्राई-मधेश यातायात के क्षेत्र में सुविधा सम्पन्न होते हुए भी राष्ट्रिय राजनीति तथा विकास के दृष्टि से अपाङ्ग ही रहा है। ये सब संतुलित विकास के अभाव के कारण ही हुआ है। नीति निमार्ण्र्ााे क्षेत्र में तर्राई-मधेश के लोग न्यून है। सञ्चार जगत मौन है। विभेदकारी नीति के कारण आदिवासी जनजाति मुस्लिम, मधेशी, महिला, दलित, भूमिहीन किसान, मजदूर और दर्ुगम क्षेत्र की जनता को जो समस्या झेलना पडÞा है, उस समाधान संघीयता के द्वारा ही हो सकता है। विकास में कमी का मुख्य कारण है- एकात्मक केन्द्रीकृत शासन प्रणाली, जो शदियों से हाबी है। नेपाल में एकात्मक केन्द्रीकृत शासन प्रणाली पृथ्वीनारायण शाह ने ही शुरु किया था। केन्द्रीकृत शासन नेपाल में हाल तक रहने के दो कारण हैं ः-
१. राजा और राष्ट्रिय एकता का प्रतीक हिन्दू राजतंत्र के प्रमुख के रूप में इनको आवश्यक समझा गया।
२. संघीय संरचना से विखण्डÞन हो सकता है। ज कि यअ सब सरासर अलोकतांत्रिक विचार है। आज यह भी प्रश्न उठता है कि मुख्य जाति के संघियता के अन्तरगत अल्पसंख्यक जाति का स्थान क्या होगा – खस अहंकारवाद का स्थान कोई सामुदायिक अथवा जातीय अहंकारबाद तो स्थान नहीं लेगा – इस की पुनरावृत्ति से फिर दलित व्रि्रोह की संभावना नहीं रहती – तो अन्त में शान्ति, विकास और कमजोर वर्गका सपना केबल सान्त्वना में ही तो नहीं रह जाएगा – यह सब यक्ष प्रश्न है। इस के लिए कानून का निर्माण होना जरूरी है। खासकर के जातीय आन्दोलन करनेवाले के स्वर में शासन करने का गंध आता है। लेकिन स्वशासित प्रदेश की स्थापना में जीतने वाले ही सब लेगे -विनर्स टेक औल), ऐसी नीति नहीं है। आत्मनिर्ण्र्ाासिद्धान्त जातीय, भाषिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सहअस्तित्व के विषय में आधारित होगा। कोई एक जाति या समुदाय को दूसरे के ऊपर शासन करनेका अधिकार नहीं होगा। समानुपातिक प्रतिनिधित्व और स्वायत्तता की नीति को लेकर सत्ता में साँझेदारी होगी। विकास और प्रगति में सभी अवसर तथा सुविधा को अधिकतम विस्तार करने की नीति अर्न्तर्गत एवं जाति, वर्ग, लिंग और समानुपातिक सहभागिता के आधार में राज्य के हरेक अंग और संयन्त्र में प्रतितिधित्व की अनिवार्यता रहने की अपेक्षा की जाती है। इससे सामूहिकता सहकारितापर्ूण्ा और सहअस्तित्व जीवन शैली का विकास होता है।
तर्राई-मधेश स्वायत्तता
आज हरेक वर्ग अपनी पहिचान और स्वायतता की बात करता है। यह आज की आवश्यकता भी है। तर्राई के सशस्त्र समूह तर्राई को अलग राज्य बनाने की बात सोच रहे है। थारु समुदाय भी अपनी ऐतिहासिक भूमि कहकर ‘थरुहट स्वायत्त प्रदेश’ की माग कर रहा है। पर्ूव में राजवंशी लोग ‘कोचिला प्रदेश’ और धिमाल भी स्वायतता की माँग कर रहे है। पहाडÞ की तलहटी में बसनेवाले पहाडÞी समुदाय के लोग ‘चुरेभावर प्रदेश’ की मांग मधेश के समानान्तर में उठा रहे हैं। देर से ही सही, तर्राई के अन्य अल्पसंख्यक जात और जन-जाति द्वारा स्वायतता की चाहना व्यक्त करना स्वाभाविक भी है। उपेक्षित, विभेदित अवस्था में बैठा हुआ तर्राई-मधेश का समुदाय देर से ही सही अपनी माग और अधिकार की आवाज उठा रहे हैं।
तर्राई-मधेश में समूहगत पहचान इस प्रकार हैः
क) आदीवासी जनजाति लोग ः-
इस प्रजाति में कोच -राजवंशी) थारु, दरै, दनुवार, धिमाल, वांतर, बोटे, माझी, मेचे, मंगोल प्रजाति के ही जनजाति, जैसेः ताजपुरिया, अस्टि्रक तथा मिश्रति प्रणाली के कुशवाहिया, चीडÞीमार, सतार धानुक तथा द्रविडÞ समूह के किसान और झांगर आदि पडÞते हैं।
ख) मधेशी समूह
ककेसियाली प्रजाति के आर्याबर्तीय आर्य और इनके अतिरिक्त समूह के जाति जो अपने को मधेशी मानते है। जैसे अमात, अहिर -यादव) कलवार, कानू, कायस्थ, कोईरी, तेली, नाउ, ब्राहृमण, वैश्य, भूमिहार, राजपूत, रौनियार, सूडÞी आदि।
ग) अल्पसंख्यक पिछडÞा उत्पीडिÞत जाति समूह
इस वर्ग में अस्टि्रक और मिश्रति प्रजाति के जात पडÞते है। जैसे, कर्ुर्मी, केवट, खतवे, चमार, डÞोम, तत्मा, दुसाध, धोबी, पासी, भर मल्लाह, मुसहर, हलखोर आदि हैं।
घ) व्यावसायिक तथा धार्मिक अल्पसंख्यक समूह
आर्य मूल के बंगाली, माडÞवारी, मुसलमान और सिख समुदाय आदि हैं। इसी तरह पहाडÞ से आए ब्राहृमण, क्षत्री, दलित समुदाय, आदिवासी जनजाति समुदाय की बस्ती में बढÞोत्तरी हर्ुइ है।
पंचायतकाल में पुनर्वास कम्पनी की स्थापना २०२० साल में हर्ुइ। और २०३७ साल में ६०० हेक्टर वन भूमि कब्जा करके पहाडÞ तथा आसाम मेघालय और बर्मासे आया हुआ लोगों को बसाया गया।
अभी तर्राई-मधेश में बैठने वाले प्रायः सभी आदिवासी होने का दाबा कर रहे हैं। वास्तव में भगवान बुद्ध के समय के शाक्य वंशीय रुपान्तरित अवस्था में होने के वावजूद भी आदिवासी कहलाने योग्य हैं। थारु, दनुवार, दरै, कोच, मेचे, माझी, बांतर, बोटे आदि मंगोल मूल के जनजाति समूह अपने को उस कोटि के होने का दावा करते हैं। तथ्य और प्रमाण उन के पक्ष में साक्षी देते हैं।
अतः आज आवश्यकता है- न्यायपर्ूण्ा संघीयता की। जिसके द्वारा देशका संतुलित विकास संभव है। कम समय में देशको संतुलित विकास करना हो तो संघीयता अति आवश्यक है। आज पडÞोसी देश भारत इसका उदाहरण है। जहाँ २ दर्जन से अधिक अलग-अलग राज्य है। अमेरिका में ४ दर्जन से अधिक अलग-अलग राज्य है और अपने-अपने विकास के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कर रहे हंै। तो नेपाल अपवाद नहीं हो सकता है। कमजोर वर्ग और जल्दी से संतुलित विकास के लिए संघीयता आज की आवश्यकता है। इस बारे में सामूहिक चिन्तन-मनन करना समय की माग है।
-लेखक मधेसी जनअधिकार फोरम लोकतान्त्रिक के केन्द्रिय सदस्य हैं)

