सृजन के पीर में लिपटी गमों के नीर में आँखें, कहीं से आ रही भर-भर लहू में डूबता प्याला : सारस
लहू में डूबता प्याला ……………………..
कहीं सर्दी भयंकर है
कहीं है भूख की ज्वाला,
कहीं महफ़िल मचलती है
कहीं ढलती मदिर हाला !
कहीं पर रेशमी परिधान में
कुछ लोग बसते हैं ,
कहीं नंगे बदन ठिठुरे
दुशाले को तरसते हैं !
सड़क से रोज संसद तक
मचाया शोर है जाता ,
यहाँ भूखे हजारों हैं
निवाला मिल नहीं पाता !
सृजन के पीर में लिपटी
गमों के नीर में आँखें ,
कहीं से आ रही भर-भर
लहू में डूबता प्याला !
सिसकती बीनती बेटी
कहीं इक भूख का टुकड़ा ,
वहीं कुछ राज करते हैं
पहन कर भूख की माला !
वतन का कल इधर बेवश
तड़पता चंद चिथड़ों में ,
वसन धारण किए जो
श्वेत उनका है हृदय काला !
बची जो जिंदगी उधड़ी
उसे सीती रही है माँ ,
उधर निर्धन पिता के
पाँव हैं लथपथ ,पड़ा छाला !


