Sat. Jun 6th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

जल न जाऊँ बस विरह अग्नि में मै आज, अब के सावन में  : इन्दु तोदी ,

 

” अब के सावन में  “”

 

रिम झिम पड़ी जो सावन की फुहार,
बढ रही है हद से अधिक प्यास,
गा रहा पत्ता पत्ता कली हर डाल,
अब के सावन में ।

बढाने लगा है तन मन में
रह रह के ये थोड़ी थोड़ी प्यास,
सितम ढाये उस पे सुहानी ये भिगी सी बयार,
अब के सावन में।

ऐसे में भर लेने पियाजी को आँख,
पा लेने को जनम जनम का साथ,
मन बैरी बावरा हुआ जा रहा है बार-बार,
अब के सावन में ।

यह भी पढें   हम एक नई शुरुआत करना चाहते हैं – रवि लामिछाने

बरस रही हैं  बूंदें या छलक रहा है कोई जाम  ,
बहक रहा बिन शराब के ही शबाब,
सिधे पड़ते नहीं जमीं पर है जो पावँ,
अब के सावन में ।

मचल रहा कजरा बार बार,
महक रहा बिन गजरे के ही
गेसूओं का हर एक तार,
खोल रहा आहिस्ता से सारे राज,
अब के  सावन मे ।

सुन ना ले उतावले कंगना की कोई झंकार,
कहना ना माने मेरा बैरी यह एक बार,
कर रहे हैं निगोड़े सरेआम शर्मसार ,
अब के सावन में ।

यह भी पढें   देश नशे में नहीं चलता : कैलाश महतो 

आलापने लगे होकर चंचल घुंघरु भी
ये प्रेम धुन साज ,
ऐसे मे ना हो जो पियाजी का साथ ,
जल न जाऊँ बस विरह अग्नि में मै आज,
अब के सावन में ।

इन्दु तोदी, धरान, नेपाल |

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *