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कोरोना संकट:2-डीजी दवा से कीमती जिंदगियों के बचने की उम्मीद, जानिए कौन हैं इसको बनाने वाले

 

2-डीजी (2-डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज) दवा को ऐसे समय मंजूरी मिली है जब भारत कोरोना वायरस की महामारी की दूसरी लहर से घिरा है और देश के स्वास्थ्य अवसंरचना पर भारी दबाव है। खास बात यह है कि यह दवा पाउडर के रूप में पैकेट में आती है, इसे पानी में घोलकर पीना होता है। संकट के समय में वरदान मानी जा रही इस दवा को तैयार करने के पीछे तीन वैज्ञानिकों का दिमाग रहा है। ये हैं डॉ. सुधीर चांदना, डॉ. अनंत नारायण भट्ट और डॉ. अनिल मिश्रा।

डॉ. सुधीर चांदना
हिसार के रहने वाले सुधीर चांदना डीआरडीओ में अतिरिक्त निदेशक हैं और उन्होंने इस दवा को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है। चांदना का जन्म अक्तूबर 1967 में हिसार के पास रामपुरा में हुआ था। उनके पिता हरियाणा न्यायिक सेवा में कार्यरत थे। उन्होंने चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से बीएससी और हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय से माइक्रोबायोलॉजी में एमएससी की। साल 1991 से 1993 तक उन्होंने ग्वालियर और फिर दिल्ली में इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियल मेडिसिन एंड अलायड साइंसेज में अपनी सेवा दी।

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डॉ. अनंत नारायण भट्ट
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के रहने वाले डॉ. अनंत नारायण भट्ट डीआरडीओ के न्यूक्लियर मेडिसिन एंड अलायड साइंसेज में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा जन्मस्थान गगहा में हुई और बीएससी उन्होंने किसान पीजी कॉलेज से की। इसके बाद उन्होंने अवध विश्वव्द्यालय से बायोकेमिस्ट्री में एमएससी की। सीडीआरआई लखनऊ से उन्होंने ड्रग डेवलपमेंट (औषधि विकास) विषय में पीएचडी पूरी की। इसके बाद वह बतौर वैज्ञानिक डीआरडीओ से जुड़ गए।

डॉ. अनिल मिश्रा
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रहने वाले डॉ. अनिल मिश्रा कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में पोस्ट डॉक्टरल फेलो रहे हैं। उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमएससी की थी और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पीएचडी पूरी की थी। वह डीआरडीओ के न्यूक्लियर मेडिसिन एंड अलायड साइंसेज में वैज्ञानिक हैं और साइक्लोट्रॉन एडं रेडियो फार्मास्यूटिकल साइंसेज डिवीजन में भी सेवाएं दे रहे हैं। साल 2002 से 2003 तक वह जर्मनी के प्रतिष्ठित मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे हैं।

जानिए इस दवा के बारे में
इस दवा को डीआरडीओ की प्रतिष्ठित प्रयोगशाला नामिकीय औषिध तथा संबद्ध विज्ञान संस्थान (आईएनएमएएस) ने हैदराबाद के डॉ.रेड्डी लेबोरेटरी के साथ मिलकर विकसित किया है। इस संबंध में जारी एक बयान के मुताबिक पिछले साल शुरुआत में कोरोना महामारी शुरू होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से तैयारियों करने का आह्वान किया गया, जिसके बाद डीआरडीओ ने इस दवा पर काम शुरू किया।

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इस दवा को लेकर भारतीय रक्षा मंत्रालय ने कहा, ‘कोविड-19 की चल रही दूसरी लहर की वजह से बड़ी संख्या में मरीजों को ऑक्सीजन और अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत पड़ रही है। इस दवा से कीमती जिंदगियों के बचने की उम्मीद है क्योंकि यह दवा संक्रमित कोशिकाओं पर काम करती है। यह कोविड-19 मरीजों के अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि भी कम करती है।’

मंत्रालय ने कहा, ‘एक मई को डीसीजीआई ने इस दवा को कोविड-19 के मध्यम एवं गंभीर लक्षण वाले मरीजों के इलाज के लिए सहायक पद्धति के रूप में आपात इस्तेमाल की मंजूरी दी। सामान्य अणु और ग्लूकोज के अनुरूप होने की वजह से इसे भारी मात्रा में देश में ही तैयार व उपलब्ध कराया जा सकता है।’ सहायक पद्धति वह इलाज है जिसका इस्तेमाल प्राथमिक इलाज में मदद करने के लिए किया जाता है।

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भारत के रक्षा मंत्रालय ने कहा, ‘डीआरडीओ की 2-डीजी दवा वायरस से संक्रमित कोशिका में जमा हो जाती है और वायरस की वृद्धि को रोकती है। वायरस से संक्रमित कोशिका पर चुनिंदा तरीके से काम करना इस दवा को खास बनाता है।’ दवा के असर के बारे में मंत्रालय ने बताया कि जिन लक्षण वाले मरीजों का 2डीजी से इलाज किया गया वे मानक इलाज प्रक्रिया (एसओसी) से पहले ठीक हुए।

मंत्रालय ने कहा, ‘इस दवा से इलाज करने पर मरीजों के विभिन्न मापदंडों के समान होने में एसओसी के औसतन समय के मुकाबले 2.5 दिन कम समय लगा।’ बयान के मुताबिक, ‘चिकित्सकीय परीक्षण के नतीजों के मुताबिक इस दवा से अस्पताल में भर्ती मरीज जल्दी ठीक हुए और उनकी अतिरिक्त ऑक्सीजन पर निर्भरता भी कम हुई। 2डीजी से इलाज कराने वाले अधिकतर मरीज आरटी-पसीआर जांच में निगेटिव आए।’

 

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