आओ मिलकर एक आशा का दीप जलाएं, अपनत्व का नया अहसास जगाएं : अलका गोयनका
आशा का दीपक : अलका गोयनका
दुनिया जीवन का एक विभत्स रूप, दिखा रही है,
हर रोज उम्मीद की, डोर कटती जा रही है,
जीतने को फिर भी लड़ रहा आदमी,
कोशिशें, तमाम कर रहा आदमी,
मन व्याकुल, आंखो में निराशा,
थाम कर फिर भी बैठे आशा,
एक तबका, लोगों का, इस वक्त में भी,
मतलबपरस्ती की इंतिहा कर रहा,
जरूरी चीजों की देखो, कालाबाजारी कर रहा,
फुर्सत में बैठे, कुछ परम बुद्धिजीवी,
सोशल मीडिया पर, दहशत पसार रहे,
अनर्गल बातों को, बैठे, बैठे बखान रहे,
मैसज फॉरवर्ड करने की इतनी होती है जल्दी,
बिना तथ्यों की समझ के ही, जल्दी से फॉरवर्ड कर दी,
कहाँ, कौन कैसी स्थिति में है,
इससे किसी को नहीं वास्ता,
मैसज फॉरवर्ड करने का,
लोगों पर है, ऐसा नशा चढा,
सबसे पहले, मैंने भेजा इस बात का गर्व करते हैं,
हद तो कम है, ऐसे लोग बेहद करते हैं …
जिंदगी मिलेगी, आगे ये सब करते रहना,
इस समय के लिए, दोस्तों,
हाथ जोड़ कर है, प्रार्थना,
मनोबल बनों दुनिया का,
किसी को कमजोर न करो,
हाथ से हाथ मिलाना बेशक मना है,
पर दिलों को तो सच्ची दुआ से काम है,
इंसानियत को इस वक्त,
सच्ची हमदर्दी दरकार है,
हम इतना भी कर ना सके तो,
हमारा जीवन बेकार है,
आओ मिलकर एक आशा का दीप जलाएं,
दुनिया में अपनत्व का नया अहसास जगाएं ।

नेपाल गंज


