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जनकपुरधाम का दुर्भाग्य घर को लगी आग घर के चिराग से

 

गंगा प्रसाद अकेला:विश्व के विद्वानों को त्रेतायुग में ज्ञान की ज्योति देनेवाले प्राचीन मिथिला राज्य की राजधानी जनकपुरधाम के नरेश राजषिर् एवं ब्रहृमषिर् जनक की नगरी जनकपुरधाम आज मिथिला के ही पुत्रों से, जिनमें से एक वर्तमान नेपाल के राष्ट्रप्रमुख के पद पर आसीन है, पीडित है। लोकतन्त्र की पर्ुनर्वहाली के पश्चात् निर्वाचित एवं समावेशी रुप में पर्ूव महोत्तरी एवं सम्प्रति धनुषा तथा महोत्तरी से निर्वाचित हुए पर्ूव ३१ सभासदों की बडÞी फौज रहते हुए भी अपनी कुछ प्राचीन विशिष्टताओं को अब तक सँजोकर रखनेवाला विश्व के अग्रणी नगर जनकपुरधाम की आज दुरावस्था है। उसे देखकर किसी भी स्वाभिमानी नेपाली और भावुक नागरिक की अन्तरात्मा चीत्कार कर सकती है। मगर सब से बड दुःख की बात यह है कि राष्ट्रपति महोदय को अपने ही नगर के अभूतपर्ूव दर्ुदशा पर थोडÞा सा भी क्षोभ नहीं है। इसी तरह आज के लोकतान्त्रिक परिवेश के मार्फ विकास की दुहाई देनेवाले तथाकथित लोकतन्त्रवादी पर्ूव ३१ सांसदों में से किसी को भी जनकपुरधाम की दुरावस्था में सुधार लाने की तनिक भी चिन्ता नहीं है। इस दृष्टि से विकास की गतिविधियों को अंजाम देनेवाले लोगों को यदि पुरस्कार देने की घोषणा का यदि कहीं प्रावधान रखा गया तो उस में सबसे पहले राष्ट्रपति का और उसके बाद ३१ पर्ूवसांसदों को अभूतपर्ूव ‘विकृति-विस्तार’ पुरस्कार से जरुर ही सम्मानित किया जा सकता है।
जनकपुरधाम के विकास से सम्बन्धित कुछ उल्लेखनीय योजनाएं, जो दो दशक पर्ूव और तदुपरान्त कार्ययोजना सहित नयी योजनाएँ, जो प्रचरित की गई थी, उनमें से कुछ महत्वपर्ूण्ा ओर उल्लेखनीय इस प्रकार है ः-
१. राजषिर् जनक विश्वविद्यालय की स्थापना जो सम्भवतः स्व. महेन्द्रनारायण निधि के समय में ही हर्ुइ थी। जिसके लिए भौतिक पर्ूवाधार के रुप में जमीन का निर्धारण हुआ था- पंचायतकाल में रहे  पंचायत प्रशिक्षण केन्द्र मुजेलिया का विस्तृत कम्पाउण्ड। जो अब तक भी विद्यमान है। मगर उक्त विश्वविद्यालय की बात वर्तमान राष्ट्रपति और वहाँ के कुछ नामी-गिरामी राजनीतिक कहे जानेवाले व्यक्तियों की जेबों में ही शायद खो चुकी है।
२. ‘वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद्’ की स्थापना की गई थी। जिसके प्रारम्भिक अध्यक्ष स्व. महेन्द्रनारायण निधि और कार्यकारी निर्देशक, त्रि.वि. जनप्रशासन संकाय के सह-प्राध्यापक महेन्द्रनारायण मिश्र, क्रमशः मंन्त्री स्तर और विशिष्ट श्रेणी के पारिश्रमिक, भत्ता, सुविधा आदि उपभोग करते हुए प्रायः ५ वर्षकी पूरी अवधि तक कार्यरत रहे थे। तब से आज तक वह परिषद् अस्तित्व में तो है, लेकिन मूलरूप से कांग्रेस और एमाले तथा कभी-कभार अल्पकाल के लिए सत्तासीन अन्य दलों के कार्यकर्ताओं के मौज-मस्ती-केन्द्र के रुप में अब तक अस्तित्व में है। जो उस परिषद के वर्तमान स्वरुप और कार्यसंचालन प्रक्रिया को देखने के बाद स्वतः जिस किसी को भी स्पष्ट हो सकता है।
३. उसके बाद भारत सरकार के सहयोग अर्न्तर्गत पाँच मुख्य निम्न योजनाओं को सम्पन्न करने के लिए सन् १९९२ में तत्कालीन श्री ५ की सरकार द्वारा किए गए अनुरोध पर नेपाल और भारत सरकार के बीच सम्झौता सम्पन्न हुआ था, जो इस प्रकार हैः-
क) मिथिला माध्यमिकी परिक्रमा मार्ग -१२७ किलोमिटर का निर्माण)
ख)    जनकपुरधाम स्थित अन्तगृही -पंचकोशी) परिक्रमा मार्ग का जीर्णोद्धारा
ग) जनकपुरधाम में मिथिला सांस्कृतिक केन्द्र का निर्माण
घ) जनकपुरधाम में धर्मशाला का निर्माण
ङ)    जनकपुरधाम में औद्योगिक क्षेत्र का निर्माण
उपर्युक्त पाँच योजनाओं में केवल उपखण्ड -घ) में उल्लिखित धर्मशाला का निर्माण जनकपुर वृहत्तर क्षेत्र विकास परिषद के हाते में भारत के तिरुपति बालाजी ट्रस्ट के सौजन्य से सम्पन्न हो चुका है। जिसका संचालन भी सुचारु रुप से जनकपुर वृहत्तर क्षेत्र विकास परिषद द्वारा आजतक नहीं हो सका है। इतना ही नहीं वह यात्री निवास उस परिषद के व्यवस्थापन के लिए भ्रष्टाचार का एक माध्यम बन चुका है, जिसके बारे में स्थानीय विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बारम्बार लिखा गया है।

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