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रुकना मेरी फितरत ही नहीं : श्वेता दीप्ति

 

किसी रोज वक्त से कहा था मैंने
रुको ! मुझे साथ चलना है तेरे
बड़े ही अदब से मुस्कुरा कर
कहा उसने, मैं कहाँ रुकता,
रुकना मेरी फितरत ही नहीं
मैं तो हर पल बढ़ता हूँ
तुम्हारे दिए अनुभवों के साथ
क्या तुमने देखा नहीं
तुम्हारा ‘आज’ कल पर टिका था
और आज ‘कल’ के इंतजार में है
वो गुजरा कल और आने वाला कल
मैं ही तो हूँ
अगर मैं रुक गया
तो हाथ तुम्हारे खाली रह जाएँगे
मुझे रोको मत मेरे साथ चलो
बहो उस नदी की धार की तरह
जो निरन्तर बहती है
और समेटती चलती है
हमारा दिया सब कुछ ।
बस थाम लिया मैंने
वक्त के हाथों को
इस वादे के साथ
मुड़ना नहीं है मुझे
बस बहना है
नदी की धार की तरह ।

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डा. श्वेता दीप्ति, सम्पादक-हिमालिनी

डा. श्वेता दीप्ति, सम्पादक-हिमालिनी

 

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